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आजकल होने वाला जुकाम जल्दी ठीक क्यों नहीं हो रहा?

कड़ाके की ठंड, प्रदूषण और कोविड की सावधानियां घटने के साथ इन्फ्लूएंजा वायरस के आक्रामक और बार-बार धमक पड़ने वाले रूपों की चपेट में आकर भारतीय लोग बीमार पड़ रहे हैं

इलस्ट्रेशन - सिद्धांत जुमडे
इलस्ट्रेशन - सिद्धांत जुमडे
अपडेटेड 4 मार्च , 2024

अधिकतर लोगों के लिए 'फ्लू होना’ सेहत का मामूली मसला है. इसमें मौसम बदलने पर बुखार, खांसी, सिरदर्द, बदनदर्द, नाक बहने और गले में तकलीफ सरीखे जाने-पहचाने लक्षण होते हैं और जिन्हें आराम करके और हल्की-फुल्की दवा लेकर ठीक कर लिया जाता है.

मगर देश भर के डॉक्टर इन दिनों एक ऐसे फ्लू की इत्तिला दे रहे हैं जो न केवल लंबा चलता है बल्कि इस लिहाज से गैरमामूली भी है कि इसके लक्षण अनोखे हैं और यह ठीक होने के बाद भी दोबारा जल्द आ धमकता है. 

इन्फ्लूएंजा के संक्रमणों में बढ़ोतरी को देखते हुए राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) ने जनवरी 2024 में इन्फ्लूएंजा का 2024 चतुर्भुज टीका लगवाने की सिफारिश की, जो इन्फ्लूएंजा ए के दो रूपों और इन्फ्लूएंजा बी के दो रूपों से सुरक्षा प्रदान करता है. इन्फ्लूएंजा सांस का संक्रमण है जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने पर बहुत छोटी-छोटी बूंदों से फैलता है.

इन्फ्लूएंजा वायरस चार प्रकार के होते हैं—टाइप ए, बी, सी और डी. इन्फ्लूएंजा ए और बी वायरस घूमते रहते हैं और उस इलाके में बड़े पैमाने पर स्थानीय मौसमी बीमारी पैदा करते हैं. केवल इन्फ्लूएंजा ए वायरस ही महामारियां पैदा करने के लिए जाने जाते हैं.

इन्फ्लूएंजा ए वायरस को दो उपप्रकारों में बांटा जाता है—ए(एच1एन1) और ए(एच3एन2) वायरस—जो इन दिनों घूम रहे हैं. ए(एच1एन1) को ए(एच1एन1)पीडीएम09 भी लिखा जाता है क्योंकि इसने 2009 में फ्लू की महामारी पैदा की थी और पुराने ए(एच1एन1) वायरस की जगह ले ली थी. एच1एन1 को 'स्वाइन फ्लू’ भी कहा जाता है, और यह सूअर व इंसान दोनों को संक्रमित कर सकता है. एनसीडीसी की एक रिपोर्ट ने ए(एच1एन1) पीडीएम09, ए(एच3एन2) और टाइप बी विक्टोरिया वंशावली के वायरसों की भारत में मौजूदगी की तरफ ध्यान दिलाया है.

बेंगलूरू के फोर्टिस सीजी रोड अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा के डायरेक्टर डॉ. आदित्य एस. चौटी कहते हैं, "हमने फ्लू का सामान्य से लंबा सीजन देखा, जिसमें मरीज ठीक होने के एक या दो हफ्ते बाद उन्हीं लक्षणों के साथ लौट आए." उनका कहना है कि ऐसा इस साल शहर में असामान्य रूप से लंबी सर्दी पड़ने और सर्द सुबह व गर्म दोपहर के साथ रोज तापमान में उतार-चढ़ावों की वजह से हुआ.

डॉ. चौटी यह भी कहते हैं, "हमारे यहां एक शब्द है जिसे बंगलौर ब्राँकाइटिस कहते हैं, जिसमें हवा में मौजूद एलर्जेन से लोगों में सर्दी या फ्लू सरीखे लक्षण विकसित होते हैं. दुनिया भर की यात्राएं कर रहे लोग भी वायरल स्ट्रेन ले ही आते हैं." उत्तर भारत में फ्लू सामान्यत: दो बार चरम पर पहुंचता है - मॉनसून के बाद (सितंबर-अक्टूबर) और सर्दियों के महीनों (दिसंबर-जनवरी) में. 

