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किताबेंः मोती भरा कमंडल

''ग़ालिब के परस्तारों में अकेले नेहरू ही नहीं थे. सियासी नजरिये से दो अलग-अलग ख़ेमों में खड़े लीडरान इस जगह एकमत रहे हैं.’’

कशकोल: सफ़ीना-ए-उर्दू के नाख़ुदाओं की दास्तानें
कशकोल: सफ़ीना-ए-उर्दू के नाख़ुदाओं की दास्तानें
अपडेटेड 7 अगस्त , 2021

अफगानिस्तान के शाह अब्दुर्ररहमान 1885 में लुधियाना दरबार में आए. वहां ‘इल्म के बादशाह’ से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा, ‘‘हिंदुस्तान में जो खुशी आपसे मिलकर हुई वो किसी से नहीं हुई.’’ इसी तरह, 1888 में ईरान के बादशाह दो ही मकसद से आए: एक तो वायसराय से मिलना और दूसरा उस शख्स से मुलाकात करना जिसके प्रेस ने फारसी की इतनी किताबें छापी थीं, जितनी उस समय पूरे ईरान में नहीं छपी थीं. उस अजीमुश्शान शख्स का नाम था मुंशी नवल किशोर.  

मथुरा के एक गांव में जन्मे नवल किशोर भार्गव उर्दू-फारसी के साथ ही अंग्रेजी के विद्वान थे. अपने करियर की शुरुआत लाहौर में कोहिनूर अखबार से की. फिर लखनऊ में नवल किशोर प्रेस की स्थापना की और अवध अखबार निकाला, प्रेस के लिए कागज की जरूरत महसूस हुई तो पेपर मिल खरीद लिया. 'हिंदू मौलवी और मुसलमान पंडित’ नवल किशोर के कामकाज और वेश-भूषा देखकर अमेरिकी ईसाई धर्म प्रचारक बिशप जॉन फ्लेचर हर्स्ट उन्हें 'कट्टर मुसलमान’ मान बैठे थे.

राजकुमार केसवानी की जहान-ए-रूमी और दास्तान-ए-मुग़ल-ए-आज़म ने संभवत: आखिरी शाहकार कशकोल: स़फीना-ए-उर्दू के ऩाखुदाओं की दास्तानें में उर्दू अदब के 13 किरदारों की जिंदगी को बेहद दिलचस्प अंदाज में पेश किया है.

सबसे पहले,  मिर्ज़ा गालिब की कहानी हज़रत निजामुद्दीन बस्ती में उनकी मजार से शुरू होती है. पूरी अक़ीदत के साथ लिखी गई मर्ज़ा के किरदार को बयान करने के लिए वे गुज़रे जमाने के मलिक राम जैसे गालिब विशेषज्ञों को उद्धृत करते हैं. और उद्धृत करने का अंदाज देखिए: ‘‘सवाल मिर्ज़ा गालिब को 'नौशा मियां’ कहकर मुख़ातिब करने को लेकर है.

यूं तो छोटा-सा और आसान जवाब दे सकता हूं, लेकिन सोचता हूं किसी और के जरिये यह बात कह दूं, तो एक टिकट में दो मजे हो जाएंगे.’’ वे अपने पसंदीदा शायर की तारीफ अपनी तरफ से नहीं करते. ''ग़ालिब के परस्तारों में अकेले नेहरू ही नहीं थे. सियासी नजरिये से दो अलग-अलग ख़ेमों में खड़े लीडरान इस जगह एकमत रहे हैं.’’

वे 1998 में ग़ालिब इंटरनेशनल सेमिनार में अटल बिहारी वाजपेयी के बयान को उद्धृत करते हैं: ''अहद-ए-मुग़लिया ने हिंदुस्तान को तीन चीजें दी हैं—ताज महल, उर्दू ज़बान और ग़ालिब की शायरी.’’ पूरे अध्याय में जगह-जगह उनकी शेर का इस्तेमाल ऐसे किया गया है, जैसे ग़ालिब के दीवाने केसवानी को दीवान-ए-ग़ालिब पूरी तरह याद हो.

हिंदुस्तानी शेक्सपियर आग़ा हश्र कश्मीरी का अध्याय बीसवीं सदी की मशहूर अदाकारा-गायिका और आग़ा हश्र की बीवी के बयान से शुरू होता है: ''नौजवान तुमसे पूछने आया करेंगे, हमें बताओ, आग़ा हश्र कौन था? वह किस अंदाज में बैठकर लिखा करता था. उसके गुफ़्तगू करने का ढंग क्या था?

वह किस तरह का लिबास पहनता था? वह किरदादर कैसे तरतीब देता था? हमें बताओ कि आग़ा हश्र को तुमने किस-किस रंग में देखा है?’’ यहूदी की लड़की, रुस्तम सोहराब, बिल्वा मंगल आदि जैसे कालजयी नाटक लिखने वाले आग़ा हश्र के बारे में केसवानी इन सारे सवालों का जवाब पूरी तफ़्सील के साथ देते हैं.

बयान की बानगी देखिए: ''नमाज़ पढ़ते उन्हें कभी किसी ने देखा नहीं और रोज़ा रखने की फ़ुरसत कभी मिली नहीं...वो खड़े-खड़े ऐसी गालियां ईजाद कर लेते थे कि पहली बार सुनने वाले के होश फ़ाख़्ता हो जाते...दीन-ओ-मज़हब की हिदायतों से इस क़दर फ़ासले पर रहने वाले आग़ा हश्र के किरदार का यह भी एक अनोखा रंग था कि वक्त आने पर वे अपने मज़हब के हक़ में सीना तानकर खड़े हो जाते.’’

केसवानी ने शीर्षक के चयन से लेकर इस किताब के लेखन में मन की मानी. वे बताते हैं, ''प्रचलित भाषा में कशकोल नहीं, कश्कोल है. न जाने क्यों इस पर मन नहीं मानता. लिहाजा, चलन छोड़ मन की मानी.’’ चलन छोड़ने का नतीजा यह निकला कि एक-एक अदीब की दास्तान कशकोल में मोती की तरह है. पाठक तस्दीक कर सकते हैं कि दिल से जो बात निकलती है, असर रखती है. 

कशकोल: सफ़ीना-ए-उर्दू के नाख़ुदाओं की दास्तानें
लेखक: राजकुमार केसवानी
मंजुल पब्लिशिंग हाउस
कीमत: 350 रुपए
पन्ने: 293.

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