क्रिकेट ❘ पुनर्जागरण
मार्च और जुलाई 2020 के बीच भारत में लॉकडाउन था और सारे खेल एकाएक रोक देने पड़े थे. मगर भारतीय क्रिकेट प्रतिष्ठान के नेपथ्य में गहमागहमी मची थी. मई 2020 में राष्ट्रीय टीम के मुख्य कोच रवि शास्त्री ने अपने डिप्टी भरत अरुण से बात की और उनसे एक नई योजना पर काम करने को कहा. यह योजना छह महीने बाद नवंबर में शुरू होने वाले ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए थी. योजना आम तजुर्बे से जरा हटकर थी और जैसा कि अरुण कहते हैं, ‘‘हमने इस पर बहस भी की पर रवि का कहना था कि कुछ वक्त इस पर टिको, देखो क्या होता है.’’
जिस खेल में और जिन परिस्थितियों में तेज गेंदबाज ऑफसाइड का किनारा चूमने की जी-तोड़ कोशिश करते हैं, भारतीय गेंदबाजों को ऑफसाइड के बारे में ज्यादा नहीं सोचना था. बाद में जब अरुण ने टीम के विश्लेषक से ऑस्ट्रेलिया के बैटिंग ऑर्डर के दो मजबूत स्तंभ स्टीव स्मिथ और मार्नस लबुशेन के आंकड़े निकालने को कहा, तो अरुण के मुताबिक उन्होंने पाया कि ‘‘थर्डमैन पर कट, ड्राइव और ग्लाइड में 70 फीसद या उससे भी ज्यादा रन ऑफसाइड से आए थे.’’
वे जानते थे कि मुख्य कोच के हाथ अहम बात लग गई है और इस तरह रनों का प्रवाह रोकने और ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को हताश होकर गलतियां करने को मजबूर करने की ‘लेग-ट्रैप योजना’ का जन्म हुआ. अरुण कहते हैं, ‘‘स्मिथ ने सैकड़ा बनाया भी—और वे महान खिलाड़ी तो हैं ही—तो उन्हें वहां पहुंचने के लिए 200 गेंदें खेलनी पड़ीं.’’ (स्मिथ ने सात पारियों में सिडनी में ही सौ से ज्यादा रन बनाए.)
इस आलेख के लिए एक चर्चा के दौरान भारत के फील्डिंग कोच आर. श्रीधर ने कहा, ''टेस्ट सीरीज ही क्यों? पहले दो वनडे हारने के बाद हमें खारिज कर दिया गया था. कइयों ने कहा कि हम एक भी मैच न जीतेंगे. एडिलेड टेस्ट के बाद विराट कोहली के चले जाने पर तो हमसे बस घुटने टेक देने की उक्वमीद थी.’’
एडिलेड में 36 पर सिमटने जैसी जलालत के बाद उस रात टीम की बैठक हुई. तब सबसे चुनौती भरे हालात में कप्तानी संभालने उतर रहे अजिंक्य रहाणे कहते हैं, ‘‘हमने उस एक बुरे घंटे (जब टीम बिखर गई थी) को भूलकर आगे बढऩे की ठानी. रविभाई ने कहा कि हम 36 को तमगे की तरह ले सकते हैं. यह शर्म का तमगा होगा या सम्मान का? 36 पर ऑल आउट कायापलट की शुरुआत थी.’’
कप्तान रहाणे को लेकर तो भारत को भरोसा था, पर बल्लेबाज रहाणे को मौके के हिसाब से खुद को तैयार करना था. बल्लेबाजी के लिए मैदान में उतरने से पहले रहाणे ने बैठकर अपने आदर्श सचिन तेंडुलकर की वह पारी देखी जिसमें उन्होंने 1999 में मेलबर्न में 116 रन बनाए थे. इसने उनकी मनोदशा को इस तरह ढाल दिया कि वे सबसे यादगार पारी खेल सके. रन आउट होने से पहले उनके बनाए 112 रनों ने टीम को वह उछाल दे दी जिसकी जरूरत थी. मेलबर्न की जीत के दूसरे वास्तुशिल्पी रवींद्र जडेजा कहते हैं, ‘‘उस सैकड़े ने सब कुछ बदल दिया. अब हमारे सामने एक मौका था. हम जानते थे कि अगर हमने सौ रनों की लीड ले ली, तो दूसरी पारी में उन्हें सस्ते में निबटा सकते हैं.’’
मैदान पर और मैदान के बाहर की गई तैयारी और गुरूर की हद तक अपने आप में भरोसा अब खेल के प्रति इस युवा भारतीय टीम के नजरिए की पहचान बन गया है. इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया की परीकथा सरीखी कामयाबी से इस टीम की धुन और लगन के साथ-साथ प्रतिभा की गहराई की भी सुखद झलक मिलती है, जिसकी वजह से यह परीकथा लिख पाना मुमकिन हुआ.
