■ पद्मश्री सम्मान की खबर मिलने पर सबसे पहला ख्याल आपके मन में क्या आया?
एकदम से भावुक हो गई. एक ऐसे परिवार में पैदा होने का धन्यता बोध हुआ, जिसने मुझे संगीत का आनंद और सुख दिया; उस सफर के प्रति कृतज्ञता बोध उपजा जो मैंने गुरुओं, संगतकारों के साथ तय किया है, और इस दौरान संगीत में अपने मन का करने के लिए जिन लोगों ने साथ दिया.
इसकी खबर सुनकर मेरी आंखें छलछला आईं. उधर मेरे फोन पर परिजनों, दोस्तों, साथी कलाकारों और सुधी श्रोताओं से मिलने वाली बधाइयों का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था.
■ पिछले करीब एक दशक से आपने खासकर समाज के वंचित तबके के बच्चों से संवाद के लिए संगीत को औजार बनाया हुआ है. उस प्रयोग से आपको क्या सीख मिली है?
हर बार जब एक बच्चा संगीत के किसी स्वर को एक नए अंदाज में देखता है, मैं रोमांचित हो उठती हूं. हर बार जब मंजाकुडी (कुंभकोणम, तमिलनाडु) की कोई युवती बताती है कि शाम को झोपड़ी में मां के दीप जलाने पर वह गाना गाती है तो मेरे होठों पर मुस्कान तैर जाती है.
हर बार जब कोई बच्चा बताता है कि संगीत में सिखाई गई गणना का उपयोग करके वे गणित में अच्छे नंबर ले आए हैं, मैं हर बार चकित रह जाती हूं कि किस तरह से उन्होंने संगीत और गणित में रिश्ता बना लिया है.
■ महामारी के दौरान आप सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय थीं. खासकर देश भर की लोरियों वाली आपकी सीरीज मून चाइल्ड बेहद सुंदर थी. उसका आइडिया कहां से आया?
बीसेक साल पहले मैंने वात्सल्यम नाम के एक आइडिया पर काम किया था, जिसमें लोरियों का संकलन था. बचपन के अपने दिनों में सीखी लोरियों के खजाने को मैंने पूरे लॉकडाउन के दौरान खंगालना जारी रखा. प्रस्तुतियों वाले तेज रक्रतार करियर में कभी-कभी इस तरह के नगीनों की अनदेखी हो जाती है.
—अखिला कृष्णमूर्ति

