
रजनीश घई तमिलनाडु के छोटे-से कस्बे वेलिंगटन में पले-बढ़े. वे बचपन में अपने पिता लेफ्टिनेंट कर्नल एल.टी. घई से लड़ाइयों की प्रेरक कहानियां सुनते थे. 1962 के भारत-चीन युद्ध की एक कहानी ने उन्हें खास तौर पर झकझोर दिया.
इसमें कुमाऊं रेजिमेंट की 13वीं बटालियन के 120 जवानों की बहादुरी बताई गई थी, जिन्होंने मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 3,000 चीनी सैनिकों का सामना किया और उनमें से एक-तिहाई से ज्यादा को मार गिराया.
यह रेजांग ला की लड़ाई के नाम से जानी गई. उस युद्ध में भारत ने जानें, इलाका और मनोबल खोया, लेकिन यह प्रेरक जीत भी हासिल की.
हाल ही की फिल्म 120 बहादुर, जिसमें फरहान अख्तर मेजर सिंह की भूमिका में हैं, घई की उसी आजीवन दिलचस्पी का नतीजा है. यह बेहद ताकतवर और कमजोर की अदम्य इच्छाशक्ति की कहानी है. फिल्म के निर्देशक घई कहते हैं, ''इन जवानों का बलिदान और साहस ऐसा था कि मुझे लगा यह कहानी देश को जरूर बताई जानी चाहिए.’’
डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस रहे उनके भाई लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने उन्हें इस लड़ाई का विस्तृत ब्यौरा दिया. उसे सुनने के बाद घई ने दो साल तक रिसर्च की, जिसमें जीवित बचे सैनिक राम चंदर सिंह और निहाल सिंह से बातचीत और बटालियन के आर्काइव की पड़ताल शामिल थी. इससे जो कहानी सामने आई, वह खासी तेज रफ्तार, राजनैतिक तौर पर संतुलित और निजी संवादों से भरी है, जो इसे भारतीय युद्ध फिल्मों की आम अतिराष्ट्रवादी शैली से अलग बनाती है.

लेकिन यह अकेला बॉलीवुड प्रोजेक्ट नहीं है, जिसने भारत के पसंदीदा पंचिंग बैग पाकिस्तान से नजर हटाई हो. अब कहानियों में चीन भी जगह बना रहा है. धनुष और कृति सैनन की रोमांटिक ड्रामा फिल्म तेरे इश्क में में धनुष एअरफोर्स पायलट बने हैं. अमेजन प्राइम की फैमिली मैन का नया सीजन पूर्वोत्तर तक जाता है और चीन के प्रोजेक्ट गुआन यू की कहानी गढ़ता है, जो भारत-म्यांमार बॉर्डर पर फीनिक्स गांव बसाकर भारत में अशांति फैलाने की साजिश दिखाता है. अगले साल सलमान खान भी सेना की वर्दी में नजर आएंगे और 2020 की गलवान झड़पों पर आधारित फिल्म बैटल ऑफ गलवान में चीनियों को जवाब देते दिखेंगे. हमेशा की तरह सलमान की यह फिल्म अगले साल ईद पर रिलीज होगी.
पूरब की ओर नजर
भारतीय वॉर ड्रामा में चीन को लेकर बढ़ी दिलचस्पी के पीछे बड़ी वजह है ऊब. घई कहते हैं, ''हम भारत-पाकिस्तान वाली कहानी से बोर हो चुके हैं.’’ लेह स्थित 14 कोर के पूर्व जीओसी, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा की भी राय कुछ ऐसी ही है, ''पाकिस्तान पर तो आप लगातार फिल्में बना सकते हैं. पाकिस्तान से लड़ाई पर हर दो साल में एक फिल्म आ ही जाती है.’’ हाल की धुरंधर और आने वाली बॉर्डर 2 इसी चलन की ताजा मिसाल हैं. जनरल शर्मा मानते हैं कि चीन कोई आसान पड़ोसी नहीं है, इसलिए 120 बहादुर जैसी फिल्म का बनना जरूरी था. उनके शब्दों में, ''यह कहानी तो बहुत पहले पर्दे पर आ जानी चाहिए थी.’’