दौरे पर जिस तरह खिलाड़ी चोटिल हो-होकर बाहर हुए, उसने फिटनेस के उस ऊंचे स्तर को झूठा ठहरा दिया जिसे कोहली की कप्तानी में इस राष्ट्रीय टीम की अनिवार्य खूबी मान लिया गया है. पर यह भी देखना होगा कि इनमें से कुछ चोटें—मसलन, एडिलेड में मोहम्मद शमी या सिडनी में रवींद्र जडेजा की चोटें—गेंद से लगी थीं, जिनका फिटनेस से कोई लेना-देना नहीं था. श्रीधर कहते हैं, ‘‘भारत में सात महीनों से लॉकडाउन था और हमारे किसी भी लड़के को उस किस्म की तैयारी और प्रशिक्षण से गुजरने का वक्त ही नहीं मिला जो इस तरह की थकाऊ रेड बॉल सीरीज के लिए जरूरी है.
दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया में इतना कठोर लॉकडाउन कभी था ही नहीं. यानी ऑस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों को मैदान और प्रशिक्षण की बुनियादी सुविधाएं मिलती रहीं. हमारा कोई भी खिलाड़ी आइपीएल से पहले बमुश्किल ही कोई तैयारी कर पाया था. और टी-20 क्रिकेट आपको कभी इस तरह की टेस्ट सीरीज के लिए तैयार नहीं करता.’’
पूरी तैयारी का वक्त न मिलने की वजह से पैदा चोटों से जूझते हुए भी जो बात सामने आई, वह थी टीम की लगन और धुन, उसका कभी हार न मानने का जज्बा, फिर चाहे कितनी भी तकलीफ, रह-रहकर उभरने वाली थकान और बद से बदतर चीजें भी क्यों न झेलनी पड़ें. जडेजा कहते हैं, ‘‘सिडनी में मैं दूसरी पारी में बल्लेबाजी को तैयार था.’’ (पहली पारी में उनके बायां अंगूठा सरक गया था.) दस्ताने पहन पाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए मैं उन्हें घंटों पहने रहा कि पता नहीं कब मुझे जाना पड़े.’’
सीरीज के एक और स्टार रविचंद्रन आश्विन सिडनी (तीसरा टेस्ट, जिसे भारत ने आश्विन, हनुमा विहारी और दूसरों की दिलेरी के बूते बचाकर सीरीज जिंदा रखी) में बल्लेबाजी के लिए मैदान में जाने से पहले तीन घंटे खड़े रहे. अरुण कहते हैं, ‘‘आश्विन बैठे नहीं. वे बैठ जाते तो फिर उठ न पाते.’’ आश्विन के साथ ही, घुटने के पीछे की नस फटने से जूझने वाले हनुमा विहारी कहते हैं, ‘‘ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज उन्हें शॉर्ट गेंदें फेंक रहे थे.
मैं ऐश के पास गया और सुझाया कि वे घुटने थोड़ा और झुका लें तो खेलना आसान हो जाएगा. पर जिस किस्म की ऐंठन उसे हो रही थी, उसके चलते उसने कहा कि अगर वह जरा भी और झुकाएगा तो खड़ा नहीं रह पाएगा.’’ दोनों ने पिच पर डटे रहकर 260 गेंदें खेलीं और ऑस्ट्रेलिया को सीरीज में 2-1 की बढ़त लेने से रोक दिया, और फिर चौथा और अंतिम टेस्ट खेलने ब्रिस्बेन के गाबा पहुंचे.
अरुण याद करते हैं, ‘‘सिडनी ने हमें यकीन दिलाया कि कुछ भी मुमकिन है. इतने खिलाडिय़ों के चोटिल होने के बाद भी हम इस टेस्ट से अपराजित निकले, इसने हमें बेखौफ बना दिया.’’ गाबा में इस भारतीय टीम का अदम्य जज्बा देखने लायक था. श्रीधर कहते हैं, ‘‘पांचवें दिन की शुरुआत के वक्त रवि ने खिलाडिय़ों से कहा कि मैच के पहले दिन की तरह खेलो. योजना थी कि खोए विकेट और जरूरी रनों के आधार पर चाय के वन्न्त फैसला लेंगे.
जब मयंक (अग्रवाल) आउट हो गया (स्कोर: 265/5; 86.4 ओवर) और अब भी 15 ओवर खेलने थे (जीत के 328 के लक्ष्य से 63 रन दूर), कुछ चाहते थे कि 10 ओवर खेलें, ड्रॉ पक्का करें, फिर जोखिम उठाएं. मगर ऋषभ (पंत) और (वाशिंगटन) सुंदर के मन में कुछ और ही चल रहा था. वे युवा पीढ़ी हैं और आपने देखा कि उन्होंने क्या किया.’’ दक्षता और अनुभव में बड़े अरुण भी उनकी बात से इत्तेफाक रखते हैं, ‘‘मैं अजिंक्य और रोहित के पास गया, यह देखने कि क्या उन्हें निर्देश भेजने की जरूरत लग रही है. उन्होंने कहा कि हम उन्हें रोकने से दूर आ चुके हैं, इसलिए बस बैठो और मजा लो.’’
