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भारत ने ऐसे रचा इतिहास

भारत की पुरुष बैडमिंटन टीम ने पहली बार थॉमस कप जीतकर बुलंदी के झंडे गाड़े. कैसे हासिल हुई यह बड़ी जीत और यहां से कहां जा सकते हैं हम?.

गौरव के क्षण: बैंकॉक के इंपैक्ट अरीना में अपने पदकों और कप के साथ टीम इंडिया
गौरव के क्षण: बैंकॉक के इंपैक्ट अरीना में अपने पदकों और कप के साथ टीम इंडिया

क्रिकेट का दीवाना देश 15 मई के रविवार को अपने बैडमिंटन खिलाड़ियों को हैरत और श्रद्धा से देख रहा था. राहत से भरे लक्ष्य सेन कोर्ट पर ही पसर गए, आखिर उन्होंने एक गेम हारने के बाद 2020 के ओलंपिक कांस्य पदक विजेता एंथनी सिनिसुका गिनटिंग को जो हराया था. चिराग शेट्टी ने अपनी और अपने साथी सात्विक साईराज रंकीरेड्डी की जीत का जश्न मनाने के लिए अपनी शर्ट उतार दी, आखिर उन्होंने युगल के शहंशाह मोहम्मद एहसान और केविन संजय सुकामुल्जो के खिलाफ चार मैच पॉइंट जो बचाए थे.

आम तौर पर खामोश रहने वाले किदांबी श्रीकांत भी जोनाथन क्रिस्टी को हराने के बाद खुशी से चीख पड़े और अपना रैकेट पटक दिया. इस तरह 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को धूल चटाकर भारत ने थॉमस कप जीत लिया, जो बैडमिंटन में दुनिया की पुरुष टीम चैंपियनशिप है. यह उसी तरह है जैसे भारत की क्रिकेट टीम ने विश्व कप के फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराया था. या जैसा कि राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम के चीफ कोच पुलेला गोपीचंद कहते हैं—1983 के विश्व कप में ताकतवर वेस्टइंडीज को हराने वाली कपिल देव की टीम की तरह.

गोपीचंद कहते हैं, ''यह भारतीय बैडमिंटन के लिए निर्णायक मोड़ है. पिछले कुछ साल बेहद कामयाब रहे, पर मुख्यत: व्यक्तिहगत स्तर पर. एकल में हमारे पास गहराई है और युगल मंन दुनिया के अच्छे से अच्छे को हराने में समर्थ एक जोड़ी है. यही नहीं, पूरी यूनिट ने टीम की तरह काम किया. इसी ने हमें अजेय टीम बना दिया जो बैडमिंटन खेलने वाले दूसरे सर्वश्रेष्ठ देशों का मुकाबला कर सकती है.’

बैंकॉक के इंपैक्ट अरीना में एक हफ्ते के दौरान टीम इंडिया ने खुलकर और निर्भीक होकर खेलते हुए पांच बार के चैंपियन मलेशिया और खिताब के दावेदार डेनमार्क को हराया. जोश की कमी न कोर्ट में थी और न स्टैंड में, जहां सारे कोच और सपोर्ट स्टाफ खिलाड़ियों की हौसलाअफजाई में जुटे थे. छुपा रुस्तम भारत दबाव में लड़खड़ाया नहीं, बल्कि और निखरकर निकला. मसलन एच.एस. प्रणय ने एक नहीं, दो बार निर्णायक टाई जीतकर भारत का सेमीफाइनल और फिर फाइनल में पहुंचना पक्का किया.

