नेशनल अवॉर्ड आपको पहले भी मिले हैं. पर इस बार का अवॉर्ड क्या किसी मायने में खास है?
गाने और डॉक्यूमेंट्री के मजमून ने इसे खास बना दिया. दूसरे, महामारी ने अलग-अलग ढंग से हम सबको पीड़ित-प्रभावित किया था. हम सुविधासंपन्न लोगों को जिंदा रहने के लिए वैसी मशक्कत नहीं करनी पड़ी लेकिन दिहाड़ी मजदूरों और दूसरे श्रमिकों को अपने घर पहुंचने के लिए जिस तरह से हजारों किलोमीटर का सफर करना पड़ा, वह सचमुच बहुत खौफनाक और पीड़ादायक था.
सच पूछिए तो अपने घर पर परिवार के साथ सुरक्षित और सुकून से बैठे रहना मेरे भीतर अपराधबोध पैदा करने वाला था. 1232 किलोमीटर डॉक्युमेंट्री के लिए कंपोज किए, मेरे गाने में वही दर्द पिघलकर निकला था.
कोविड ने हमें अक्सर महसूस करवाया है कि हम कितने असहाय-निरुपाय हैं. 'मरेंगे तो वहीं जाकर’ क्या यह इशारा करता है कि हम कहीं बेहतर कर सकते हैं?
'मरेंगे तो वहीं जाकर’ गाना दरअसल माचिस फिल्म के गाने 'छोड़ आए हम वो गलियां’ के ठीक उलटा बैठता है, जिसमें एक अदद बेहतर जिंदगी के लिए घर छोड़ने की बात है. पर 'मरेंगे तो वहीं जाकर’ कहता है कि सब बेमानी है. घर से बड़ी कोई जगह नहीं. अपनी जन्नत वहीं है.
आप नेटफ्लिक्स के लिए खुफिया बना रहे हैं. जासूसी वाली थ्रिलर फिल्म बनाना क्या किसी भी मायने में आपको चैलेंजिंग लगा?
ना, बल्कि इसमें बहुत मजा आया. इसमें मेरा बचपना लौट आया. यह मुझे उन दिनों में ले गई जब हम जासूसी नॉवेल और खुफियागीरी की कहानियां पढ़ा करते थे. जासूसी विधा तो मुझे बेहद पसंद है.
बतौर डायरेक्टर आपके बेटे आसमान की पहली फिल्म कुत्ते 4 नवंबर को रिलीज होनी है. एक पिता और एक प्रोड्यूसर के रूप में आप कितने सख्त टास्कमास्टर रहे हैं?
मैं उसका टास्कमास्टर नहीं हूं. बल्कि मैं तो उसका दोस्त और सहायक बनना चाहता हूं और मैंने इसी की कोशिश की है. मैं उसका सह-लेखक भी हूं. हम दोनों ने मिलकर स्क्रिप्ट लिखी है. कभी-कभी हमारी राय बिल्कुल अलहदा होती है लेकिन ये तो एक स्वस्थ और रचनात्मक साझेदारी के लक्षण हैं.
—श्रीवत्स नेवटिया