ऐसे प्रोजेक्ट्स की टीमें भी खुश हैं क्योंकि नई कहानियों का खजाना खुलने से लद्दाख और नॉर्थ ईस्ट जैसी जगहों पर शूटिंग का रोमांचक मौका मिलता है. इसकी वजह से देश के पूर्वोत्तर इलाके में फिल्म की शूटिंग बढ़ गई है. इसमें स्थानीय कलाकारों को अपना कौशल दिखाने का मौका मिल रहा है. 1962 के युद्ध के अलावा भारत और चीन के बीच सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों में कई सीमा विवाद रहे हैं. पाकिस्तान पर बनी युद्ध फिल्मों में कश्मीर में उग्रवाद या आतंक के जबरदस्त दृश्य दिखते रहे हैं लेकिन पर्दे पर चीन को दुश्मन के रूप में दिखाने से सिनेमैटोग्राफरों को नो मैंस लैंड के उस पार एक ताकतवर सेना के साथ दांव बढ़ाने का मौका मिलता है.
आगे के लिए भी कई कहानियां मौजूद हैं. जनरल शर्मा मेजर धन सिंह थापा का जिक्र करते हैं, जो 1962 के युद्ध के शुरुआती दिनों में 8 गोरखा रेजिमेंट की पहली बटालियन के कमांडर थे. पेंगांग झील के पास उनकी पोस्ट को चीनी सैनिकों ने घेर लिया था. कई बार हमले नाकाम करने के बाद आखिरकार उनकी टुकड़ी को पछाड़ दिया गया और पोस्ट पर कब्जा कर लिया गया. एक महीने तक चले युद्ध के दौरान थापा बंदी रहे. भारत लौटने पर उनकी बहादुरी की सराहना हुई, उन्हें लेक्रिटनेंट कर्नल के पद पर प्रमोट किया गया और देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया.
सतर्क देशभक्ति
चीन को निशाने पर रखकर फिल्म बनाना पाकिस्तान पर फिल्म बनाने जितना सीधा नहीं है. लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा बताते हैं कि यहां दांव कहीं ज्यादा बड़ा है. उनके शब्दों में, ''भारत-चीन रिश्ता खासा नाजुक है. यह सिर्फ फिल्मों का मामला नहीं बल्कि एक ताकतवर देश के साथ रिश्तों का सवाल है, जिसके साथ हमारा करीब 120 अरब डॉलर का व्यापार है.’’
चीन की आर्थिक पकड़ इतनी मजबूत है कि हॉलीवुड ने भी बीजिंग को खलनायक बनाकर बहुत कम कहानियां गढ़ी हैं. रेड कार्पेट: हॉलीवुड, चाइना ऐंड द बैटल फॉर कल्चरल सुप्रीमेसी में लेखक एरिक श्वार्टजेल बताते हैं कि हॉलीवुड स्टूडियो अक्सर चीनी दर्शकों को ध्यान में रखकर फिल्में बनाते हैं और कक्वयुनिस्ट पार्टी को नाराज न करने की खास सावधानी रखते हैं, ताकि चीन के फिल्म बाजार का फायदा उठाया जा सके.

दुनिया में सबसे ज्यादा, करीब 80,000 थिएटर स्क्रीन चीन में हैं. ऐसे में बॉलीवुड को भी दुनिया की इस दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में कारोबार बढ़ाने का बड़ा मौका मिला है. दंगल, सीक्रेट सुपरस्टार, अंधाधुन, हिंदी मीडियम और बजरंगी भाईजान जैसी हिंदी फिल्मों ने चीन में जबरदस्त कमाई की है. अकेले दंगल ने वहां करीब 1,300 करोड़ रुपए कमाए, जो भारत में उसकी कमाई से चार गुना था. जनरल शर्मा कहते हैं, ''चीन दबाव बनाने में माहिर है. अगर बॉलीवुड ऐसी फिल्में ज्यादा बनाने लगा तो वे नाराज हो जाएंगे और आपकी फिल्में खरीदना बंद कर देंगे. तब बॉलीवुड को यू टर्न लेना पड़ेगा.’’
