
जब रीमा दास राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली अपनी दूसरी फिल्म विलेज रॉकस्टार्स (2017) बना रही थीं, उन्हें बिल्कुल अंदाजा न था कि सात साल बाद इसका सीक्वल बनाना जरूरी हो जाएगा. इसका ख्याल उनके मन में उस वक्त आया, जब उन्होंने इसे बड़े पर्दे पर देखा, समीक्षकों ने एक स्वर से इसकी तारीफ की और दर्शकों में इसके किरदारों को लेकर अंतहीन जिज्ञासा देखी.
रीमा याद करती हैं कि फिल्म का वह अंतिम लम्हा उन्होंने अपने दिमाग में कई बार दोहराया और देखा जहां 10 बरस की धुनू (बनिता दास) अपनी मां से गिटार हासिल करती है. रीमा बताती हैं, "पहली बार गिटार बजाती धुनू महज किरदार भर नहीं थी. यह असल जिंदगी में भी हो रहा था." वे आगे जोड़ती हैं, "यह अंत के बजाए शुरुआत की तरह लगा."
साल भर बाद अपनी तीसरी फिल्म बुलबुल कैन सिंग (2018) के निर्माण के दौरान रीमा ने सिनेमा को असल जिंदगी में दोहराते हुए अपनी अल्हड़ नायिका बनिता के लिए गिटार खरीदा. अब छह साल बाद वे विलेज रॉकस्टार्स 2 लेकर आई हैं, जिसका वर्ल्ड प्रीमियर इसी महीने बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होने जा रहा है. फेस्टिवल में यह अकेली भारतीय फिल्म है.

रीमा के ही शब्दों में, "विलेज रॉकस्टार्स मेरे लिए बहुत खास है - महज फिल्म के तौर पर नहीं बल्कि इस मायने में भी कि इसने अपनी जड़ों के बारे में मेरी समझ को जिस तरह बिल्कुल बदल दिया और जितनी गहराई से यह मुझसे जुड़ी है." उनके मुताबिक विलेज रॉकस्टार्स 2 उसी जज्बे से ओतप्रोत है; अल्हड़ से बालिग होती ड्रामा फिल्म. यह उस रिश्ते की पड़ताल करती है जो धुनू अपने गांव के बदलते परिदृश्य के बीच संगीत के साथ गढ़ रही है.
बीते दशक में हिंदी फिल्म उद्योग ने बॉक्स ऑफिस पर मौजूं बने रहने की कोशिश में सीक्वेल और फ्रेंचाइज के विचार को नाजायज-सा बना दिया और उस शुचिता की बलि चढ़ा दी जो फिल्म को खास और अलग बनाती है. रीमा अपनी "सबसे लोकप्रिय और चर्चित फिल्म" की तरफ लौटकर जाने की चुनौतियों से बखूबी वाकिफ थीं. उन्होंने फिल्म को लिखा, शूट, एडिट और प्रोड्यूस भी किया है.
वे उस प्रामाणिकता और शुद्धता को खोना नहीं चाहतीं जिसने फिल्म के पहले हिस्से को इस कदर चौतरफा तारीफ बटोरने वाली घटना बना दिया. सो इस प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले उन्होंने इस बात की थाह लेना जरूरी समझा कि गिटार बजाना सीखने में बनिता की कितनी दिलचस्पी है. वे कहती हैं, "फिल्म में कोई भी नाच-गा सकता है. लेकिन जब जब आपकी फिल्म साज बजाने वाले किरदार के पीछे चल रही हो, तो दांव ऊंचे हो जाते हैं. धोखा देना कठिन होता है."
रीमा ने फिल्म बनाना अपने से सीखा और किस्सागो के तौर पर अपनी स्वतंत्रता और दृश्य शैली बनाए रखने को लेकर वे जुनूनी हैं. अपने प्रोजेक्ट में वे खुद ही पैसा लगाती हैं और उनका सिनेमा कथानक या तमाशे के बजाय मिजाज, भाव और लय पर ज्यादा ध्यान देने के लिए जाना जाता है. वे कहती हैं, "आम तौर पर मैं अपनी फिल्म बस जाकर शूट कर लेती हूं. मेरा आरंभ बिंदु ही मेरी अंतर्दृष्टि है."
रीमा स्वीकारती हैं कि इन दो फिल्मों के बीच सात साल की अवधि के दौरान उनकी जानी-पहचानी खास नजर भी विकसित हुई है, जो विलेज रॉकस्टार्स 2 के भावनात्मक फैलाव और कसे हुए संपादन से जाहिर है. अलबत्ता इस फर्क को वे स्वाभाविक प्रगति के रूप में देखती हैं और कहती हैं, "अगर मैं मुंबई की पृष्ठभूमि पर फिल्म बना रही हूं तो वह उस चीज से अलग दिखेगी जो मैं असम में बना रही हूं. कई मायनों में मैं पानी जैसा महसूस करती हूं."
—पौलोमी दास

