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अरसे बाद कॉफी की कीमतों में उछाल से भारतीय बागान मालिकों में जागी दिन फिरने की उम्मीद

दुनिया में ब्राजील के बाद रोबस्टा बीन्स के दूसरे सबसे बड़े निर्यातक वियतनाम में सूखा पड़ने से आपूर्ति में रुकावट आई. इससे भारत के बागान मालिकों की हुई चांदी

कर्नाटक के एक बागान में वेट प्रोसेसिंग के बाद सुखाने के लिए रखी गईं कॉफी बीन्स
कर्नाटक के एक बागान में वेट प्रोसेसिंग के बाद सुखाने के लिए रखी गईं कॉफी बीन्स
अपडेटेड 11 जुलाई , 2024

जिनकी सुबह और शाम एक कप कॉफी से होती है, जिनके लिए स्टारबक्स में अमेरिकानो, कैपुचीनो या लाटे, ब्लू टोकाई और देश में कॉफी के शौकीनों की ताजा पसंद थर्ड वेव है, उनके लिए कॉफी का स्वाद पिछले साल भी वैसा ही रहा.

लेकिन देश के कॉफी बागान मालिकों के लिए ये स्वाद कसैला हो गया क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट के साथ अनिश्चित मौसम और कम घरेलू पैदावार से लागत निकालना ही मुश्किल हो गया.

ऐसे ही हालात से जूझने वालों में एक सतीश ए.टी. हैं, जो कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित सकलेशपुर के एक कॉफी बागान मालिक हैं. यहां से देश के कॉफी की 70 फीसद पैदावार निकलती है. लाखों रुपए का बैंक कर्ज न चुका पाने के चक्कर में सतीश को गिरवी रखी अपनी जमीन गंवानी पड़ी. लेकिन अब आइए 2024 में. सतीश के सामने एकदम नए हालात हैं.

कॉफी की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल से उत्साहित होकर उन्होंने 17 लाख रुपए के एकमुश्त भुगतान से एक नई कार भी खरीद ली है. अपनी जमीन के बारे में वे कहते हैं, "अगर यह परिस्थिति पिछले साल होती तो मैं अपनी जमीन बचा सकता था."

कॉफी उद्योग के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, वियतनाम में सूखे के चलते रोबस्टा (कॉफी के पौधे की एक किस्म) की आपूर्ति में आई कमी के कारण कॉफी की मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी हुई है. ब्राजील के साथ वियतनाम दुनिया भर में कॉफी उपज का 70 फीसद आपूर्ति करता है.

हालांकि कॉफी की कीमतें हमेशा घटती-बढ़ती रहती हैं. इन देशों में मौसम की अनिश्चितताओं के आधार पर हर कुछ वर्षों में उछाल और गिरावट आती है. लेकिन उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि पहली रोबस्टा की पैदावार इसकी बड़ी वजह बनी है.

दुनिया भर में सबसे अधिक उगाई जाने वाली कॉफी की किस्म अरेबिका कुल उपज का लगभग 60 फीसद हिस्सा होती है. पहाड़ों की अधिक ऊंचाई पर खेती के लिए उपयुक्त इसके बीज आमतौर पर अपने बेहतर स्वाद के लिए प्रीमियम दामों पर बिकते हैं. रोबस्टा दूसरी सबसे आम किस्म है, जो मध्यम ऊंचाई पर पनपती है और रोस्टर इसका उपयोग अपने कॉफी मिश्रणों को अधिक गाढ़ापन देने के लिए करते हैं.

कॉफी एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन, इंडिया के अध्यक्ष रमेश पी. राजा कहते हैं, "अरेबिका बड़ा भाई है और यही कीमतों को बढ़ाता है. मगर इस बार उल्टा हुआ है." राजा बताते हैं कि इसकी सस्ती कीमत और बेहतर मूल्य के कारण पिछले कुछ वर्षों में कॉफी मिश्रणों में अधिक से अधिक रोबस्टा का उपयोग किया जा रहा है.

वियतनाम में फसल कम होने से वैश्विक कीमतें प्रभावित हुई हैं. राजा के शब्दों में, "अचानक हुआ यह कि अरेबिका की पर्याप्त उपज के बावजूद रोबस्टा की वजह से बाजार ऊपर-नीचे जाने लगा है."

