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लॉकडाउन डायरीः समाधान नहीं तो चुप रहो न यार

मुझे समझ आया कि इनसान के पास जीने का मकसद न होने पर उसके लिए जीना बड़ा मुश्किल है. हताशा आपको तुरंत घेर लेती है. पुरानी कहावत है कि खुश रहना परिस्थिति नहीं, आदत होती है. तो मैंने स्क्रिप्ट लिखी. बता रहे हैं एक्टर सौरभ शुक्ला

सौरभ शुक्ल
सौरभ शुक्ल
अपडेटेड 14 जून , 2020

खुश रहना एक आदत:

देखिए, डॉक्टर भी कहते हैं कि डर और हताशा की स्थिति में कोई भी बीमारी आपको जल्दी पकड़ती है क्योंकि आपका इम्यून सिस्टम काम करना बंद कर देता है. तो इस महामारी के सिलसिले में सबसे पहली बात तो यह सामने आई कि खुद को बचाते हुए सामान्य जीवन जीने की कोशिश करनी है. मैंने बुकमाइशो के लिए अपने नाटक का एक सीन को-ऐक्टर जयदीप भाटिया के साथ ऑनलाइन परफॉर्म भी किया.

मुझे समझ आया कि इनसान के पास जीने का मकसद न होने पर उसके लिए जीना बड़ा मुश्किल है. हताशा आपको तुरंत घेर लेती है. पुरानी कहावत है कि खुश रहना परिस्थिति नहीं, आदत होती है. तो मैंने स्क्रिप्ट लिखी. मुझे एहसास हुआ कि जीवन खत्म नहीं होता तो बहुत कुछ है इस जीवन में.

बेवजह बहस से फैलती है अशांति:

इस बीच दुखदायी खबरें आईं. कितने प्रवासी मजदूर घर लौटते समय रास्ते में मर गए. अब लोग ऐसी बातों का लॉजिक अपने-अपने ढंग से निकालते हैं. कोई सरकार से खुश है तो वह कहता है कि सरकार ने अच्छा काम किया, नहीं तो आप मरते. जो खुश नहीं, वह कहता है कि मर तो अब भी रहे हैं. कांफ्लिक्ट रहेगा ही. पर आपके पास सोल्यूशन नहीं है तो बेवजह बहस न करें, उससे अशांति फैलती है.

आपसे जो बन पड़े, कीजिए. कोई भूखा दिखता है तो खाना खिला दीजिए. अगर आप उस जगह नहीं हैं जहां से लोग गुजर रहे हैं तो मौके की संस्थाओं को दान दे दें. इस दौरान लोगों का अच्छा स्वरूप ज्यादा सामने आया.

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