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रतन टाटा : चमकती आंखों वाले वो उद्योगपति, जिन्हें सपनों को हकीकत में बदलने का जुनून था

स्मरण एक ऐसी शालीन शख्सियत रतन टाटा का, जिन्होंने भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए अपनी अलग ही युक्ति निकाली. उन्होंने इस्पात को सपनों में, कारों को क्रांति में और बोर्डरूम को लॉन्चिंग पैड में तब्दील कर डाला. कॉर्पोरेट परोपकार की उन्होंने एक नई परिभाषा गढ़ दी

स्मृतिः रतन टाटा (1937-2024)
स्मृतिः रतन टाटा (1937-2024)
अपडेटेड 24 अक्टूबर , 2024

उद्योग जगत के महानायक का व्यक्तित्व इतना विविधतापूर्ण है कि उसे किसी एक फ्रेम में समाहित नहीं किया जा सकता. रतन नवल टाटा न केवल दूरदर्शी थे बल्कि उस मुकाम तक पहुंचने के लिए अपने पंखों को फैलाने का माद्दा भी रखते थे. वे ऐसे इंसान थे जिन्होंने हमेशा बड़े सपने देखने का साहस दिखाया और उनके पास इन्हें साकार करने के लिए पूरी बारीकी से हर कड़ी को जोड़ने की काबिलियत भी थी.

लेकिन वे अपनी इस महानता को हमेशा दुर्लभ विनम्रता और परोपकार की भावना के पीछे छिपाए रहे. आमतौर पर मीडिया से ज्यादा बातें न करने वाले टाटा ने 2021 में एक बड़ी ही खास बातचीत में कहा, ''मैं एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर याद किया जाना चाहूंगा जिसने चीजों को देखने के हमारे तरीके में कुछ बदलाव किए हों.'' साथ ही जोड़ा, ''किसी ऐसी चीज के इनोवेटर के तौर पर जो लोगों की नजर में अव्यावहारिक और असंभव रही हो.''

रतन टाटा का 9 अक्तूबर की रात को 86 वर्ष की उम्र में मुंबई में उम्र संबंधी बीमारी के कारण निधन हो गया. वे अपने आप में बहुत खास थे या फिर उससे भी कहीं ज्यादा थे. 1991 में जब उन्होंने जेआरडी टाटा से टाटा समूह की बागडोर संभाली, तो यह उनके लिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी. रतन टाटा जेआरडी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे और उनकी तरह ही विमान उड़ाने और इलेक्ट्रॉनिक्स में गहरी रुचि रखने वाले थे.

बाद में उन्होंने कहा था, ''जे (जेआरडी) विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे. वे प्रवेश के लिए कतार में खड़े होते थे, और अपनी कार खुद चलाते थे. मैंने उनसे जो सीखा और जिस पर आज भी अमल करता हूं, वह यह कि न्याय की भावना हमेशा बनी रहनी चाहिए. उन्होंने हमेशा सही को चुना, भले ही रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न रहा हो और हमेशा सिद्धांतों के लिए तथा लोगों के साथ खड़े रहे.''

रतन टाटा स्पष्ट तौर पर यह नहीं जानते थे कि जेआरडी ने उन्हें शीर्ष पद के लिए क्यों चुना होगा. एक तरह से तो उनका सीधा रिश्ता भी नहीं था (रतन का जन्म नवल टाटा—जिन्हें बचपन में टाटा परिवार ने गोद लिया था—और सूनी टाटा के घर हुआ, जो टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा की भतीजी थीं.) और न्यूयॉर्क की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे एक उभरते वास्तुकार थे. वे इसलिए भारत लौटे थे क्योंकि उनकी दादी लेडी नवाजबाई टाटा ऐसा चाहती थीं. रतन टाटा और उनके भाई जिमी को उनके माता-पिता के अलग होने के बाद दादी ने ही पाला था और अब उनकी उम्र साथ नहीं दे रही थी.

