राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की ओर से आयोजित होने वाले नाटकों के मशहूर सालाना जलसे भारत रंग महोत्सव (भारंगम) को पच्चीस साल पूरे हो रहे हैं. उसके इस सिल्वर जुबली आयोजन का आगाज दिल्ली में न होकर पहली दफा मुंबई में हो रहा है, विद्यालय के नए निदेशक चितरंजन त्रिपाठी निर्देशित ताजमहल का टेंडर से.
यह भ्रष्टाचार पर सैटिरिकल कॉमेडी है. वैसे होना था आशुतोष राणा अभिनीत हमारे राम लेकिन ऐन वक्त पर बताते हैं मना हो गया. भ्रष्टाचार और राम दोनों ही इन दिनों हमारे बेहद करीब हैं. जो हो, भारंगम इस दफा 1-21 फरवरी के बीच दिल्ली, मुंबई के अलावा भुज (गुजरात), डिब्रूगढ़ (असम), विजयवाड़ा (आंध्र प्रदेश), रामनगर (उत्तराखंड) सरीखे दूरदराज के शहरों समेत कुल 15 स्थानों पर हो रहा है.
100 से ज्यादा नाटकों के यही कोई 150 शो. बघेली के बसामन मामा, उत्तराखंड की सेनानी तीलू रौतेली और हिंदी, बांग्ला, मराठी आदि के कई चर्चित नाटकों से लेकर रूस के कास्टिंग और इटली के द ग्लोबल सिटी तक. प्रसन्ना, पियाल भट्टाचार्य, सत्यब्रत राउत और मकरंद देशपांडे सरीखे दिग्गजों के काम तो देखें ही, कुछ युवाओं की रचनादृष्टि पर गौर करना होगा.
मसलन इश्तियाक खान, अजय कुमार, सौरभ अनंत, साजिदा साजी, भाषा सुंबली, कन्हैयालाल कैथवास, हिमांशु वाजपेयी. ये रंगकर्मी हाल के वर्षों में अपनी कल्पनाशीलता से सबका ध्यान खींचते आए हैं.
उत्सव के आखिरी नाटक समुद्र मंथन के निर्देशक भी चितरंजन त्रिपाठी हैं. विद्यालय के पिछले स्थायी निदेशक वामन केंद्रे ऐसे ही अतिरिक्त कलात्मक लोभ में अपना विजन खो बैठे थे. त्रिपाठी क्या संयम बरत पाएंगे?
विंडरमेयर थिएटर फेस्ट : ब्लैकबॉक्स में वज्रासन
26 जनवरी की लपेट वाले हफ्ते में बरेली शहर में भी कोहरे का घना गणतंत्र था. उत्तर भारत के दूसरे शहरों की तरह प्राण प्रतिष्ठा वाले झंडों का झुंड. सिविल लाइंस के विंडरमेयर सभागार में चर्चित कवयित्री बाबुषा कोहली पाठ कर रही थीं: जिनके राम जाते हैं, उन्हीं के राम आते हैं; हमारे राम हममें हैं, कहीं आते न जाते हैं.
सामने श्रोताओं में मौजूद अभिनेता दानिश अहमद भी हैं. शहर के रंग विनायक रंगमंडल की चर्चित हो चली और इसी ब्लैकबॉक्स स्टेज पर होने वाली ढाई घंटे की रामलीला में वे राम होते हैं. अंत में उनकी आरती उतारने का सिलसिला लंबा खिंचने पर ऑडियंस को कहना पड़ता है कि भगवान थक गए हैं, आराम चाहते हैं.
कविता पाठ से पहले दानिश स्टेज पर विलियम के किरदार में थे. नाटक था अवेकनिंग्स, ब्रिटिश न्यूरोलॉजिस्ट ओलिवर सैक्स की इसी नाम की मशहूर किताब पर. पास के सिनेमाघरों में सीटों पर फैलकर फाइटर और मैं अटल हूं देखने के बजाय किशोर-किशोरियां ठसाठस भरे सभागार में घुप्प अंधेरे में अगली रो के दर्शकों के लगभग जूतों पर बैठने को जगह बना रहे थे. स्लीपिंग सिकनेस की यह करुण ट्रैजिडी देखने के लिए.
उन्हीं के बीच सिकुड़े-सिमटे, वज्रासन में बैठे हैं इस सभागार और पूरी आयोजना के सूत्रधार डॉ. ब्रजेश्वर सिंह. विंडरमेयर थिएटर और लिटरेचर फेस्टिवल का यह 14वां साल है. खुद को समेटकर उन्होंने जो जगह बनाई-बचाई है उससे कई चीजें शुमार हो पाई हैं.
मसलन, दुनिया भर का साहित्य. अवेकनिंग्स लिखने-निर्देशित करने का जिम्मा उन्होंने रंगविनायक की ही रंगकर्मी शुभा भट्ट भसीन को सौंपा. लेकिन 7-8 साल पहले अमेरिकी न्यूरोसर्जन डॉ. पॉल सुधीर कलानिधि की किताब व्हेन ब्रेथ बिकम्स एअर पर उन्होंने खुद पलाडिन नाम से नाटक लिखकर यहीं के कलाकारों से करवाया था. दर्शकों में दिग्गज अभिनेता विनीत कुमार मुंबई से और कई रंगकर्मी दूसरे शहरों से उनके बुलावे पर बस नाटक देखने चले आए हैं.
उधर, आधी रात के करीब पास ही की कॉलोनी में एक ठिकाने से डिनर करके लौटते हुए चर्चित अभिनेता मानव कौल टीम के 8-10 रंगकर्मियों के साथ घने कोहरे और घुप अंधेरे में भटक गए दिखते हैं. पर कोई शिकवा नहीं.
अपने सोलो पटना का सुपरहीरो समेत यहां तीन नाटकों में अभिनय करने वाले मुंबई के अरण्य थिएटर ग्रुप के घनश्याम लालसा के लिए विंडरमेयर घर जैसी जगह है. ''अरसे से यहां आता रहा हूं. मेरे सोलो में 30-40 लोग डॉक्टर साहब के अस्पताल के ही मौजूद थे.
उनके लिए यह ऐसा ही था कि चलो, बच्चा भी अच्छा काम करने लगा.’’ वे यह भी अंडरलाइन करना नहीं भूलते कि इस फेस्टिवल का क्यूरेशन और इंतजाम देश-दुनिया के कई उत्सवों से बेहतर है.
इस बार 24-31 जनवरी तक चले विंडरमेयर फेस्टिवल की आयोजकीय दृष्टि ने इसे शहर के एक अंतरंग सांस्कृतिक केंद्र में तब्दील कर दिया है. पर अब यहां से आगे बढ़ने की दरकार है. सार्थकता इसमें होगी कि विंडरमेयर धीरे-धीरे गंभीर चर्चा-विमर्श के केंद्र में तब्दील हो.
बरेली में कबूतरबाजी की परंपरा पर एक डॉक्यूमेंट्री भी प्रोड्यूस कर रहे डॉ. सिंह कहते हैं, ''शहर के मिजाज को देखते हुए और कौन-से पहलू जोड़े जाएं, इस पर संजीदा लोगों से मशविरा होता रहा है. देखते हैं, कहां तक कामयाबी मिलती है.’’

