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थिएटर : 'पुराने चावल' से इतर भी है काका और दादा की दोस्ती का जलवा

सिनेमा में सक्रिय होने के बावजूद दो खुर्रांट अभिनेता दोस्त कुमुद मिश्र (काका) और शुभ्रज्योति बराट (दादा) हिंदी थिएटर के प्रतिनिधि चेहरे बनकर उभरे

पुराने चावल नाटक के एक दृश्य में कुमुद मिश्र (दाएं) और शुभ्रज्योति बराट
पुराने चावल नाटक के एक दृश्य में कुमुद मिश्र (दाएं) और शुभ्रज्योति बराट
अपडेटेड 17 जुलाई , 2024

पुराने चावल मुहावरे को अगर हम थोड़ा खोलें तो उसका अर्थ घुटा हुआ, उस्ताद, खुर्रांट या खलीफा के रूप में खुलता है. डी फॉर ड्रामा नाम से मुंबई में थिएटर ग्रुप चलाने वाले हिंदी थिएटर के ऐसे ही दो खुर्रांट अभिनेता कुमुद मिश्र और शुभ्रज्योति बराट इस मुहावरे को नए मायने दे रहे हैं.

पिछले साल नवंबर में पृथ्वी थिएटर फेस्टिवल में उन्होंने अपना नया कॉमेडी नाटक उतारा पुराने चावल. अमेरिकी नाटककार नील साइमन के लिखे सनशाइन बॉयज के इस देसी रूपांतर में दो पुराने अभिनेताओं की दोस्ती, खुन्नस और उनके कड़वे-मीठे वाकयों की कहानी है. पिछले 50 साल में इसे दुनिया के कई उस्ताद ऐक्टर्स की जोड़ी खेलती आई है.

अब कुमुद-शुभ्रो यानी काका और दादा की जोड़ी ने इसको हिंदी जबान में सान पर चढ़ाया है (कुमुद दोस्तों के बीच काका और शुभ्रो दादा कहे जाते हैं). देश भर में अभी तक इसके 20 शो हो चुके हैं. इसी 20 जुलाई को यह दिल्ली के कमानी सभागार में होने जा रहा है. उनके दोस्ताने का एक वाकया देखिए: 23 जून को दिल्ली की चिलचिलाती धूप से गुजरते हुए शुभ्रो और दूसरे आर्टिस्ट्स इसी कमानी के ग्रीनरूम में पहुंचते हैं.

पांच बजे और सात बजे ग्रुप के एक और चर्चित नाटक धूम्रपान (निर्देशक: आकर्ष खुराना; सहलेखक: अधीर भट्ट) का शो है. अविनाश गौतम के साथ मिलकर पुराने चावल को हिंदुस्तानी परिवेश में पकाने वाले फर्रुख सियर उनके लिए कोरमा और खमीरी रोटियां लाए हैं.

पिछली शाम टीम के साथ ही मुंबई से पहुंचे और वायरल बुखार से तप रहे कुमुद एक ओर लेटे हैं. इससे पहले होटल में उनके कमरे में बार-बार जाकर उनका हाल पूछ रहे शुभ्रो अब पूरे भरोसे के साथ कहते हैं, "कर लेंगे कुमुद." और शो के बाद दर्शकों की प्रतिक्रियाएं आती हैं: सो रिफ्रेशिंग; कॉर्पोरेट वर्ल्ड के डार्क साइड पर फनी और रिलेटेबल डायलॉग्स के साथ; वेल रिटेन; कमाल के टाइमिंग और पंचेज.

"कर लेंगे कुमुद..." दरअसल कुमुद-शुभ्रो के बीच यह भरोसा और विश्वास एक गहरी जैविक जमीन से उपजा है. मैत्री की मिट्टी में एक-दूसरे की संवेदनाओं और अच्छे-बुरे को जानते-सोखते, 55-60 के बीच की वय के ये अभिनेता पिछले 15 साल से साथ हैं.

शुभ्रो कहते हैं, "अभी तो कुमुद कुमुद कह रहा हूं पर दूसरों के सामने मैं उन्हें कुमुद जी ही संबोधित करता हूं. वे मुझे शुभ्रो दा बुलाते हैं." जब तक आप एक-दूसरे की पीठ पे चपेड़ मार के हंसी-ठहाका न करें तब तक आप अच्छे दोस्त नहीं, इससे वे सहमत नहीं. "उम्र बढ़ने के साथ आपकी दोस्ती ज्यादा गहरे लेवल पर चली जाती है. एक-दूसरे की आदत पड़ जाती है. हमारी दोस्ती उस तरह की है."

