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पार्थ सालुंखे : रिकर्व तीरंदाजी का 'अर्जुन'

अब सही राह पर बढ़ता नजर आ रहा है तीरअंदाजी चैंपियन पार्थ सालुंखे का करियर.

पार्थ सालुंखे
पार्थ सालुंखे
अपडेटेड 3 अगस्त , 2023

शैल देसाई

पार्थ सालुंखे ने कोरियाई तीरअंदाजों के बारे में काफी सुन रखा था. इस 9 जुलाई को आयरलैंड में वर्ल्ड आर्चरीयूथ चैंपियनशिप के रिकर्व अंडर-21 के फाइनल में वे कोरियाई तीरअंदाज सोंग इनजुन के सामने खड़े थे. उनकी राय में, ''कोरियाई ऊंचे दर्जे के एथलीट हैं. उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह प्रतिष्ठा कमाई है. मगर मैंने तय किया कि मेरा प्रतिद्वंद्वी कौन है, इस पर ध्यान न दूंगा. मैं बस अपने खेल के तरीकों के बारे में सोचता रहा.’’

सालुंखे ने हरियाणा के सोनीपत की चिलचिलाती गर्मी में प्रशिक्षण लिया जबकि लिमरिक की स्थितियां इसके मुकाबले नम और सर्द थीं. तेज मौसमी हवाओं ने निशाना साधना और मुश्किल बना दिया. फाइनल की शुरुआत में सालुंखे पिछड़ गए लेकिन आखिरी तीर पर आठ के स्कोर ने 19 वर्षीय तीरअंदाज को जीत और रिकर्व तीरंदाजी में भारत का पहला युवा विश्व चैंपियन कहलाने का गौरव दिलाया. उसी हफ्ते पहले उन्होंने रिद्धि के साथ रिकर्व अंडर-21 मिश्रित टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीता था. टूर्नामेंट में भारत ने सबसे ज्यादा 11—छह स्वर्ण, एक रजत और चार कांस्य—पदक जीते. कोरिया (छह स्वर्ण और चार रजत) के साथ दूसरे पायदान पर रहा.

महाराष्ट्र में सतारा के रहने वाले पार्थ ने सात साल की उम्र से तीरअंदाजी शुरू की. शुरू में उन्होंने क्रिकेट से लेकर किकबॉक्सिंग तक सब कुछ आजमाया. मगर तीरअंदाजी की शांतचित्तता उन्हें धीरे-धीरे आगोश में लेती गई. उन्हें याद है कि वई में खेले गए अपने पहले मुकाबले में उन्होंने 10 अंक हासिल किए. वे तरक्की की राह पर थे कि तभी कोच के चले जाने से उन्हें झटका लगा. यही वक्त था जब उनके पिता सुशांत ने मार्गदर्शक की भूमिका संभाल ली और ऑनलाइन वीडियो के जरिए तीरअंदाजी की बारीकियां सीखने लगे. पार्थ कहते हैं, "वे चीजों को अच्छी तरह समझकर मुझे समझाते. मां पढ़ाई में मदद करतीं. तीरअंदाजी में आने के बाद पढ़ाई पर ध्यान न दे पाया."

दसवीं में पार्थ को 82 फीसद अंक मिले. अगले साल एक बड़ा फैसला परिवार का इंतजार कर रहा था. खेल में करियर बनने की कोई गारंटी न थी, पर उन्होंने तीरंदाजी में ही आगे बढ़ने का फैसला किया. एक बार मेडल आना शुरू होने के बाद लगा कि अब बात बन सकती है.

घर से दूर भारतीय खेल प्राधिकरण के सोनीपत केंद्र में जाना मुश्किल फैसला था. मगर एक बार जब सालुंखे तीरअंदाजी की नफीस बारीकियों में उलझे, तो इसमें डूबते गए. कोच राम अवधेश के मातहत वे आत्मविश्वास से भरे हैं और एक दिन ओलिंपिक में सोना जीतने का सपना देख रहे हैं.

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