रोबस्टा की कीमतों में बढ़ोतरी का देश के बागान मालिकों पर सीधा और अच्छा असर पड़ा है. भारतीय कॉफी बोर्ड के अनुसार, 2023-24 में देश में अनुमानित 3,74,200 टन कॉफी उपज का लगभग 70 फीसद हिस्सा रोबस्टा का था. बढ़ी हुई कीमतों ने कई लोगों को हैरान कर दिया. अलबत्ता, कुछ को इस बात का अफसोस है कि इस साल उन्होंने अपना कुछ स्टॉक पहले ही कम दरों पर बेच दिया.

हासन जिला बागान मालिक संघ (कर्नाटक) के अध्यक्ष के.एन. सुब्रह्मण्यम इस साल मार्च-अप्रैल में अपनी उपज को मई 2023 की तुलना में 3,200-3,250 रुपए अधिक (प्रति 50 किलोग्राम बैग) बेचकर खुश थे. कीमतों में सुधार के लिए बहुत लंबा इंतजार करने के कारण उन्हें पिछले साल लगभग 700 रुपए प्रति बैग का नुक्सान हुआ था और वे इस साल वही गलती नहीं करना चाहते थे.

हालांकि, उनके अपनी उपज बेचने के तीन सप्ताह बाद ही कर्नाटक में रोबस्टा की कीमतें और भी बढ़ गईं, जो 2,750-3,100 रुपए प्रति बैग (बीन्स की प्रोसेसिंग के आधार पर) तक पहुंच गईं. सुब्रह्मण्यम कहते हैं, "किसी ने भी कीमतों में इस तरह की उछाल की उम्मीद नहीं की थी." उनका अनुमान है कि करीब 70 फीसद लोगों ने अपना स्टॉक खत्म कर दिया है, जबकि जिनके पास अधिक संसाधन हैं, वे कीमतों में और बढ़ोतरी का आराम से इंतजार कर सकते हैं.

अंतरराष्ट्रीय कॉफी संगठन (आइसीओ) की अप्रैल की कॉफी बाजार रिपोर्ट के मुताबिक, रोबस्टा की कीमतें "अप्रैल, 2024 में 16.8 फीसद बढ़कर 193.65 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड हो गईं, जो जुलाई 1979 (जब यह औसतन 195.90 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड थी) के बाद से 45 वर्षों में इसका उच्चतम स्तर है." रिपोर्ट में वियतनाम के कृषि विभाग के अनुमान का जिक्र है, जिसमें सूखे के कारण 2023/24 में उनकी राष्ट्रीय कॉफी उपज में 20 फीसद की गिरावट के साथ 14.72 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो चार वर्षों में सबसे कम है.

आईसीओ के मूल्य सूचकांकों से पता चलता है कि 21 जून को रोबस्टा की कीमत 204.42 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड थी, जबकि अन्य हल्के स्वाद वाली अरेबिका उस समय 246.26 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड पर आंकी गई थी. पिछले वर्ष इसी महीने में रोबस्टा की कीमत 127.58 सेंट प्रति पाउंड थी, जबकि अरेबिका की कीमत 193.49 सेंट प्रति पाउंड थी.

राजा बताते हैं कि कॉफी की खपत करने वाले दो बड़े क्षेत्र यूरोप और अमेरिका में बड़े व्यापारिक घराने और कॉफी रोस्टर पिछले कुछ साल से कम स्टॉक रख रहे थे, जब कीमतें कम चल रही थीं. "अब कॉफी के लिए होड़ मची हुई है. यह आपूर्ति में कमी और मांग से जुड़ी समस्या दोनों है. इसलिए, कीमतें तेजी से बढ़ी हैं."

खुल गई किस्मत

भारतीय कॉफी बोर्ड के जुलाई 2023 के विश्लेषण से पता चलता है कि 2021-22 में वैश्विक कॉफी उत्पादन में देश की हिस्सेदारी लगभग 3.4 फीसद थी. देश में 57 लाख बैग (हरेक 60 किलोग्राम) का उत्पादन हुआ, जबकि वैश्विक आंकड़ा 16.7 करोड़ बैग है. उस वर्ष निर्यात एक अरब डॉलर के आंकड़े को पार करके 1.02 अरब डॉलर पर पहुंच गया था. फिलहाल, देश 2023-24 में 1.28 अरब डॉलर के निर्यात के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कॉफी निर्यातक है. भारतीय कॉफी की मांग वाले शीर्ष देशों में इटली, जर्मनी, बेल्जियम, रूस, तुर्की, पोलैंड, जॉर्डन, लीबिया और अमेरिका शामिल हैं.