भारत लौटने के दो हफ्ते बाद उन्हें टेल्को (अब टाटा मोटर्स) के जमशेदपुर प्लांट में प्रशिक्षु के तौर पर सीखने के लिए भेजा गया, फिर टिस्को (अब टाटा स्टील) में उन्हें अपना कौशल निखारने का मौका मिला. ऐसा लगता था कि उन्होंने तभी अलग कार्यशैली बनाई, वे आस्तीनें चढ़ाकर काम करते और फर्श पर बैठने में भी संकोच न करते. कैंटीन में अन्य श्रमिकों के साथ ही भोजन करते. शायद स्टील संयंत्र में काम करने का ही नतीजा था कि उनका व्यक्तित्व भी फौलाद-सा मजबूत हुआ और वे साथियों की तरह ही सादगी पसंद बने.

जब जेआरडी की जगह रतन टाटा ने कमान संभाली, भारत में उदारीकरण की शुरुआत हो चुकी थी और उद्यम और संरक्षणवाद की परस्पर विरोधी धाराएं हावी थीं. टाटा चाहते थे कि देश की बजाए बाहर विस्तार हो, वैश्विक मंच की ओर बढ़ा जाए. तब तक टाटा समूह विभिन्न कंपनियों का एक अपेक्षाकृत ढीला-ढाला संगठन था लेकिन मुख्य केंद्र (यानी टाटा संस) के साथ साझा तालमेल रखता था.

समूह का रणनीतिक नेतृत्व टाटा संस के हाथ में ही था. शुरुआत में उन्होंने अपना आदर्श वाक्य तय कर लिया था, समूह व्यक्तिगत कंपनियों से अधिक महत्वपूर्ण है. यही वजह थी कि एकीकृत कमान और समान उद्देश्य सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने रूसी मोदी, अजित केरकर और दरबारी सेठ जैसे क्षत्रपों को टाटा से बाहर का रास्ता दिखाने में गुरेज नहीं किया, जिन्होंने अपना खासा दबदबा बना रखा था.

बहरहाल, समूह को चुस्त-दुरुस्त और प्रतिस्पर्धी बनाना जरूरी था इसलिए, टाटा ने टेक्सटाइल, फार्मास्युटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में खराब प्रदर्शन करने वाले उपक्रमों को बेच दिया और सॉफ्टवेयर तथा स्टील के साथ नए जमाने के अन्य कारोबार बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिया. उस दौर को याद करते हुए एक बार इंडिया टुडे से बातचीत में टाटा ने कहा था, ''लोग कहते हैं कि मैं बहुत विनम्र हूं, फिर भी मुझ पर पुराने दिग्गजों को बाहर करने, मन में कुछ और सोचने वाला, कंपनियां बेचने और ऐसे तमाम काम करने का आरोप भी लगता है जो किसी भी तरह नरम व्यवहार की श्रेणी में नहीं आता.''

समूह मजबूत होने पर कई प्रमुख क्षेत्रों में टाटा के विस्तार का लंबा दौर शुरू हुआ. घरेलू मोर्चे की बात करें तो उन्होंने कुछ साहसिक व्यावसायिक योजनाओं में हाथ आजमाया और दूरसंचार, खुदरा तथा वित्त क्षेत्र में कदम रखा. पहली स्वदेशी कार इंडिका बनाना, सबसे सस्ती कार नैनो लॉन्च करना और सिंगापुर एयरलाइंस तथा मलेशियाई कंपनी एयर एशिया के साथ मिलकर समूह का विमानन क्षेत्र में फिर से प्रवेश करना आदि शामिल है.

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर टाटा ने आक्रामक तरीके से उन मूल्यवान कंपनियों का अधिग्रहण किया जो बड़ी रकम खर्च करने और भारी जोखिम उठाने के लिहाज से उपयुक्त नजर आईं. इनमें 2000 में यूके की टेटली टी को 45 करोड़ डॉलर में, 2004 में देवू कमर्शियल व्हीकल्स को 10.2 करोड़ डॉलर में, उसी साल सिंगापुर की नैटस्टील को 48.6 करोड़ डॉलर में, 2007 में ब्रिटिश स्टीलमेकर कोरस को 13 अरब डॉलर में और 2008 में फोर्ड मोटर कंपनी से जगुआर-लैंड रोवर को 2.3 अरब डॉलर में खरीदना शामिल है.

