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किताबेंः सिर्फ स्वांग ही असली है

स्वांग यह साफ करता है कि दरअसल बहुत विकट वाला ड्रामा चल रहा है. सारे पात्र इतना शानदार अभिनय कर रहे हैं कि पता ही नहीं चला रहा, यह ड्रामा है. स्वांग की कामयाबी भी इसी में है.

स्वांग
स्वांग
अपडेटेड 16 जुलाई , 2021

आलोक पुराणिक

ज्ञान चतुर्वेदी हिंदी भाषा के जीवित व्यंग्यकारों में सबसे महत्वपूर्ण और बड़े व्यंग्यकार है. 1991 के बाद का हिंदी व्यंग्य लेखन ज्ञान चतुर्वेदी युग से रेखांकित किया जाता है, इसलिए कि करीब पचास साल से व्यंग्य परिदृश्य में ज्ञान चतुर्वेदी न सिर्फ सक्रिय हैं, बल्कि रचनात्मक स्तर पर सक्रिय हैं.

सिर्फ संस्मरण मोड वाली सक्रियता नहीं है उनकी. हमने सत्तर के दशक में यह तीर चला दिए या कि अस्सी के दशक में आसमान की छाती फाड़ डाली-टाइप बकवास से मुक्त उनकी रचनाधर्मिता उनकी परवर्ती पीढ़ी के लिए उदाहरण है कि कैसे लंबे समय तक रचनात्मकता को साधा जाता है. एक के बाद एक धारदार रचनाएं, उपन्यास देकर उन्होने साबित किया है कि व्यंग्य का शीर्ष पुरुष उन्हें क्यों माना जाता है.

स्वांग उनका नवीनतम उपन्यास है, बेतरह हंसानेवाला और रुदन की ओर ढकेलनी वाली उदासी समेटे यह उपन्यास सिर्फ बुंदेलखंड का ही नहीं, समूचे भारतीय समाज और खास तौर पर हिंदी समाज का ऐसा आईना है, जिस पर रोया जा सकता है, दुखी हुआ जा सकता है.

स्वांग कभी एक बेहद लोकप्रिय लोकनाट्य विधा रही है बुंदेलखंड की. सब कुछ नकली होता था स्वांग में. नकली नायक, नकली खलनायक सब कुछ इस कदर नकली कि नकल ही मुख्यधारा है, ऐसा प्रतीत होता है. कथा कोटरा नामक गांव की है, जहां संविधान के मुकाबले तमंचा ज्यादा असरदार है.

स्वांग में कई उपकथाएं साथ चलती हैं—जय हिंद के साथ जीने वाले गजानन बाबू स्वतंत्रता सेनानी हैं, सत्य और रामराज्य के प्रति उनका आग्रह उपहास का विषय बन गया है. गजानन बाबू का स्वतंत्रता संग्राम एक साथ तीन परिणतियों पर पहुंचता है: वे उपहास का सतत पात्र बनते हैं, उन्हें विक्षिप्त करार दे दिया जाता है और आखिर में वे लाकअप में पाए जाते हैं.

शिक्षा के पुजारी टाइप पंडितजी ऐसा स्कूल चलाते हैं, जिसकी मुख्य ख्याति नकल कराने की चौकस व्यवस्था करने की है. पंडितजी का बेटा अपोली जब गांव में लफंगई नहीं कर रहा होता है, तब पंडितजी के स्कूल का प्रबंधन कर रहा होता है.

इस स्कूल के कुशवाहा मास्टर पिटते हैं, पिटाई की वजह यह है कि वे नकल कराने की व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं. बिस्मिल पत्रकार हैं, जो दलाली और पत्रकारिता में समन्वय बिठाते रहते हैं. पंडिज्जी के विरोध में एक नेता है, जिन्हें पंडिज्जी का विकल्प न माना जाये, वो पंडिज्जी की राह के ही राहगीर हैं. पटवारी हैं, जो पत्नी को नियम से पीटते हैं और पत्नी ही नहीं, पड़ोसी भी इसे रोज का सहज कर्म मानकर चलते हैं.

पंडिज्जी के खेत के श्रमिक नत्थू के बेटे को पुलिस इसलिए अंदर कर देती है कि उस पर शक होता है कि उसका हाथ डकैती में है, शक का आधार यह है कि वह कुछ कमा-धमाकर मोटरसाइकिल ले आया है और कुछ ठीक-ठाक कपड़े पहनने लगा है. पुलिस का काम बड़े आदमियों की नौकरी का है, बड़े आदमियों का काम सब-कुछ निचोड़ लेने का है, जिसमें उनकी मदद के लिए तैयार खड़ी पुलिस और न्यायिक व्यवस्था.

चोर के खिलाफ जिसे विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है, वह दरअसल चोर ही है, बड़ा या छोटावाला. देश दरअसल पंडितजी जैसे लोगों का ही है. स्वांग में पेज 372 पर दर्ज है: ''देश वास्तव में पंडिज्जी का है. आपको लगता है कि देश आपका भी है, तो हम आपको ऐसा सोचने से रोक तो नहीं सकते. हम रोकेंगे भी नहीं. हां, यह याद रखें कि आपके कागज दफ्तरों में गुमते रहेंगे, और हम खोजते भी रहेंगे.’’ सिस्टम पर एक और धारदार उक्ति पेज नंबर 295 पर है: ''बेईमानी के सिस्टम को चलाने के लिए कुछ नपुंसक किस्म के ईमानदारों की भी दरकार होती है.’’

ठाकुर साहब का लड़का हत्या करके भी छूट जाता है, बाइज्जत बरी हो जाता है. यूं सबको पता है कि हत्या ठाकुर साहब के लड़के ने ही की है. थाना पुलिस न्यायालय है, सब है, पर स्वांग की तरह है, है तो पर नहीं भी है. या है तो पंडिज्जी जैसों के लिए है, गरीब के लिए नहीं. कमजोर के लिए नहीं है.

कुल मिलाकर कहीं कोई कमी नहीं है, पूरे इंतजाम हैं, न्याय है, न्यायालय हैं, पुलिस है, वकील हैं, पत्रकार हैं, भरा पूरा लोकतंत्र है, पर सबके लिए नहीं है. पंडितजी की पुत्री लक्ष्मी अपने परिवार के रंग-ढंग से नाराज दिखती हैं, अलग जाती दिखती हैं.

स्वांग उपन्यास साफ करता है कि दरअसल बहुत विकटवाला ड्रामा चल रहा है. सारे पात्र इतना शानदार अभिनय कर रहे हैं कि पता ही नहीं चल रहा कि ड्रामा चल रहा है. स्वांग की कामयाबी भी इसी में है कि किसी को महसूस ही न हो कि स्वांग चल रहा है, जबकि असल में सब कुछ नकली ही है, असली तो सिर्फ स्वांग ही है. यह संदेश यह उपन्यास बहुत ही कामयाबी के साथ संप्रेषित करता है.

स्वांग
लेखक:
डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, नईदिल्ली
कीमत: 399 रुपए

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