कंप्यूटर स्क्रीन पर जूम कॉल चल रही है. बत्तीस लोग डायरी-पेन लिए दम साधे अपनी-अपनी स्क्रीन निहार रहे हैं. सब्ज़ बोर्ड पर चॉक से कुछ लिखा हुआ है. मतलब मालूम ना होने की वजह से ये अक्षर नहीं बल्कि आकृतियां लग रही हैं. छोटी-छोटी नाव जैसी कुछ, जिनके साथ कुछ बिंदियां लगी हुई हैं.
बोर्ड के दाहिनी ओर सबसे ऊपर एक खड़ी पाई बनी दिख रही है. ऐसी ही एक दूसरी लकीर के सिरहाने बारीक-सा निशान बना हुआ है. एकबार को ये खड़ी फसल पर मंडराते हंसिए का भ्रम देती है. बीस मिनट पहले शुरू हुई इस जूम कॉल में एक जादू अब बस घटने ही वाला है.
सब्ज़ बोर्ड वाली खिड़की से आवाज आती है, ''अब बहुत ध्यान से बोर्ड पर देखेंगे कि कैसे हम अलिफ़ और बे समूह को जोड़ते हैं. आपने अभी सुना कि अलिफ़ नॉन कनेक्टर है, लेकिन बे समूह कनेक्टर है. तो होगा ये कि अलिफ़ के जुड़ने से बे अपनाएगा शॉर्ट फॉर्म और नीचे नुक़्ते के साथ कटोरीनुमा बे का बायां हिस्सा ऊपर की तरफ बढ़ा देने से 'ब’ बन जाएगा 'बा’, ऐसे ही बनेंगे पा, ता, टा, सा. आपके लिए इसे दुहरा रहा हूं, बहुत ध्यान से देखिएगा...”
महज बीस से पच्चीस मिनट लगे और बत्तीस में से ज्यादातर लोग उर्दू में दो अक्षरों वाले कई शब्द पढ़ने-लिखने लगे हैं. बाबा, तात, पापा, बात, टाटा जैसे कई शब्द. आकृतियों की तरफ अर्थ की नवजात खिड़की खुल जाती है. जादू. आधे घंटे पहले किसी नए अनजान शहर के बस स्टॉप पर मिला शख्स जैसे अपने ही जिले-जवार का निकला.
यह पहचान करवाने की उस्तादी है, जिसके उस्ताद हैं अभिषेक शुक्ला. अदब के शहर लखनऊ के इंदिरा नगर में अभिषेक के घर से चल रही यह उर्दू की क्लास है. बीते कुछ तीन-चार बरस में ही अभिषेक के उर्दू सिखाने का तरीका यूं मशहूर हुआ है कि ज़्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर 'उर्दू कैसे सीखें' के जवाब में अभिषेक शुक्ला के नाम का सुझाव कमेंट बॉक्स में लिखा दिखाई देता है.
ज़ाहिर सा सवाल है कि उर्दू सिखाने वाले तमाम सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में सिखाने से जुड़ा कौन सा कारक है जो अभिषेक के यहां सीखने वालों को ज़्यादा महसूस होता है? नयापन. मसान जैसी शाहकार फिल्म के लेखक और 'मोह-मोह के धागे...' गीत के लिए सवश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके गीतकार-लेखक वरुण ग्रोवर ने अभिषेक से जूम क्लास में उर्दू सीखी है.
वरुण कहते हैं, "अभिषेक जी की शाइरी के, और उनकी शख्सियत के हम काफ़ी वक़्त से मुरीद रहे हैं. जब पता चला कि हमारे पसंदीदा लेखक ख़ुद हमें उर्दू पढ़ाएंगे तो हम बड़ी उम्मीदों के साथ आए. ग़ज़ब की बात यह कि अभिषेक जी ने जिस तरह से उर्दू पढ़ाई, सारी उम्मीदों से कहीं आगे निकल गए. इतनी आसानी से, इतने वैज्ञानिक तरीके से, और इतने नाज़ से उन्होंने हमें पहले लिपि, फिर शब्द-रचना, फिर वाक्य-रचना, और फिर मानी, और मानी के पीछे का इतिहास पढ़ाया कि ज़िदगी में कभी मैंने किसी क्लास का इतना इंतिज़ार नहीं किया जितना अभिषेक जी की उर्दू क्लासेज़ का."