रतन टाटा के उठाए कदमों में एक बात समान थी कि उनके फैसले हमेशा साहसिक होते थे. 2012 में जब टाटा ने पद छोड़ा, समूह का टर्नओवर 1991 में उनके पदभार संभालने के समय 4 अरब डॉलर की तुलना में 25 गुना बढ़कर 100 अरब डॉलर पर पहुंच गया था. (अब यह 165 अरब डॉलर है.)

अपने तात्कालिक उत्तराधिकारी साइरस मिस्त्री—जिन्हें 2016 में बोर्डरूम के तख्तापलट के बाद हटा दिया गया था—के साथ लंबी कानूनी लड़ाई और टाटा संस में 18 फीसद की हिस्सेदारी रखने वाले शपूरजी पलोनजी परिवार के साथ विवाद को उनके व्यावसायिक जीवन के कड़वे दौर के तौर पर याद किया जाता है. सेवानिवृत्ति ले चुके टाटा विवाद के बाद फिर कंपनी में लौटे और कुछ समय अंतरिम चेयरमैन रहे.

टाटा समूह के दिग्गज और विश्वस्त सहयोगी एन. चंद्रशेखरन को उन्होंने समूह का चेयरमैन बनाया. सिंगूर विवाद मुश्किल दौर रहा, जिसमें किसानों के विरोध के बाद 2008 में टाटा मोटर्स के नैनो प्लांट को पश्चिम बंगाल से गुजरात ले जाना पड़ा. तब उनका यह बयान सुर्खियों में रहा, ''अगर कोई मेरे सिर पर बंदूक तानेगा तो या तो उसे गोली चला देनी होगी या फिर बंदूक हटानी होगी, क्योंकि मैं अपना सिर नहीं हिलाऊंगा.''

उम्र के आखिरी पड़ाव तक रतन टाटा 21वीं सदी के कारोबारी नए और प्रयोगात्मक विचारों संग कदमताल करते रहे. निधन के कुछ हफ्ते पहले तक उन्होंने अपना काफी समय स्टार्ट-अप्स में नवाचार को बढ़ावा देने में बिताया. इसकी ताजातरीन मिसाल गुडफेलोज था. पिछले एक दशक में टाटा ने लेंसकार्ट, जिवामे, अर्बन कंपनी और ओला इलेक्ट्रिक समेत 50 से ज्यादा स्टार्ट-अप्स को आगे बढ़ने में मदद की.

वे परोपकारी कार्यों से जुड़ी समूह की इकाई टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष बने रहे, जिसकी टाटा संस में 66 फीसद हिस्सेदारी है. जीवन के इस पड़ाव पर आकर हाल ही उन्होंने इंस्टाग्राम पर कुछ पुरानी तस्वीरों के माध्यम से अपने अतीत को साझा करना भी शुरू किया था. आपको इसमें भी उनका वही मजबूत व्यक्तित्व, खूबसूरत चेहरा और चमकती आंखें नजर आएंगी. पारसी थिएटर के मंच पर भी यह फ्रेम फिट बैठता. उनकी शांत आवाज जरूर उस मंच के अनुरूप न थी. उन्होंने कारोबारी दुनिया में कदम रखने से लेकर एक शीर्षतम मुकाम हासिल करने तक हमेशा अपने व्यक्तित्व में एक शालीनता और विनम्रता बनाए रखी.

