scorecardresearch

नृत्य : साज तुम आवाज हम

देश के शीर्ष नर्तक अगले पखवाड़े अपनी नृत्य प्रस्तुतियों के जरिए एम.के. सरोजा और उनके पति मोहन खोकर को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे.

नृत्य की साझा जमीन एम.के. सरोजा (दाएं) अपने पति मोहन खोकर के साथ
नृत्य की साझा जमीन एम.के. सरोजा (दाएं) अपने पति मोहन खोकर के साथ
अपडेटेड 5 सितंबर , 2022

नृत्य इतिहासकार और आलोचक आशीष खोकर के लिए उनके माता-पिता—मोहन खोकर और भरतनाट्यम नृत्यांगना मद्रास कादिरावेलु सरोजा—सबसे पहले उनके गुरु थे. खोकर कहते हैं, ''इस ओर मैं उन्हीं की वजह से आया. और सायास-अनायास उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा.’’ खोकर नृत्य की सालाना पत्रिका अटेन्डांस निकालते हैं.

नई दिल्ली का हैबिटाट सेंटर 17 और 18 सितंबर को 'सरोजा मोहनम’ समारोह की मेजबानी करेगा. दो दिन के इस श्रद्धांजलि समारोह में ओडिशी-भरतनाट्यम की नृत्यांगना और राज्यसभा सांसद सोनल मानसिंह से लेकर भरतनाट्यम की अलारमेल वल्ली और लीला सैमसन और ओडिशी नृत्यांगना माधवी मुद्गल तक नृत्यकला के कई दिग्गज खोकर के माता-पिता को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे.

मोहन खोकर बड़ौदा के एमएस विश्वविद्यालय के नृत्यकला विभाग के संस्थापक प्रमुख थे और बाद में संगीत नाटक अकादमी के सचिव बने. नृत्य को दशकों तक दस्तावेजों में उतारने वाले खोकर की बात को भारतीय शास्त्रीय नृत्य इतिहास में अंतिम सच माना जाता था. उनके संग्रह में किताबें, तस्वीरें, वीडियो रिकॉर्डिंग, कॉस्ट्यूम, मुखौटे, गहने-जेवर के अलावा और भी कई चीजें हैं जिनका मूल्य पदम सुब्रमण्यम समिति ने 7 करोड़ रुपए आंका.

एम.के. सरोजा ने यह पूरा का पूरा 2018 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) को दान कर दिया. आइजीएनसीए के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी के लिए इस संग्रह का सबसे बढ़िया पहलू इसका ''अखिल भारतीय’’ स्वरूप है. वे कहते हैं, ''यह गौर करने वाली बात है कि उन्होंने नृत्य के इतिहास को इतने ध्यान और सतर्कता से दस्तावेजों में उतारा. यह संग्रह हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का तरीका बताता है.’’

प्रसिद्ध गुरु मुथुकुमारन पिल्लै की शिष्या सरोजा 1940 के दशक की शुरुआत में तमिल मिथकीय फिल्मों की अभिनेत्री हुआ करती थीं. वे एमएस विश्वविद्यालय में भरतनाट्यम की पहली प्रोफेसर और ऐसी गुरु भी थीं जो अपने शिक्षणकाल में इस शैली को भारत से बाहर ले गईं. उन्होंने कथक भी सीखा.

इस साल 13 जून को 92 बरस की उम्र में दिवगंत अपनी मां के बारे में आशीष कहते हैं, ''वे कूपमंडूक नहीं थीं. कुछ नर्तक दूसरे रूपों को हाथ तक नहीं लगाते. लेकिन वह उदार थीं. उनके लिए (नृत्य का) कुल मतलब भक्ति था.’’

खैर, स्मृति आयोजन में संगोष्ठी, अटेन्डांस के 22वें संस्करण का लोकार्पण और दिग्गजों की प्रस्तुतियां शामिल हैं खोकर को यकीन है कि ये महान कलाकार उनके माता-पिता को काम के लिए ही नहीं बल्कि ''हृदय की अच्छाई’’ के लिए भी याद करेंगे.
 

Advertisement
Advertisement