अभिषेक की उर्दू क्लास से पढ़कर निकले छात्रों का क्षितिज इतना विशाल और रंग-बिरंगा है कि आप हैरान हुए बिना नहीं रह सकते. पेशेवर डॉक्टर से लेकर प्रशासनिक अधिकारी और प्रोफेसर से लेकर इतिहासकार तक. जिस बैच में सिनेमा का रिसर्चर बैठा है उसी बैच में दिग्गज फिल्मकार मौजूद है.
दोनों के हिस्से बराबर की डांट और बराबर की हौसलाअफ़ज़ाई आती है. खांटी समाजवाद. मज़े की बात है कि उर्दू से इश़्क का यह सिलसिला दुनिया के बाकी आविष्कारों की तरह एक आवश्यकता से जन्मा. उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर से लखनऊ के सिटी मोंटेसरी स्कूल तक आते-आते अभिषेक अपनी अवधी-भोजपुरी खिचड़ी भाषा से जूझते हुए हिंदी का ठीया पकड़ चुके थे.
डिबेट कंपीटिशन में फर्स्ट प्राइज मिला, लेकिन पुरस्कार समारोह से पहले एक मुशाइरा था जो न चाहते हुए भी सुनना पड़ा. मुशाइरा ख़त्म होते-होते अभिषेक उर्दू ज़बान को दिल दे बैठे. अभिषेक कहते हैं, "इस मुशाइरे के दौरान ही मुझे एहसास हुआ कि स्टेज पर बैठे लोग जिस मीडियम में अपनी बात कह रहे हैं यह वही मीडियम है इज़हार का जिसमें मैं अपनी बात कहना चाहता हूं."
"इसके बाद तलाश शुरू हुई एक उस्ताद की जो मुझे मिले भी लेकिन उनसे मेरा मिज़ाज नहीं मिला. इसके बाद मुझे एक और बुज़ुर्ग मिले जिनका नाम पंडित आजिज़ मातवी था. मेरा जो सफ़र है अभी तक का, उनके ज़िक्र के बग़ैर अधूरा है. वो पंडित जी ही थे जिन्होंने मुझे ये हौसला दिया कि मैं न सिर्फ ज़बान सीख सकता हूं, बल्कि शाइरी का छंद शास्त्र सीख कर शाइरी भी कर सकता हूं."
यह जबान के लिए जुनून और ख़ालिस प्यार ही था कि एक सरकारी अधिकारी ने न सिर्फ़ उर्दू सीखी बल्कि शाइरी और उर्दू अदब में अपनी अलग जगह बनाई. अभिषेक ने साल 2010 में स्टेट बैंक ऑफ पटियाला बतौर प्रोबेशनरी ऑफिसर जॉइन किया. स्टेट बैंक ऑफ पटियाला का बाद में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ विलय हुआ और 2016 से अभिषेक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में उप-प्रबंधक के पद पर हैं.
उर्दू सिखाने की शुरुआत कैसे हुई? जवाब में अभिषेक कहते हैं, "ये कोविड के दौरान का वाक़या है. हमारे अज़ीज़ और करमफ़र्मा बड़े भाई कैलाश जोशी ने मुझसे कहा कि किसी ने उनसे पूछा है कि क्या वो किसी ऐसे शख़्स को जानते हैं जो ऑनलाइन उर्दू सिखा सके? क्या मैं सिखाना चाहूंगा? मुझे पहले तो यही लगा कि मैं नहीं कर सकूंगा. लेकिन फिर सोचा कोशिश करने में क्या हर्ज है. नतीज़तन, अनुराधा जी और उमा जी, ये दो लोग जिनका तअल्लुक़ केरल से है, मेरे पहले दो स्टूडेंट बने".