एक भरा-पूरा जीवन

एक विजनरी का जीवनवृत्त जिसने टाटा समूह का कायापलट करके उसे दुनिया की एक बड़ी कंपनी में तब्दील किया और भारत में कारोबार की दुनिया के नक्शे पर एक अमिट छाप छोड़ी

1937 रतन नवल टाटा का 28 दिसंबर को मुंबई में जन्म. बंबई में ही अपनी दादी लेडी नवाजबाई के घर टाटा पैलेस में पले-बढ़े. स्कूली शिक्षा मुंबई के कैंपियन, कैथेड्रल और जॉन कॉनन तथा उसके बाद शिमला के बिशप कॉटन में हुई

28 दिसंबर, 1937 को मुंबई में जन्म

1955 न्यूयॉर्क स्टेट के रिवरडेल कंट्री स्कूल और फिर कॉर्नेल गए; शुरू में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री के लिए पढ़ाई की पर बाद में 1962 में आर्किटेक्चर में बीए करके ग्रेजुएट हुए.

1986-89 एअर इंडिया के चेयरमैन बने.

1981 - टाटा इंडस्ट्रीज के चेयरमैन बने. बाद में उन्नत टेक्नोलॉजी वाले उद्योगों के लिए रणनीतिक योजना तैयार की.

1974 - बतौर एक डायरेक्टर टाटा संस में शामिल हुए.

1970 - टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में काम के लिए कुछ दिनों की खातिर भारत लौटे.

1969 - ऑस्ट्रेलिया में समूह के स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में काम किया.

1963-65 - जमशेदपुर में टिस्को (अब टाटा स्टील बनी) में शुरू में बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया और बाद में टेक्निकल अफसर बने.

1962 भारत लौटे, टाटा इंडस्ट्रीज में बतौर एक असिस्टेंट जॉइन किया; टाटा इंजीनियरिंग ऐंड लोकोमोटिव कंपनी (अब टाटा मोटर्स) के जमशेदपुर प्लांट में छह महीने तक ट्रेनिंग ली.

1991 टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन के रूप में जेआरडी टाटा की जगह ली.

1991 में चेयरमैन के रूप में जेआरडी टाटा की जगह ली

1992-97 - टाटा ग्रुप के आधुनिकीकरण के लिए तीन क्षत्रपों (नीचे बाएं से क्रमश:) टाटा स्टील के रूसी मोदी, टाटा केमिकल्स के दरबारी सेठ और इंडियन होटल्स के अजित केरकर को हटाया. 

2016 - मिस्त्री चेयरमैन पद से हटाए गए.

2012 - टाटा संस के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के पद से हटे. साइरस मिस्त्री के लिए राह बनाई. 

2009 - टाटा नैनो को लॉन्च किया.

2009 टाटा नैनो को लॉन्च किया

 2008 - 2.3 अरब डॉलर के सौदे में फोर्ड मोटर कंपनी से जगुआर-लैंड रोवर का अधिग्रहण किया.

 2007 - 13 अरब डॉलर में यूरोप की विशाल स्टील कंपनी कोरस का अधिग्रहण किया.

 2000 - 45 करोड़ डॉलर में टेटली टी कंपनी का अधिग्रहण किया.

2016-2017 - इस दौरान अंतरिम चेयरमैन रहे.

2021 - साइरस मिस्त्री को हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रतन टाटा और टाटा संस के पक्ष में फैसला दिया.

2021 साइरस मिस्त्री को हटाने के मामले में टाटा संस के पक्ष में फैसला दिया

यूं खड़ी की एक वैश्विक ताकत

टाटा समूह का टर्नओवर

4 अरब डॉलर था जब टाटा ने 1991 में कार्यभार संभाला.

100 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जब 2012 में टाटा रिटायर हुए.

2024 में 165 अरब डॉलर टर्नओवर.

रतन टाटा का जीवन-दर्शन

बीते सालों में इंडिया टुडे ने रतन टाटा पर कई आवरण कथाएं और आलेख प्रकाशित किए. अलग-अलग समय में की गई इन स्टोरीज में ज्वलंत विषयों पर व्यक्त किए गए उनके कुछ विचार हम यहां साझा कर रहे हैं.