कॉफी बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में देश के 3,52,000 टन कॉफी उपज का 70.5 फीसद कर्नाटक से आया. वहां बागान तीन जिलों कोडगु, चिकमगलूर और हासन में फैले हुए हैं. केरल में बागानों की हिस्सेदारी 20.5 फीसद है, उसके बाद तमिलनाडु में 5.3 फीसद है. शेष आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पूर्वोत्तर के नए पैदावार क्षेत्रों से आया.

इक्कीस जून को कर्नाटक में रोबस्टा चेरी के लिए कच्ची कॉफी की कीमतें 9,700-10,100 रुपए प्रति 50 किलोग्राम बैग पर चल रही थीं, जबकि रोबस्टा पार्चमेंट 15,700-16,000 रुपए प्रति बैग पर बिक रहा था (कॉफी बीन्स जिन्हें गीली प्रक्रिया के माध्यम से बेरीज से अलग किया जाता है उसे पार्चमेंट कहा जाता है, जबकि चेरी उन बीन्स को कहते हैं जिन्हें धूप में सुखाकर प्राकृतिक रूप से प्रोसेस किया जाता है)

 इसकी तुलना में अरेबिका चेरी की कीमत 9,100-9,300 रुपए प्रति बैग और अरेबिका पार्चमेंट की कीमत 15,100-15,400 रुपए प्रति बैग थी. चिकमंगलूर में मुख्यालय वाले कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव के.जी. कहते हैं, "मैंने अपने अनुभव में इतनी कीमतें पहले कभी नहीं देखीं."

लेकिन बागान मालिक की मानें तो यह मुनाफा पिछले चार-पांच साल के नुक्सान की ही भरपाई करता है. पिछले पांचेक साल में पश्चिमी घाट के प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में मॉनसून का पैटर्न अनिश्चित हो गया है, जिसमें देर से बारिश होती है और भारी वर्षा होती है. राजीव कहते हैं, "आमतौर पर हम कह सकते हैं कि मॉनसून जून और अगस्त के बीच ठीकठाक होता है और सितंबर में कम हो जाता है. लेकिन अब हम यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि हमारा मॉनसून कब आएगा और फिर कब जाएगा."

कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, 2023 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान, कर्नाटक के कॉफी उगाने वाले तीन जिलों कोडागु, चिकमंगलूर और हासन में क्रमश: 42 फीसद, 40 फीसद और 36 फीसद वर्षा की कमी दर्ज की गई. इस साल भी महत्वपूर्ण फरवरी-मार्च की अवधि के दौरान लंबे समय तक सूखा रहा है, जब पौधों को खिलने के लिए हल्की बारिश की आवश्यकता होती है.

इसने साल के अंत तक होने वाली अगली फसल के आकार को लेकर कुछ चिंता पैदा कर दी है. फूल आने से लेकर फल बनने तक की प्रक्रिया में लगभग आठ महीने लगते हैं, इसलिए कॉफी बेरी की कटाई नवंबर में शुरू होती है और जनवरी तक जारी रहती है.

बागान मालिक बताते हैं कि मौसम की अनिश्चितता से पैदावार प्रभावित हुई है, जबकि इनपुट और मजदूरी की लागत बढ़ रही है. सुब्रह्मण्यम के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में लागत में कम से कम तीन गुना वृद्धि हुई है. वे कहते हैं, "यह उद्योग तभी जीवित रह सकता है जब उत्पादकता बढ़ाई जाए." तब तक, कॉफी बागान मालिक ऊंची कीमतों के मौजूदा रुझान से मिलने वाली खुशी का आनंद तो ले ही सकते हैं.

—अजय सुकुमारन
 
बढ़त रोबस्टा को

 पहली बार रोबस्टा की कीमतें अरेबिका की कीमतों से आगे निकल गईं

 ऐसा दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कॉफी उत्पादक वियतनाम में सूखे के कारण हुआ

 आपूर्ति की कमी को देखते हुए वैश्विक रोबस्टा की कीमतें अप्रैल में 45 वर्षों में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं

 भारत के कॉफी उत्पादन का लगभग 70 फीसद रोबस्टा का है.

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