एक उस्ताद के तौर पर 36 वर्ष के अभिषेक के हिस्से जो प्यार, इज़्ज़त और भरोसा आया है वह इतना ज़्यादा है कि बड़े-बड़े उस्तादों को उनकी उस्तादी से रश्क हो उठे. कोविड के दौरान शुरू हुए पहले बैच की स्टूडेंट रहीं 55 वर्ष की अनुराधा वारियर जब भावुक होते हुए कहती हैं कि "ऐसा उस्ताद अगर ज़िदगी में पहले मिल गया होता तो आज मैं जहां चाहे वहां हो सकती थी", तो एक ऐसा सवाल उपजता है जिसका जवाब बिना अभिषेक की क्लास किए नहीं जाना जा सकता.
"अच्छा मैं अब जो अल्फ़ाज़ लिख रहा हूं इसे क्लास में कितने लोग पढ़ सकते हैं, एक बार कोशिश कीजिए?" अभिषेक की इस शीरीन आवाज़ से कंप्यूटर स्क्रीन के उस तरफ बैठे शागिर्द की याददाश्त में जिस सुकून के साथ सबक़ अपनी जगह बनाता है, उसका सानी खोजना हो तो 'बचपन की लोरी' के अलावा और कुछ याद नहीं आता.
कोई हैरानी की बात नहीं, अमेरिका में रहने वालीं केरल की अनुराधा कहती हैं कि "उर्दू सीखने का मन और मौक़ा एक साथ आए तो कोविड में पापा गुज़र गए. उर्दू का शौक़ पापा के साथ देखी फ़िल्मों की वजह से था. किसी तरह ख़ुद को मनाया और क्लास जॉइन की. उस्ताद की उर्दू क्लास ने मेरे मन को कितना हौसला दिया इसे कहने के लिए शब्द नहीं मेरे पास." यह अभिषेक की आवाज़ में घुली रूहानियत का असर होगा, जो मन की टूटन पर उस्ताद की थाप सा महसूस होता है.
अभिषेक इस साल जनवरी से 'ज़बान-ए-उर्दू' का नौवां बैच पढ़ा रहे हैं. सितंबर, 2020 में पहले बैच से अब नौवें बैच तक के सफ़र पर वे कहते हैं, "इंसान को अगर ज़िदगी में ये पता चल जाए कि उसकी ख़ुशी कहां है तो यक़ीनन उसे उसकी ओर बढ़ना चाहिए. मुझे उर्दू पढ़ाने के बाद पता चला कि मेरे लिए यही वो सफ़र है."
अपने उस्ताद के कभी न थकने पर जब अमेरिका में 67 साल के डॉक्टर गुरी सिंह बात करते हैं तो उनकी आवाज़ की खनक सुनने लायक़ होती है. डॉक्टर गुरी कहते हैं, "साल 2020 था जब मुझे मेरे एक मरीज़ ने अभिषेक शुक्ला की उर्दू क्लासेज़ के बारे में बताया. उर्दू से मेरी पुरानी जान-पहचान थी क्योंकि परिवार में उर्दू पढ़ने-बोलने वाले लोग थे. सोचा, एक बार जॉइन करते हैं क्लास. वो दिन था कि मैंने उन्हें उस्ताद माना और ताउम्र मानता रहूंगा. जो इल्म में बड़ा है वही उस्ताद है. उर्दू सिखाने के लिए अभिषेक ने जो तरीक़ा ईजाद किया है वो बेजोड़ है."
सिखाने के जिस विज्ञान की बात तीन बार भारत आकर उस्ताद से मिल चुके गुरी सिंह या अभिषेक का हर एक स्टूडेंट कहता है वह साधते-साधते सधा है. अभिषेक बताते हैं, "पहले बैच में साथियों की तरफ़ से आए रिस्पॉन्स ने मेरी बहुत हौसलाअफ़ज़ाई की और मुझे लगा कि ये बेहद शानदार काम जारी रखना चाहिए. बिक्सू जैसा शानदार ग्राफिक नॉवेल लिखने वालीं राजकुमारी ने क्लास के स्ट्रक्चर को डिजाइन करने में मेरी बहुत मदद की." इस स्ट्रक्चर पर किन बातों का असर रहा होगा? ये जानना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि यही वे वजहें हैं जो किसी को भी नई भाषा तक पहुंचने से रोकती हैं.