टेस्ट में पदार्पण कर रहे सुंदर ने पंत से कहा कि वे पैट कमिंस (ऑस्ट्रेलिया के अव्वल स्ट्राइक बॉलर) को अच्छे-से खेल पा रहे हैं और वे खुद रनों के लिए जाएंगे और पंत को सब्र के साथ आखिर तक बल्लेबाजी करनी चाहिए. सुंदर एक पल के लिए भी दुनिया के नंबर 1 टेस्ट गेंदबाज कमिंस से भयभीत नहीं हुए. यही वह आत्मविश्वास है जो इस युवा भारतीय टीम की पहचान बन गया है. मोहम्मद सिराज, शार्दूल ठाकुर और शुभमन गिल सरीखे खिलाड़ी इसी आशावादी नजरिए और जज्बे के ताजातरीन चैंपियन हैं.
गिल ने ऑस्ट्रेलिया रवाना होने से पहले तेंडुलकर से बात की, युवराज सिंह से प्रशिक्षण लिया और बिल्कुल पहली गेंद से ही मिशेल स्टार्क, कमिंस और जोश हेजलवुड की ऑस्ट्रेलियाई तिकड़ी का सामाना करने को तैयार थे. वे अलग और खास दर्जे के खिलाड़ी हैं, यह तब साफ हो गया जब उन्होंने ब्रिस्बेन में पांचवें दिन स्टार्क को खेलना शुरू किया. उनका गेंद को मिडविकेट पर पुल करना और फिर थर्डमैन के ऊपर से कट लगाना 19 बरस के उस तेंडुलकर की याद दिलाता था जिसने 1992 में पर्थ में विश्व मंच पर अपने आगमन का ऐलान किया था.
क्रिकेट के सबसे शानदार लेखकों में से एक गिडियन हेग कहते हैं, ‘‘एक के बाद एक बल्लेबाज को गंवाते जाना और फिर भी लडऩे के लिए डटे रहना इस टीम की खूबी है. यह सोचना हैरतअंगेज है कि फाइनल टेस्ट में टीम के पहले खिलाडिय़ों में से आठ उनके साथ नहीं थे और फिर भी वे गाबा के किले में ऑस्ट्रेलिया को पीछे धकेलते रहे. यह बिल्कुल ऑस्ट्रेलियाई खूबी है जो हमने इस (भारतीय) टीम में देखी है.’’
अगर भारतीय टीम आज अपराजेय दिखाई देती है, तो इसकी कोई एक सबसे अहम वजह बता पाना मुश्किल है. बात बस इतनी नहीं है कि अनगढ़ प्रतिभा और अतिरिक्त खिलाडिय़ों की बहुतायत है. न ही बात बस यह है कि प्रतिभा की खोज के लिए जल्द ही रणनीतिक योजना बना ली जाती है या इसकी सांस्थानिक प्रक्रियाएं हैं. न ही बात यह है कि राष्ट्रीय टीम के संभावित खिलाडिय़ों को समय पर तजुर्बा या अपने देश में बेहतर बुनियादी ढांचा और पेशेवर इनाम मिल जाते हैं. बेशक इन सबकी अहमियत है और नतीजों में इनका अहम योगदान होता है.
लेकिन इस नई टीम में एक नया पेशेवराना जज्बा भी दिखाई देता है, जिसे इसकी कामयाबी के जादुई मसालों में जरूर गिनना चाहिए. यह सबसे ज्यादा चूर-चूर कर देने वाली नाकामी (एडिलेड) और परीकथा सरीखी कामयाबी (ब्रिस्बेन) दोनों से ही उबरकर तेजी से आगे बढऩे और अपने सामने मौजूद नए काम में जुट जाने की उनकी क्षमता से भी जाहिर होता है.
इंग्लैंड टीम अब भारत दौरे पर आ पहुंची है और 5 फरवरी से टेस्ट सीरीज शुरू हो रही है. भले ही हम ऑस्ट्रेलिया की इस बहुत खास जीत के एहसास में डूबे रहना चाहते हों, लेकिन टीम इंडिया आगे बढ़ चुकी है और चेन्नै के एक नए शांत और सुरक्षित माहौल में पहुंच गई है. अरुण कहते हैं, ‘‘जिस तरह हम 36 पर ऑल आउट से आगे निकल आए, उसी तरह सीरीज की जीत से भी निकलकर आगे बढऩा जरूरी और अहम था. वह जीत तो अब इतिहास बन चुकी है.’’ ठ्ठ
‘‘सिडनी ने हमें यकीन दिलाया कि कुछ भी मुमकिन है. इतने खिलाडिय़ों के चोटिल होने के बाद भी हम इस टेस्ट से अपराजित निकले. इसने हमें बेखौफ बना दिया, जो ब्रिस्बेन में दिखा’’
—भारत अरुण