- उदारीकरण पर

इंडिया टुडे, 15 दिसंबर, 1985

"किसी भी तरह के बदलाव में जब तक आप नुक्सान वाले पहलू को भी सामने नहीं आने देंगे, आप बीमारी को ही बुलावा देंगे"

"कुछ बड़ी ही कमाल की, दूरगामी और साहसिक नीतियों का ऐलान किया जाता है और उसके बाद फिर क्रियान्वयन के स्तर पर उन्हें पलीता लगा दिया जाता है"

"जो लोग दिल्ली में फिट किए गए अपने आदमियों के भरोसे बैठे हैं, आप देखेंगे कि वे कैसे ऊपर से भरभराकर नीचे गिरते हैं"

- असम के उग्रवादियों को आर्थिक मदद देने के गलत आरोपों पर

इंडिया टुडे, 22 अक्तूबर, 1997

"हर जगह से हम सुन रहे हैं कि तमाम कंपनियां चरमपंथियों को पैसा दे रही हैं. टाटा टी नहीं दे रही है. मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि हमें क्यों निशाना बनाया जा रहा है?"
 
"मुझे नहीं पता था कि उनकी पहचान की परवाह किए बगैर असमिया मूल के किसी भी व्यक्ति तक अस्पतालों के जरिए मानवीय सहायता पहुंचाना इतना गंभीर अपराध है"

- टाटा समूह पर

इंडिया टुडे, 26 फरवरी, 2003

"इससे पूर्व यह कंपनी पहले और समूह बाद में थी. इस रणनीति को उलट दिया गया: पहले समूह, फिर कंपनी"

''मैं एक निजता पसंद इंसान हूं. और राजनेता होना उससे ठीक उलट होना है. उस जिंदगी में बहुत मजा नहीं रहेगा''

- अपने उत्तराधिकारी पर

''ऐसा व्यक्ति होगा जो विजनरी हो और बदलती दुनिया को देख रहा हो, जो संरक्षणवादी न हो''

- भारत के बारे में अपने नजरिए पर

"मैं इस इलाके में भारत को एक पावरहाउस के रूप में देखना चाहूंगा. अगर हम अपनी ही बनाई कुछ सीमाओं को थोड़ा ढीला करें तो भारत दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में जगह बना सकता है. यह मुमकिन नहीं हो सका है तो सिर्फ इस वजह से कि अमेरिकियों से उलट हम बदकिस्मती से खुद को हिंदुस्तानी नहीं बल्कि पंजाबी या पारसी के रूप में देखते हैं"

- विदेशों में कंपनियों के अधिग्रहण पर

इंडिया टुडे, 8 नवंबर, 2006

"तेजी से ग्लोबलाइज होती दुनिया में हम अपने समूह की कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना जारी रखेंगे"

"दुनिया के अलग-अलग भूभागों में हम अपना विस्तार चाहते हैं, जहां एक समूह के रूप में हमारी अपनी एक सार्थक मौजूदगी हो"

- नैनो की लॉन्चिंग पर

इंडिया टुडे, 23 जनवरी, 2008

"एक ऐसा तबका भी है जिसका मानना है कि जनसमूह के लिए कुछ उपलब्ध करा देने का मतलब तबाही को बुलावा देना है. पर ऐसे लोगों का मुल्क है जहां बड़े पैमाने पर जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं. यह मान लेना गलत है कि लोगों के पास निवेश करने, चीजें खरीदने और अपना जीवनस्तर सुधारने की क्षमता नहीं है"

- रतन टाटा की कुछ अपनी आदतें

रतन टाटा का जानवरों से प्यार

> जेआरडी के चेयरमैन रहते बोर्ड की बैठकों के दौरान वे बैठे-बैठे निदेशकों के रेखाचित्र बनाते रहते थे

> उन्होंने जेट विमान और मैकडॉनेल डगलस हेलीकॉप्टर उड़ाने का लाइसेंस हासिल किया था

> 2018 में तत्कालीन प्रिंस चार्ल्स के हाथों लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड लेने नहीं जा सके क्योंकि उनका प्यारा कुत्ता बीमार था

> ड्यूटी से इतर उनके पहनावे में अरमानी वेस्ट्स, कैजुअल शर्ट्स और खाकी शामिल थे. छुट्टियां एकांत में और अक्सर यूरोप में बिताते

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