नॉर्वे में पेशे से रेडियोलॉजिस्ट और कुली लाइंस जैसी शोधपरक किताब के लेखक डॉ. प्रवीण झा उर्दू क्लास के छठे बैच में थे. प्रवीण ध्यान दिलाते हैं, "अभिषेक ख़ुद हिंदी के बैकग्राउंड से आते हैं. इसलिए वो अच्छी तरह जानते हैं कि हिंदी या गैर-उर्दू बैकग्राउंड से आया स्टूडेंट कहां सबसे ज़्यादा परेशान होगा. उन्होंने कोर्स इस तरह से डिजाइन किया है कि ये ट्रेडिशनल और मॉडर्न उर्दू टीचिंग का मिक्स है. बहुत संभावना थी कि उर्दू को क्लास में वज़नी बना दिया जाता लेकिन इसे जिस तरह बेहद आसान रखा गया है वो अपने आपमें एक मिसाल है."
यह बात भी ध्यान रखने वाली है कि अभिषेक की उर्दू क्लास जॉइन करने वाले ज्यादातर लोग किसी न किसी पेशे में हैं. दफ़्तर या कामकाज से इतर कुछ सीखने के लिए टाइम मैनेजमेंट का कोर्स के डिजाइन पर असर बताते हुए अभिषेक कहते हैं, "क्लास का फॉर्मेट ऐसा है कि तीन महीने में 36 क्लासेज़ रखी जाती हैं, महीने में 12 क्लासेज़. रात नौ से साढ़े नौ के बीच क्लास शुरू होती है, घंटे सवा घंटे के लिए. किसी भी छुट्टी के दिन क्लास नहीं होती. मक़सद, उर्दू पढ़ना और लिखना सिखाने के साथ ज़बान की और भी कई बारीकियां सिखाना है जिनमें जेंडर का सही इस्तेमाल, मुहावरे और दूसरी बहुत सी चीज़ें शामिल हैं."
"ग़ज़ल में लोगों की बढ़ती हुई दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए चार क्लासेज़ ग़ज़ल के स्ट्रक्चर, आर्ट और एप्रीसिएशन पर भी होती हैं. ख़ास ग़ज़ल कहने वालों के लिए अलग से वर्कशॉप डिजाइन की गई है, वो उर्दू क्लास से अलग होती हैं". ज़बान समेत और बारीकियों पर बारीक बात कहते हैं मशहूर गीतकार, स्क्रीनराइटर और हालिया रिलीज फिल्म थ्री ऑफ अस से अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले स्वानंद किरकिरे.
उनका कहना है, "अभिषेक की उर्दू क्लास में पता चलता है कि ये उर्दू सीखने से कहीं ज़्यादा है. किसी शाइर से ज़बान सीखने में आप ज़बान तो सीखते ही हैं, साथ ही उस ज़बान से मुहब्बत भी सीखते हैं. उर्दू की पूरी दुनिया से जब अभिषेक जैसा अदीब और शाइर पर्दा हटाता है तो आप इस ज़बान में कहीं गहरे उतरने का मौक़ा पाते हैं."
स्वानंद की इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका में साइकोलॉजिस्ट 47 वर्षीय रूपज्योत कौर बेहद उत्साह से कहती हैं, "अगर मुझे अभिषेक जी जैसे टीचर मिले होते तो आज मैं आइंसटीन होती." देखने वाले इस बात में अतिशयोक्ति अलंकार की भरपूर संभावना देख सकते हैं, लेकिन उर्दू क्लास के दूसरे बैच से नौवें तक लगातार हर बैच में मौजूद रहीं.