शुभ्रो डी फॉर ड्रामा के सबसे सजग बुद्धिजीवी हैं. दुनिया की सियासत, सरकार और अदालत से लेकर पर्यावरण, ट्रैफिक, खानपान...किसी पर भी आप बात कर लें. कुमुद ठीक ही जोड़ते हैं: "शुभ्रो दा के पास जो ज्ञान है, उनको किसी भी विषय पर बोलते हुए आप घंटों सुन सकते हैं." थिएटर में अरसे तक इन दोनों के परिवेश का अभिन्न हिस्सा रहे अभिनेता-लेखक मानव कौल जोड़ते हैं, "दोनों खूब बातें करते हैं. उनके बीच बैठकर उन्हें सुनने में मुझे बहुत मजा आता है."

कुमुद-शुभ्रो आज के हिंदी रंगमंच के 15-20 चुनिंदा अभिनेताओं में से हैं जो अपने साथ बड़ी तादाद में दर्शक लेकर आते हैं. खासकर अर्बन यंग ऑडियंस के बीच वे खासे लोकप्रिय हैं. पिछले दिनों ग्रुप ने मुंबई में 800 की क्षमता वाले रंग शारदा ऑडिटोरियम में डरते-डरते पुराने चावल का एक शो रखा था. पर उसका भी हाउसफुल शो आश्वस्ति देने वाला था. 

आध्यात्मिक-दार्शनिक विषयों पर लीक से हटकर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले बेंगलूरू के रंगकर्मी और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, अबूधाबी में रंगमंच के शिक्षक अभिषेक मजूमदार ने भी अपने नाटकों को मंच पर उतारने के लिए इन दोनों पर गहरा भरोसा जताया है. दोनों के ही अभिनय वाले उनके नाटक कौमुदी और मुक्तिधाम देश भर में चर्चा का विषय बने. एकलव्य और अभिमन्यु के रूपक में लिखे गए अनूठे नाटक कौमुदी को अभिषेक 5-6 साल के बाद अब डी फॉर ड्रामा के लिए तैयार कर रहे हैं.

25 जुलाई को यह मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (एनएमएसीसी) में ओपन होगा. जाहिर है, कुमुद तो अभिषेक का लिखा एक सोलो प्लेविभूति रचनावली भी कर रहे हैं, जो एक व्यक्ति की सत्य और ईश्वर की खोज पर है.

दोनों को ही बारीक और चैलेंजिंग काम में खासा मजा आता है. उनके डायरेक्टर भी इस बात के गवाह रहे हैं कि काम के दौरान वे सिर्फ टीम के कलाकार होते हैं. काम के दौरान वे दोस्ती की कोई भी छाप नहीं आने देते. वे बहुत अच्छे टीम प्लेयर हैं. उनकी मेहनत की बानगी देखिए. अभिषेक बताते हैं, "कौमुदी में कुमुद का कैरेक्टर धीरे धीरे करके नाटक खत्म होने तक पूरा अंधा होता है."

"हमने तय किया कि कैरेक्टर के पैर देखकर उसका बढ़ता अंधापन समझ आना चाहिए. इसके लिए आठ घंटे की रिहर्सल के अलावा पैरों पर काम करने को हम दोनों 2-3 घंटे अलग से बैठते. आज भी वह सारी युक्ति उन्हें याद है. इसी तरह मुक्तिधाम  नाटक के लिए वे गुरु मां जैसे जेंडर से परे के एक किरदार के लिए तैयार हुए जो बहुत बड़ी बात थी. साथ ही इसी में एक नटवानर का युवा किरदार. एक लड़का और दूसरा बूढ़ी औरत."

शुभ्रो किसी भी निर्देशक के लिए बड़ी पूंजी की तरह हैं. दुनिया भर के कलाकारों के साथ काम कर चुके अभिषेक उन्हें अपने सबसे पसंदीदा ऐक्टर्स में शुमार करते हैं. "पूरा मुक्तिधाम नाटक उनके कंधों पर था. मठ में बैठकर अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा. एक बार एंट्री के बाद यहां तक कि इंटरवल में भी उनके कैरेक्टर को स्टेज पर ही रहना होता है. इसी तरह से कौमुदी में अभिमन्यु के भूत का रोल. उसमें जो कॉम्प्लेक्सिटी है, कोई बहुत बड़ा ऐक्टर न हो तो उसे कर ही सकता."

संग-साथ के कलाकार भी इन दोनों का उम्दा ह्यूमन बीइंग होना इनकी एक बड़ी खूबी मानते हैं. ऐसे इन्सान जो भीतर से गहरे होने के बाद भी हल्के रहकर जी सकें. ऐसे पुराने चावल काका और दादा से आप इस साल कई नाटकों में मिल सकेंगे.

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