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2023 के अंत तक भारत में एच1एन1 के 5,350 मामले और 101 मौतें दर्ज की गईं. आंकड़ों से पता चलता है कि एच1एन1 के मामले और मौतें केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, सिक्किम, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में बढ़ीं. केरल में तो अच्छा-खासा इजाफा हुआ. 2022 में जहां केवल 94 मामले थे, 2023 में राज्य में 909 मामले दर्ज हुए. मौतें भी 2022 में 11 से बढ़कर 2023 में 53 हो गईं. महाराष्ट्र में 2022 में 215 मामले सामने आए, जो 2023 में बढ़कर 1,125 पर पहुंच गए.

अलबत्ता 2023 के पहले तीन महीने में एच3एन2 सबसे अधिक मामलों के साथ एच1एन1 और कोविड के मुकाबले प्रमुख उपप्रकार बना रहा. 2023 के पहले नौ हफ्तों (2 जनवरी से 5 मार्च) के दौरान भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के निगरानी नेटवर्क ने सात मौत सहित एच3एन2 के 451 मामले दर्ज किए (एच1एन1 के 41 मामले थे). 

बेहद संक्रामक एच3एन2 से ज्यादातर लोग हफ्ते भर के भीतर ठीक हो जाते हैं, कुछ मामलों में न्यूमोनिया और ब्राँकाइटिस सरीखी जटिलताएं पैदा हो जाती हैं जिनसे मौत तक हो सकती है. आइसीएमआर ने बताया कि 2023 में एच3एन2 के प्रकोप की चपेट में आए मरीजों में से करीब 10 फीसद गंभीर तीव्र श्वसन संक्रमण (एसएआरआइ) से पीड़ित थे और उन्हें ऑक्सीजन का सहारा लेना पड़ा, जबकि सात फीसद को आइसीयू की देखभाल की जरूरत पड़ी. आईसीएमआर के आंकड़ों से पता चला कि 2023 में एसएआरआई के प्रकोप से अस्पताल में भर्ती लोगों में से 50 फीसद में एच3एन2 का संक्रमण पाया गया.

मैक्स हेल्थकेयर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. संदीप बुद्धिराजा कहते हैं, "इस साल और पिछले साल के आखिर में हमने बड़ी तादाद में फ्लू के मामले देखे. हम आम तौर पर फ्लू को गंभीर बीमारी से जोड़कर नहीं देखते, पर कुछ मरीजों में गंभीर लक्षण विकसित हो सकते हैं.

वही लोग ज्यादा असुरक्षित हैं जो कोविड के दौरान थे—बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं, अनियंत्रित डायबिटीज, हृदयरोग, लीवर के रोग, कैंसर सरीखी सह-बीमारियों से ग्रस्त लोग, इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं ले रहे लोग—ये सभी जोखिम से घिरे हैं." डॉ. बुद्धिराजा यह भी कहते हैं कि एच3एन2 सरीखे कुछ स्ट्रेन से बीमारी लंबी चलती है जिसमें मरीज लगातार सूखी या खुश्क खांसी की शिकायत करते हैं.

फ्लू से आम तौर पर पारंपरिक लक्षणों के साथ ऊपरी श्वसन संक्रमण होता है जो पांच-सात दिन रहता है. मगर ज्यादा जोखिम से घिरे लोगों में न्यूमोनिया और दूसरी जटिलताएं विकसित हो सकती हैं. डॉ. बुद्धिराजा यह भी कहते हैं, "पिछले कुछ हफ्तों में फ्लू की जटिलताओं से ग्रस्त ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, खासकर उन्हें जिन्हें सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), अस्थमा या बेहद गंभीर ब्राँकाइटिस है."

राजधानी के एक और अस्पताल से भी ऐसी ही रिपोर्ट हैं. गुडग़ांव के सी.के. बिड़ला अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. तुषार तायल कहते हैं, "इस साल फ्लू के संक्रमण का बार-बार होना बढ़ गया है, पर मैंने यह भी देखा है कि लक्षण ज्यादा लंबे वक्त रहते हैं. एक हफ्ते के बजाय वे करीब दो हफ्ते बने रहते हैं." हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा वायरस में किन्हीं बदलावों की वजह से नहीं है.

कोच्चि के अमृता अस्पताल में संक्रामक रोग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपू टी.एस. कहते हैं, "वायरस ज्यादा आक्रामक नहीं हो रहा है. असल में हमारा अनुभव और खासकर एच3एन2 का अनुभव कम है."