रूपज्योत की इस बात में ज़मीन तलाशने की संभावना भी उतनी ही भरपूर दिखाई देती है जब वे कहती हैं, "जब भी अभिषेक जी को क्लास में किसी ऐसे सवाल का सामना करना पड़ा जिसका जवाब उन्हें मालूम नहीं था, तो उन्होंने सबके सामने न केवल ये स्वीकार किया बल्कि अगले दिन पूरी किताब पढ़कर क्लास में आए और ओरिजिनल सोर्स के साथ जानकारी साझा की, ऐसा आपने किसी भी टीचर के साथ आख़िरी बार कब अनुभव किया था."
अभिषेक की उर्दू क्लासेज़ का एक अनुभव और है जिसे गाहे-बगाहे उनके स्टूडेंट साझा करते हैं. जैसे किसी कश्मीरी फिरन के भीतर कांगड़ी सुलगती है, ठीक वैसे ही जब-जब क्लास का माहौल ठंडा होता है कोई न कोई लतीफ़ा या किस्सा क्लास में ज़रूरी गर्माहट घोल देता है.
मशहूर लेखक और डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर नसरीन मुन्नी कबीर कहती हैं, "अभिषेक की क्लास कभी बोझिल नहीं होती. ज़रूरी गंभीरता होगी, तो उतनी ही हंसी भी होगी." साल 2020 में राजकमल प्रकाशन से छपे अपने काव्य संग्रह हर्फ़-ए-आवारा से अदबी हल्क़े में अपनी पहचान बना चुके अभिषेक उर्दू के सामने खड़ी चुनौतियों से फ़िक्रमंद हैं. उनका कहना है, "उर्दू के सामने एक चुनौती तो उसके मानकीकरण की दिशा में हो रहे नाकाफ़ी प्रयास हैं, दूसरी बड़ी चुनौती ऐसे लोग हैं जो बजाए इसके कि ज़बान के लिए मिल कर माहौल बनाया जाए. कभी स्क्रिप्ट तो कभी किसी और चीज़ की आड़ में ऐसी फिज़ा बना देते हैं कि नए आने वालों का दम घुटता है. तो क्या हुआ अगर कोई बग़ैर उर्दू रस्मुल ख़त यानी स्क्रिप्ट सीखे शाइरी कर रहा है? मुमकिन है कि एक दिन वो लिपि सीखने की तरफ़ भी आ जाए, नहीं भी सीखता है तो उसकी शाइरी उर्दू ही की शाइरी रहेगी."
बगैर उर्दू लिखे शाइरी करने पर 'बाहरी' मान लिए जाने की अभिषेक की यह फिक्र इसलिए भी वाजिब है क्योंकि इसी उर्दू में ऐसे शाइरों की भी एक भरी-पूरी परंपरा रही है जो उम्मी (निरक्षर) थे. ऐसे ही एक शाइर जो लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे, उनके इस शेर पर ग़ौर कीजिए:
"तूफान-ए-नूह में वो बुलंदी थी आब की,
पानी को नापती थी किरन आफ़ताब की"
इस शे’र को उर्दू शाइरी की रवायत से क्या सिर्फ़ इसलिए हटाया जा सकता है क्योंकि इसे कहने वाले शाइर को उर्दू लिखनी नहीं आती थी? इस पर अभिषेक कहते हैं, "जिसे उर्दू नहीं आती उसे अपने बराबर न समझना और उसे अपने दाइरे से बाहर रखना ख़़ुद उर्दू के हक़ में नहीं है."
बीते कुछ बरसों में अभिषेक ने जिस तरह दुनिया भर में सैकड़ों लोगों की एक ज़बान से पहचान करवाई, उससे उम्मीद की पुरानी वसीयत पर कई नए नाम दर्ज हुए हैं. अभिषेक का ही एक शे’र इस उम्मीद पर कितना मौज़ूं है कि:
''अपनी जैसी ही किसी शक्ल में ढालेंगे तुम्हें
हम बिगड़ जाएंगे इतना कि बना लेंगे तुम्हें".

