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ठोकने वाली हरमन 'थोर’

भारतीय महिला क्रिकेट की कप्तान 33 वर्षीया हरमनप्रीत कौर ने टीम में एकजुटता की जबरदस्त भावना भरी. अब वे उसमें जीतने की आदत डालने में जुटीं.

 हरमनप्रीत कौर
हरमनप्रीत कौर
अपडेटेड 5 सितंबर , 2022

 इस साल हुए राष्ट्रमंडल खेलों में महिला क्रिकेट को पहली दफा शामिल किया गया. इस खेल के लिहाज से यह कितना महत्वपूर्ण कदम था?

हम खुशकिस्मत थे कि मल्टीस्पोर्ट्स वाले इतने प्रतिष्ठित आयोजन में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. हर गेम के बाद हम अपने को उससे भी बड़े चैलेंज के लिए तैयार करते थे जिससे कि पदक जीत सकें. गेम्स विलेज में टिकने के उन 15 दिनों के दौरान हम तरह-तरह के एथलीट्स से मिले और उनके सफर के बारे में जाना.

इससे हमारे अपने दिमागों का दायरा बढ़ा. राष्ट्रमंडल खेलों में महिला क्रिकेट को शामिल किया जाना निश्चित रूप से बहुत बड़ा और सराहनीय कदम है. वहां फाइनल में हालांकि हम हार गए. यह समझ आया कि बतौर टीम हमें जीत का पूरा एक माहौल बनाने की जरूरत है. अपने दमखम को लेकर हमें अतिआत्मविश्वास से बचना होगा.

 आपने ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में भी लीग क्रिकेट खेली है. इससे बतौर क्रिकेटर आपको कितनी मदद मिली और वीमंस आइपीएल से इस खेल का कितना भला होगा?

देखिए, जब आप दुनिया के उम्दा खिलाड़ियों के बीच खेलते हैं तो आप में खेल की एक बेहतर समझ कायम होती है. मुझे पक्का यकीन है कि वीमंस आइपीएल शुरू होने से बड़ी प्रतिभाओं को खेल की अलग-अलग विधाओं में अपने हुनर को दिखाने का मौका मिलेगा.

 जबरदस्त कुटाई वाले आपके शॉट्स की वजह से लोगों ने आपका नाम हरमनप्रीत थोर रख दिया है...

(हंसते हुए)...असल में एक फैन ऐसा था जो हर मैच में एक पोस्टर लेकर आ जाता था, जिस पर अंग्रेजी में मेरा नाम हरमनप्रीत थोर (सुपरहीरो किस्म के एक सिनेमाई किरदार का नाम) लिखा होता था. उसके बाद हुआ ये कि टीम की मेरी साथी प्लेयर्स भी मुझे इसी नाम से बुलाने लगीं.

आप तो जानते ही हैं कि मार्वल सीरीज का कैरेक्टर अपनी ताकत और ऊर्जा के लिए जाना जाता है. अब उसके नाम के साथ जोड़कर आपको बुलाया जाए तो अच्छा तो लगेगा ही. इससे अपने भीतर भी एक रोमांच पैदा होता है.

 भारतीय टीम में आपने 2009 में आगाज किया था. बतौर क्रिकेटर तबसे आप कितना बदली हैं?

मैं हमेशा से ही बहुत एग्रेसिव क्रिकेटर थी, एक ऐसी क्रिकेटर जो हमेशा नतीजे चाहती थी. लेकिन जैसे-जैसे कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ा, मुझे लगने लगा कि अब मैं ज्यादा संजीदा बनती जा रही हूं और निस्वार्थी भी.

अब खेल के दौरान ड्रेसिंग रूम को भी हैंग-आउट की जगह की तरह बनाने की कोशिश रहती है. वहां हम हंसी-ठट्टा करते हैं, नाचते गाते हैं. खेल के एक दिन पहले हम उसकी रणनीतियों पर सोच-विचार करने बैठते हैं.

—शैल देसाई

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