टीम भावना का जादू

प्रणय ने इस जीत के बीज दो हफ्ते पहले ही बो दिए थे, जब उन्होंने 'इट्स कमिंग होम’ नाम का व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया और उसमें एक कप, एक नाराज चेहरे और टीयूसी (थॉमस और उबर कप) की इमोजी लगा दीं. उनका पहला संदेश था: ''बॉयेज्ज्ज हाऊज द जोश?’’ स्वाभाविक ही जवाब आया ''हाई सरररर.’’ ग्रुप के नौ सदस्य खासे युवा थे, जिनमें एकल के खिलाड़ी 20 वर्षीय प्रियांशु राजावत और युगल के खिलाड़ी 21 वर्षीय विष्णुवर्धन गौड़ प्रांजला, 22 वर्षीय ध्रुव कपिला, 22 वर्षीय कृष्ण प्रसाद गरागा और 25 वर्षीय एम.आर. अर्जुन भी थे.

प्रणय और श्रीकांत दोनों 29 के हैं और असलियत में इस जत्थे के अगुआ बन गए. थॉमस कप टीम के मैनेजर और बेंगलूरू स्थित प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन एकेडमी के कोच विमल कुमार कहते हैं, ''मैंने उनके नेतृत्व के गुणों की सराहना की. उन्होंने वाकई युवा खिलाड़िनयों का ख्याल रखा.’’
खिलाड़ी चूंकि साल में ज्यादातर वक्त व्यक्तिसगत स्पर्धाओं में हिस्सा लेते हैं, इसलिए प्रणय को लगा कि चैट ग्रुप से भाईचारा और सौहार्द बनाने में मदद मिलेगी, जो 73 साल से भारत के हाथ न आने वाली इस ट्रॉफी को जीतने में अहम होगा. प्रणय ने कहा, ''टीम स्पर्धाओं में हमारा इतिहास अच्छा नहीं था और हम इसे बदलना चाहते थे. अब वक्त आ गया है कि बाकी दुनिया हमसे डरे. हम दूसरों को बताना चाहते थे कि हम यहां महज खेलने नहीं बल्कि जीतने आए हैं.’’

इस संदेश का वांछित असर हुआ. 21 वर्षीय रंकीरेड्डी कहते हैं, ''खिलाडिय़ों के बीच बॉन्डिंग कामयाबी की कुंजी है. यह जीत टीम के सामूहिक प्रयास और खुद में यकीन करने का नतीजा है.’’ अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन की मिश्रित टीम स्पर्धा एशियन कप और सुदिरमन कप की तरह ही थॉमस और उबर कप में कोई इनामी धनराशि नहीं मिलती.

अपने सभी छह मैच जीतने वाले टीम के कप्तान श्रीकांत ने यह बात खासे गर्व के साथ कही कि यह ''जीत देश के लिए है.’’ जीत के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, ''हमारे जीतने के बाद हर किसी ने कहा कि 'भारत ने थॉमस कप जीत लिया’, न कि किसी एक खिलाड़ी ने. यह बहुत खास एहसास है.’’ भारतीय जत्थे ने एक रेस्तरां में जीत का जश्न मनाया और होटल के अपने कमरों में लौटकर खूब नाचे, जो नॉकआउट चरणों में हरेक जीत के बाद ढर्रा ही बन गया था.

चारों तरफ लड़के ही लड़के

 

बीते दो दशकों के करीब वक्त में पुरुष टीम मोटे तौर पर दो हैरतअंगेज लड़कियों की छाया में रही—साइना नेहवाल और पी.वी. सिंधु. नेहवाल ने भारत को इस खेल में पहला ओलंपिक पदक जिताया. सिंधु ने इसमें दो और ओलंपिक पदक जोड़े और इसके अलावा वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने वाली अकेली भारतीय भी बन गईं. ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की युगल जोड़ी की बदौलत महिला टीम उबर कप में दो कांस्य पदक (2014 और 2016 में) जीत चुकी है.

पुरुषों में श्रीकांत ने 2017 में शानदार प्रदर्शन किया और चार टूर्नामेंट जीतकर दुनिया के नंबर 1 खिलाड़ी बन गए, पर उसके बाद तीन साल तक वे उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए और 2020 के टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाइ करने तक में नाकाम रहे. बीते छह महीनों में सीनियर सर्कि ट में सेन के उभार के साथ पुरुष बैडमिंटन में एक किस्म से पुनर्जागरण का दौर आया है.