इसके बावजूद बैटल ऑफ गलवान के मेकर्स पीछे नहीं हट रहे हैं. यह फिल्म विवादित तथ्यों पर आधारित होगी. भारत के 20 सैनिक शहीद हुए और चार चीनी सैनिकों के मारे जाने की बात कही गई, जबकि ऑस्ट्रेलियाई प्रकाशन द क्लैक्सन मरे चीनी सैनिकों की संख्या 41 तक बताता है. जनरल शर्मा कहते हैं कि यह घटना दोनों देशों के लिए बेहद संवेदनशील है और अभी लोगों की याद में ताजा है, इसलिए फिल्म बनाने वालों को बहुत संभलकर चलना होगा. वे कहते हैं, ''ऐसी कहानियों में सबसे पहले सच ही मारा जाता है. आज तक इस पर अटकलें ही हैं कि असल में हुआ क्या था. यह आसान फिल्म नहीं है.’’
वहीं 120 बहादुर बॉक्स ऑफिस पर बड़ी लहर नहीं पैदा कर पाई लेकिन तकनीकी स्तर पर और खासकर सिनेमैटोग्राफी के लिए उसकी खूब तारीफ हुई. ज्यादातर वॉर ड्रामा से अलग यह फिल्म अति-देशभक्ति और उस दौर की सरकार पर जरूरत से ज्यादा हमले से दूर रही, जो आजकल इस जॉनर में खूब चलते हैं. घई कहते हैं, ''मैं इसे असली बनाना चाहता था. मैं चाहता था कि दर्शकों को लगे, वे खुद जंग के बीच खड़े हैं.
इसमें न स्लो मोशन है, न हवा में उड़ते स्टंट.’’ चीनी जनरल और सैनिकों की भूमिकाओं के लिए कुआलालंपुर में रहने वाले चीनी कलाकारों को बुलाया गया, साथ ही तिब्बती कलाकार भी लिए गए. एक सामान्य शूटिंग डे में 600 से 800 लोगों की टीम होती थी, जो लद्दाख में 13,000 से 14,000 फुट की ऊंचाई पर काम करती थी. घई कहते हैं, ''एक भी ग्रीन स्क्रीन शॉट नहीं है. सब कुछ असली लोकेशन पर शूट हुआ.’’
इस फिल्म को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी की भी सराहना मिली, जो फिल्म देखकर भावुक हो गए. लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर की अगुआई की थी, उन्होंने भी फिल्म को सराहा. अब निर्देशक की सबसे बड़ी इच्छा यह है कि उनके बीमार पिता जल्द ठीक हों और वे उस कहानी को पर्दे पर साकार होते देखें, जो उन्होंने कभी बेटे को सुनाई थी. घई कहते हैं, ''इस कहानी को बताने का मेरा बस एक मकसद था. जब तक ऐसे लोग देश की हिफाजत कर रहे हैं, हम चैन से सो सकते हैं.’’
हिंदुस्तानी सिनेमा में चीन
हकीकत (1964)
भारतीय सिनेमा की बेहतरीन युद्ध फिल्मों में से एक. धर्मेंद्र अभिनीत यह फिल्म दिखाती है कि जंग का सैनिकों पर क्या असर पड़ता है. इसका अब तुक्वहारे हवाले वतन साथियो आज भी यादगार देशभक्ति गीतों में गिना जाता है.
पलटन (2018)
हिंदी सिनेमा में वॉर ड्रामा के बड़े नाम जे.पी. दत्ता ने इस फिल्म में 1967 के नाथू ला और चो ला संघर्ष को पर्दे पर उतारा. यह सिक्किम सीमा पर भारत-चीन के बीच हुआ अपेक्षाकृत कम चर्चा में आया टकराव था.
ट्यूबलाइट (2017)
कबीर खान की इस फिल्म में सलमान खान को उनके आम माचो अंदाज से हटकर दिखाया गया है. वे एक मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति की भूमिका में हैं, जो भारत-चीन संघर्ष के दौरान संकट में फंसे एक चीनी मां और बेटे की मदद करता है.
सूबेदार जोगिंदर सिंह (2018)
गिप्पी ग्रेवाल की यह पंजाबी फिल्म जोगिंदर सिंह की बायोपिक है. 1962 के युद्ध में तवांग घाटी के बुम ला पास की पोस्ट पर बहादुरी और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया था.

