पिछले दो फेस्टिवल महामारी की वजह से ऑनलाइन होने के बाद धर्मशाला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (डीआइएफएफ) का 11वां संस्करण 3 से 6 नवंबर को मैकलोडगंज में बाकायदा अच्छे सिनेमा के रसिकों की जीवंत मौजूदगी के बीच हो रहा है. देश और विदेश की बेहतरीन फिल्में दिखाने के मकसद से फेस्टिवल में प्रदर्शित सिनेमा खासकर उपमहाद्वीप में बन रही स्वतंत्र फिल्में विविधता और खालिस प्रतिभा को उजागर करने का उम्दा काम करती हैं. यहां पेश है इसी फेस्टिवल में दिखाई जानी वाली कुछ फिल्मों की एक झलक:
उर्फ: गीतिका नारंग अब्बासी की यह डॉक्युमेंट्री बॉलीवुड के सुपरस्टार्स के कई हमशक्लों की अजीबोगरीब, हृदयविदारक और त्रासद जिंदगियां सामने लाती है. फिरोज खान उर्फ जूनियर अमिताभ बच्चन, किशोर भानुशाली उर्फ जूनियर देव आनंद और प्रशांत वाडे उर्फ जूनियर शाहरुख खान पर केंद्रित उर्फ सिनेमा के इस दीवाने देश में स्टारडम और गुमनामी की दिलचस्प तस्वीर उकेरती है.
फायर इन द माउनटेंस: भव्य हिमालय की पृष्ठभूमि में बनी अजितपाल सिंह की पहली फीचर फिल्म पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का विद्रोह है. फायर इन द माउनटेंस खास ढंग से नारीवादी तजुर्बा बयां करती है. रुपहले पर्दे पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है. बेहद आकर्षक दृश्य और बारीकी से उकेरे गए ब्योरे हौले-हौले खुलते नैरेटिव को और शानदार बनाते हैं.
ऑल दैट ब्रीद्स: किसी और भारतीय फिल्म ने देश की दशा-दिशा को इतनी खूबसूरती से शायद ही दर्ज किया हो जितना शौनक सेन की खूबसूरत ढंग से गढ़ी और सनडांस फेस्टिवल की विजेता डॉक्युमेंट्री ने किया है. फिल्म निर्माण और संवेदना के लिहाज से शानदार ऑल दैट ब्रीद्स आधुनिक भारत में इनसान और जानवर दोनों के जीवन की गरिमा की जरूरी पड़ताल करती है.
पोखर के दुनु पार (पोखर के दोनों ओर): देखिए, अनुराग कश्यप अगर किसी स्वतंत्र फिल्म को अपना नाम दे रहे हैं तो बेशक वह देखने लायक होगी. महामारी की पृष्ठभूमि पर बनी नवोदित डायरेक्टर पार्थ सौरभ की पोखर के दुनु पार बारीकी से उकेरी गई ड्रामा फिल्म है जो विशेषाधिकार, स्त्री-पुरुण भेद और आर्थिक असुरक्षा की तल्ख सचाइयों को सामने लाती है, जिनसे मिलकर वह भारत बना है जिससे हम अक्सर आंख फेर लेते हैं.
जॉयलैंड: ऑस्कर के लिए पाकिस्तान की आधिकारिक प्रविष्टि बनी सैम सादिक की जॉयलैंड एक समलैंगिक के जवान होने को संवेदनशील ढंग से दिखाती ड्रामा फिल्म है. यह अपनी जीवंतता, डीटेल्स और परंपरावादी नैरेटिव को धता बताने को प्रतिबद्ध दिखती है. भारत में पहली बार डीआइएफएफ में दिखाई जा रही उर्दू की यह फिल्म ट्रांसजेंडरों की जिंदगी, अधिकारों और इच्छाओं की पड़ताल ऐसे मानवीय लगाव के साथ करती है जो जरूरी भी है और मर्मस्पर्शी भी.
झीनी बीनी चदरिया: पहली बार फिल्म बना रहे रितेश शर्मा की झीनी बीनी चदरिया इस साल डीआइएफएफ में दिखाई जा रही फिल्मों में राजनैतिक रूप से सबसे ज्यादा उद्वेलित करने वाली फिल्मों में से है. वाराणसी की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में एक हिंदू स्ट्रीट डांसर और मुस्लिम हथकरघा बुनकर की जिंदगियां एक दूसरे से मिलती दिखाई गई हैं. धार्मिक असहिष्णुता और बहुसंख्यकवाद को कठघरे में खड़ा करने वाली झीनी बीनी चदरिया किसी नवोदित निर्देशक की याद रखने लायक फिल्म है.
अध चाननी रात: गुरविंदर सिंह की ताजातरीन फीचर फिल्म देश की सबसे निर्णायक स्वतंत्र आवाजों में से एक के रूप में उनकी हैसियत को और पुख्ता करती है. ग्रामीण पंजाब की कठोर सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक हकीकतों को रेखांकित करने वाली त्रयी की यह अंतिम कड़ी, सिंह की सीधी-सादी लेकिन बेहद असरदार फिल्म कला से ओत-प्रोत है. यह भीतर से टूट चुके एक मुजरिम की मुक्ति की तलाश की कहानी है जिसमें उम्मीद और नाउम्मीदी बराबर आंखमिचौनी खेलते हैं.
—पौलोमी दास.