20 वर्षीय इस खिलाड़ी ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 2021 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता, इंडिया ओपन 2022 का पुरुष एकल खिताब अपने नाम किया और ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप में रनर-अप रहे. संयोग से इन्हीं दिनों श्रीकांत भी 2021 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में दूसरे नंबर पर आने के बाद जीत की राह पर चल पड़े. प्रणय 2022 के स्विस ओपन के फाइनल में पहुंचे.

पुरुष एकल के शीर्ष 100 में फिलहाल भारत के 14 खिलाड़ी हैं. अंतत: शेट्टी और रंकीरेड्डी के रूप में युगल की बेहतरीन जोड़ी भी भारत के पास है, जो दुनिया में आठवें पायदान पर है. वे अकेले नहीं हैं. कृष्ण प्रसाद और विष्णुवर्धन के साथ ध्रुव कपिला और अर्जुन अगली पीढ़ी की युगल जोडि़यां हैं जिनका प्रदर्शन देखने लायक होगा. इसका मतलब है कि सारा बोझ एकल के महारथियों के कंधों पर नहीं है, जैसा कि ऐतिहासिक रूप से इस प्रतिस्पर्धा में रहा है.

विमल कुमार इस तरक्की का श्रेय इंडियन बैडमिंटन लीग को देते हैं जो खिलाड़ियों को दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों से मेल-जोल का मौका देती है. विमल कहते हैं, ''एक बात पर मैंने गौर किया कि चाहे डेन हों या इंग्लिश या मलय, सब मुझसे एक ही बात पूछ रहे थे कि 'क्या इस साल आप लीग रखने वाले हो?’ तो हमने जो शुरू किया है, उसमें कुछ और पैसा इन्वेस्ट करके उसे हमें अच्छे-से चलाना है.’’

इतनी तादाद में प्रतिभाओं का होना बड़ी पूंजी है और पुरुष टीम के रजत ट्रॉफी जीतने में अहम भूमिका अदा करती है. गोपीचंद ने कहा, ''ज्यादा देश नहीं हैं जो इसका दावा कर सकते हैं. यह बिल्कुल सही समय पर खिलाड़ियों का एक साथ आना है. मैं उम्मीद करता हूं कि भविष्य में यह और अक्सर हो.’’ बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआइ) के प्रेसिडेंट हिमंत बिस्व सरमा को यकीन है कि इस जीत से युवा इस खेल को चुनने के लिए प्रेरित होंगे.

वे कहते हैं, ''भारतीय महिला खिलाड़ियों ने पहले ही मील के पत्थर गाड़े हैं, पर लड़कों का यह चौतरफा प्रदर्शन खिलाड़ियों की अगली पीढ़ी को प्रेरित करेगा और भारत में इस खेल की लोकप्रियता में चार चांद लगाएगा. इनमें से हरेक खिलाड़ी और उसकी यात्रा खेल की विरासत का निर्माण करेगी.’’

आगे का रास्ता
इंडिया टुडे टीवी के लिए राजदीप सरदेसाई के साथ एक इंटरव्यू में गोपीचंद और भारतीय बैडमिंटन के महामानव प्रकाश पादुकोण ने बताया कि बीते कुछ सालों में किस तरह जूनियर स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में प्रविष्टियों की संख्या बढ़ी है. गोपीचंद ने इंडिया टुडे से कहा, ''कई सारी प्रतिभाएं मौजूद हैं. सबसे अहम बात यह है कि आप उन्हें कैसे सजाते-संवारते हैं. हमें पक्का करना होगा कि हम उनकी अच्छी तरह देखभाल करें. बिल्कुल निचले और मझोले स्तरों (की प्रतिभाओं) को समुचित ढंग से विकसित करने की जरूरत है. इसके लिए हमें खेलकूद मजबूत कोचिंग व्यवस्था और दूरदृष्टि के साथ योजना बनानी होगी.’’

