जब शांति से ठहर कर गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं से लगातार चलते रहने को कहा, तब वह कैसा 'चलते रहना' था. बुद्ध के इस 'चरथ भिक्खवे' (निरंतर भ्रमण) में नत्थी था बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय. विचार का एक पहलू यह भी कि जब तक सबका हित और सुख सुनिश्चित नहीं होता, आप ठहर ही कैसे सकते हैं. बुद्ध के इसी विचार को ध्यान में रखते हुए प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक और साखी पत्रिका के संपादक सदानन्द शाही ने 2019 में एक यात्रा का आरंभ किया.
करुणा, मैत्री और संवाद का संदेश लेकर चली 'बुद्ध की धरती पर कविता' शीर्षक से यात्रा ने अगले चार वर्षों तक लुम्बिनी (2020), बोध गया (2022), सारनाथ (2023) और कुशीनगर (2023) को बुद्धरत किया. इस विचार से सहमति रखने वाले कवि, लेखक, कलाकार, इतिहासविद् और समाजशास्त्री इस यात्रा में सहभागी और सहयोगी रहे. साहित्य के जाने-माने नाम इस यात्रा से जुड़कर साहित्य में सर्वजन का हित विचारते रहे.
डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रोफेसर हरीश त्रिपाठी, ज्ञानेंद्रपति, अरुण कमल, आलोक धन्वा और उदय प्रकाश जैसे नाम बुद्ध पथ की इन यात्राओं में शामिल रहे. इस कविता यात्रा के पांच वर्ष पूरे होने पर यह यात्रा अब अपने अगले चरण में और लंबे डग भरने को तैयार है. विश्व शांति के लिए समर्पित बौद्ध परिपथ की यह दस दिवसीय यात्रा इस बार 'चरथ भिक्खवे' शीर्षक से होने जा रही है.
पुराने और नए हमराहों के साथ यात्रा 15 अक्तूबर, 2024 को सारनाथ से शुरू होकर 24 अक्तूबर, 2024 को सारनाथ में ही पूरी होगी. इस दौरान यह उन स्थानों से होकर गुजरेगी जहां से कभी गौतम बुद्ध जागरण यात्रा पर निकले थे. लुम्बिनी, कपिलवस्तु, बोध गया, सारनाथ, वैशाली, नालंदा, राजगीर, श्रावस्ती, कौशांबी और कुशीनगर से होते हुए सारनाथ में जब यात्रा समाप्त होगी तो निश्चित तौर पर जितनी विचार समृद्धि इन जगहों पर शामिल स्थानीय लोगों में आएगी, उतना ही समृद्ध होकर यात्री भी लौटेंगे.
पांच वर्ष से इस यात्रा के संयोजक रहे सदानन्द शाही बताते हैं, "यात्रा से उपजे विचार में ठहरना और उससे कुछ नया रचना आवश्यक है. पिछली यात्राओं में समय कम होने के कारण इसकी सहूलत मनचाही नहीं थी. लेकिन इस बार जब हम दस दिनों तक इस परिपथ पर यात्रा करने वाले हैं तो विचार और उसके क्रियान्वयन के लिए समय पर्याप्त है. अप्प दीपो भव सा संदेश देने वाले बुद्ध को जहां दुनिया एक महान शिक्षक के रूप में याद करती है, हम उनके विचारों से उतने लाभान्वित क्यों नहीं हो सके, यह सोचने की बात है."
इस यात्रा और इसके यात्रियों के लिए एक दिलचस्प अनुभव यह भी होगा कि भारत के पूर्वी हिस्से के एक छोटे से भूभाग में विकसित विचार किस तरह ढाई हजार साल बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है. सहयोग, सहभागिता और सहमति की जमीन पर तैयार इस यात्रा का विचार तब और भी आवश्यक हो जाता है जब बुद्ध की धरती पर युद्ध का उन्माद प्रभावशाली दिखाई दे रहा हो.
ठहरने और चलने के दर्शन को संचार की मूल अवधारणा से जोड़ते हुए की जाने वाली यह यात्रा असरदार साबित होने की संभावनाओं से भरी हुई है. एक कथा में बुद्ध ने जब दुर्जन अंगुलिमाल से 'मैं तो ठहर गया, तू कब ठहरेगा' कहा, ठीक तभी वे सज्जनों से यह भी कह रहे थे कि "मैं तो चल पड़ा, तुम कब चलोगे?" यात्राएं शुभ और मंगल उपजाने का सामर्थ्य रखती हैं.
शुभ यात्रा.

