देश भर के कलाकारों को एक छत के नीचे लाने के लिए प्रतिबद्ध मुंबई का पृथ्वी थिएटर अपने वजूद के चार दशकों में मंचीय कलाओं का सालाना उत्सव आयोजित करने से कभी नहीं चूका था. लेकिन महामारी ने शहर की इस सबसे अव्वल रंगमंचीय धरोहरों में से एक को भी दो साल तक मंच पर अंधेरा ही रखने को मजबूर कर दिया. इस साल की शुरुआत में यह रोज एक नाटक की योजना के साथ फिर खुला और अब अपने सालाना थिएटर फेस्टिवल के तहत मजेदार नाटकों के मंचन के लिए तैयार है.
नवंबर की 3 तारीख से शुरू होकर 14 तक चलने वाले दो हफ्तों के इस फेस्टिवल में कई नाटक, म्यूजिक कंसर्ट, नृत्य प्रस्तुतियां, रीडिंग और डिस्कशन जैसे हिस्से रहने वाले हैं. पृथ्वी थिएटर के डायरेक्टर कुणाल कपूर (ऊपर दाएं) बताते हैं कि फेस्टिवल का ताना-बाना बुनते हुए वे रंगमंच के सदियों पुराने फलसफे से प्रेरित थे कि ''रंगमंच पर कभी अंधेरा नहीं होता.’’
कपूर को पूरा यकीन है कि दर्शक पृथ्वी फेस्टिवल की तरफ बड़े पैमाने पर खिंचे चले आएंगे. इसके लिए उन्हें अतिरिक्त जतन नहीं करना पड़ेगा. वे कहते हैं, ''यह बड़े सुकून वाली बात है कि जब से सिनेमाघरों/सभागारों में 100 फीसद सीटों पर दर्शक बुलाने की इजाजत मिली है, पृथ्वी थिएटर में नाटक देखने रोज औसतन 83 फीसद लोग आ रहे हैं.’’
महामारी के दो साल पृथ्वी थिएटर ने वक्त के रंग-ढंग में ढलते हुए ऑनलाइन कार्यशालाओं की शृंखला आयोजित की. इस तजुर्बे ने कपूर को एहसास दिलाया कि पृथ्वी थिएटर का जीता-जागता माहौल रचना कितना मुश्किल है. इस मकसद से इस साल का फेस्टिवल मंचीय कलाओं की ताकत को उभारने के प्रति समर्पित किया गया है.
इस बार हिंदी, अंग्रेजी, तिब्बती, मराठी और गुजराती सरीखी कई भाषाओं के नाटक शामिल किए गए हैं. फेस्टिवल की शुरुआत 4 नवंबर को लेखक-निर्देशक मकरंद देशपांडे के नाटक धत तेरी ये गृहस्थी के मंचन के साथ होगी. फिर 5 नवंबर को भूमि का मंचन होगा, जो सारा जोसेफ के मलयाली नाटक भूमिराक्षसम का चर्चित थिएटर ग्रुप आदिशक्ति की ओर से किया गया अंग्रेजी रूपांतरण है.
संगीत के दीवाने 7 नवंबर को बहुमुखी प्रतिभा के धनी लुई बैंक्स के जैज शो और फिर 14 नवंबर को समापन प्रस्तुति के तहत भारत के सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा के संगीतकारों को सुन सकते हैं. अलबत्ता कइयों के लिए फेस्टिवल का अहम आकर्षण 13 नवंबर को दिग्गज अदाकार और रंगमंचीय शख्सियत नसीरुद्दीन शाह का दो हिस्सों में कविता पाठ हो सकता है.
कम से कम कपूर को उम्मीद है कि लोग मंचीय कलाओं का जश्न मनाने बड़ी तादाद में आएंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि इस साल का आयोजन ''दर्शकों का ही जश्न मनाने’’ जैसा है.
—पौलोमी दास.