यह पादुकोण की ही बेंगलूरू स्थित एकेडमी है जिसने सेन को 10 साल की उम्र से प्रशिक्षित किया. उन्होंने कहा कि बीएआइ को यह मौका झपट लेना चाहिए और खेल को आगे ले जाने के लिए देश में ज्यादा एकेडेमी खोलनी चाहिए, क्योंकि हरेक के लिए बेंगलूरू और हैदराबाद स्थित दो अव्वल एकडेमियों से जुड़ पाना मुमकिन नहीं होता. खास तौर पर अपने बच्चों को अगली सिंधु या गोपीचंद बनाने की चाहत रखने वाले मध्यमवर्गीय माता-पिता के लिए बैडमिंटन महंगा खेल है.

विमल कहते हैं, ''अच्छी तरह सीखने और खेलने के लिए उन्हें महीने में करीब 30,000-35,000 रुपए खर्च करने होंगे. कइयों के लिए इतनी रकम निकालना मुश्किल होता है. इसके बावजूद कई बच्चे आ रहे हैं.’’ खिलाड़ी जब टूर्नामेंट और खासकर अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलने लगता है तो खर्च और बढ़ जाता है. विमल सरकार की तारीफ करते हैं कि उसने महामारी के दौरान खेलो इंडिया स्कॉलरशिप से खिलाड़ियों की सहायता की.

बीएआइ पहले ही हरकत में आ चुकी है और उसने उत्तर भारत के खिलाड़ियों की जरूरतें पूरी करने के लिए हरियाणा के पंचकूला और उत्तर प्रदेश के लखनऊ में कोचिंग एकेडमियों की पहचान की है. इसी तरह मध्य भारत के खिलाड़ियों के लिए महाराष्ट्र के नागपुर में, उत्तरपूर्व के खिलाड़ियों के लिए असम के गुवाहाटी में कोचिंग एकडमियों की पहचान की गई है. उत्तर प्रदेश के केंद्र ने काम करना भी शुरू कर दिया है और गुवाहाटी का केंद्र सितंबर में खुल जाएगा.

युवा प्रतिभाओं की पहचान और विकास के लिए तीस कोच नियुक्त किए जाएंगे. यही नहीं, बीएआइ ने दो चैलेंजर टूर्नामेंट की मेजबानी का मौका हासिल करने के लिए बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन का दरवाजा खटखटाया है. सरमा कहते हैं, ''हमारा मकसद यह होगा कि ज्यादा से ज्यादा युवा और होनहार खिलाड़ियों को भारत में ही अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलने का मौका दें.’’

विजेता टीम के ज्यादातर खिलाड़ी थाईलैंड ओपन खेलने के लिए वहां रुक गए, सेन 16 मई को भारत लौट आए क्योंकि उन्हें बैंकॉक पहुंचने पर फूड पॉइजनिंग से जूझना पड़ा. उनकी मां निर्मला सेन और बड़े भाई चिराग, जो खुद भी बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, कोच-पिता डी.के. सेन और विमल कुमार मावे के पेड़े के दो डिब्बे और गुलदस्तों के साथ उनकी अगवानी के लिए बेंगलूरू हवाई अड्डे पर थे. अगले दिन सेन अभिनंदन समारोह के लिए मुख्यमंत्री के दफ्तर पहुंचे.

चिराग सेन ने कहा, ''इतने सारे खिलाड़ी खेल रहे हैं, पर भारत में दर्शक ही नहीं हैं.’’ थॉमस कप के साथ यह बदल गया. हर कोई रिलायंस की मिल्कियत वाले स्पोर्ट्स18 चैनल या वूट पर नजरें गड़ाए था, जिन्होंने फाइनल के मैच मुफ्त दिखाए. प्रणय ने कहा, ''यह शुरुआत है. हमें इसे आगे बढ़ाने और ज्यादा चैंपियन बनाना शुरू करने की जरूरत है ताकि अगले 10 साल मे आप दो या तीन और थॉमस कप भारत आते देखें.’’ 15 मई से पहले यह निरी कल्पना लगती थी. अब नहीं. 

—साथ में अजय सुकुमारन

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