मौजूदा फ्लू संक्रमण के अनोखेपन की वजह कहीं और है. सर्दियों और बढ़ते प्रदूषण की गहनता से लक्षण बिगड़ रहे हैं और संक्रमण फैल रहा है. मसलन, दिल्ली ने कम से कम 12 साल की सबसे सर्द जनवरी देखी. उत्तर के दूसरे हिस्सों ने भी शीत लहर से जंग लड़ी. जाती हुई ठंड बार-बार लौटकर आई. यही वे स्थितियां हैं जिनमें फ्लू का वायरस ज्यादा लंबे समय तक बाहर रहता है. कुछ निश्चित आंकड़ों से भी पता चलता है कि अत्यधिक सर्दी इंसान की रोगप्रतिरक्षा प्रणाली को सुस्त कर देती है.

एक और वजह कोविड-19 महामारी के बाद फिर फ्लू के संपर्क में आना है. डॉ. बुद्धिराजा कहते हैं, "कोविड के दौरान सब मास्क लगाते और अलग-थलग रहते थे. इसने हमें फ्लू होने से रोका. फ्लू के वायरस का फैलाव कम था और इसके खिलाफ शरीर की रोग प्रतिरोधक व प्रतिरक्षक शक्ति भी कम हो गई. इसलिए उन तीन साल में दुनिया भर में फ्लू के वायरस के खिलाफ रोगप्रतिरक्षा की स्थिति में गिरावट आई हो सकती है."

सुरक्षित कैसे रहें

इन्फ्लूएंजा के मौसमी वायरस खांसने और छींकने के जरिए तो फैलते ही हैं, फ्लू के वायरस से दूषित हाथों से भी फैलते हैं. इन्हें फैलने से रोकने के लिए लोगों को महामारी के नियम-कायदों की तरफ लौटना होगा—खांसते या छींकते वक्त अपने मुंह और नाक को रूमाल या कपड़े से ढकें और नियमित रूप से हाथ धोएं.

भीड़ भरी जगहों पर जाने से बचना चाहिए और जाना ही हो तो मास्क पहनकर जाएं. संक्रमण की तीव्रता को रोकने के लिए जरूरी है कि लक्षणों की शुरुआत के पहले 48 घंटों के भीतर डॉक्टर से सलाह लें. डॉ. बुद्धिराजा कहते हैं, "ज्यादा जोखिम वाले मरीजों के लिए ये हिदायतें जरूरी हैं. फ्लू अगर गंभीर हो जाता है तो जिंदगी के लिए खतरा हो सकता है."

डॉ. तायल कहते हैं, "मेरा कहना यह है कि लोग खुद अपना इलाज न करें और डॉक्टर से सलाह लिए बिना न तो पैरासिटामोल लें और न भाप लें. यह बेहद जरूरी है." विशेषज्ञ नुस्खे के बिना ऐंटीबायोटिक या स्टेरॉइड लेने के खिलाफ भी आगाह करते हैं. डॉ. तायल कहते हैं, "अव्वल तो आपको कोई दवाई लेने की जरूरत नहीं है. फ्लू की ज्यादातर बीमारियां आराम, पौष्टिक खाने और तरल पदार्थों से खत्म हो जाती हैं."

फ्लू के संक्रमण को रोकने का दूसरा तरीका टीका लगवाना है. इन्फ्लूएंजा का नया टीका चार स्ट्रेन से बचाता है - इन्फ्लूएंजा ए के दोनों स्ट्रेन और इन्फ्लूएंजा बी के दो स्ट्रेन. डॉ. बुद्धिराजा बताते हैं, "हर साल नया टीका आता है जिसकी बनावट उस भूगोल में हावी वायरस के स्ट्रेन के आधार पर कुछ अलग हो सकती है. नया टीका उत्तर भारत के लिए आम तौर पर सितंबर के आसपास जारी किया जाता है. इसे लेने का सबसे अच्छा वन्न्त यही है."

टीका केवल करीब एक साल की सुरक्षा देता है. डॉ. बुद्धिराजा कहते हैं, "कोई भी टीका 100 फीसद बचाव नहीं करता. हालंकि यह गंभीर लक्षणों और मौत की संभावना को बहुत कम जरूर कर देगा." वे जोर देकर कहते हैं कि यह कोविड से बचाव नहीं करता.

फ्लू का टीका तो मिल रहा है, पर डॉक्टरों का कहना है कि इसकी मांग काफी कम है. डॉ. चौटी कहते हैं, "ज्यादातर लोग सोचते हैं कि बच्चों को टीके लगवाना अनिवार्य है, पर वयस्क टीके मायने नहीं रखते, लेकिन यह कतई सच नहीं है. आखिर, जिंदगी के विभिन्न चरणों में सुरक्षा की जरूरत पड़ती ही है."

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