scorecardresearch

लॉकडाउन डायरीः कितना कुछ करने को है

सरदा पोपोविच की ब्लूप्रिंट फॉर रिवोल्यूशन पढ़ना, लॉकडाउन में लोगों का तनाव दूर करने के लिए कॉमेडी/सटायर बनाना और खुद भी एक ट्रायइल बेली डांस सीखना, यह उनके हालिया काम हैं. अपनी लॉकडाउन डायरी में बता रही है अभिनेत्री ऋचा चड्ढा

ऋचा चड्ढा
ऋचा चड्ढा
अपडेटेड 14 जून , 2020

पढ़ना, नाचना, बतियाना: लॉकडाउन के दौरान सीखने, सबक लेने का मेरा या किसी का भी सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है. बल्कि लगता है, अभी तो इसकी शुरुआत ही हुई है. अभी इलाज कुछ मिला नहीं है इस बीमारी का. अभी तो हमें यह देखकर राहत-सी महसूस हो रही है कि पॉल्यूशन कम है. समंदर में मछलियां वापस आ गई हैं.

यह भी सच है कि मौजूदा साल खासकर हमारे सबसे गरीब और कमजोर तबके के लिए बेहद दुश्वार है. यह देखकर मुझे बहुत तकलीफ होती है. हम लोग हरसंभव मदद की कोशिश कर रहे हैं. दूसरे, हम स्वावलंबी हो गए हैं. इसके अलावा, आजकल दोस्तों और मां-पिताजी से वीडियो कॉल से खूब बातें करती हूं. लोगों से जुडऩे का यह अच्छा जरिया है. कॉमेडी जॉनर की स्क्रिप्ट लिखने की कोशिश कर रही हूं.

काफी किताबें पढऩे का समय मिला है. सरदा पोपोविच की ब्लूप्रिंट फॉर रिवोल्यूशन पढ़ रही हूं. लॉकडाउन में लोगों का तनाव दूर करने के लिए कॉमेडी/सटायर बना रही हूं. मैं खुद भी एक ट्रायइल बेली डांस सीख रही हूं.

वैसे तो लोग पहले भी एक-दूसरे की मदद कर रहे थे पर तब हमें उतना पता नहीं चलता था. अब वन्न्त ही ऐसा है तो लोग आगे बढ़कर कर रहे है. अर्थव्यवस्था का हाल देख ही रहे हैं. किसान और गरीब नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू होने के बाद वैसे ही त्रस्त थे, अब यह लॉकडाउन! किसान और मजदूरों का तो सचमुच बहुत बुरा हाल है. मिड्ल क्लास को भी समझ आ रहा है: रेंट देना है, ईएमआइ भरना है.

नौकरियां जा रही हैं. ऐसे में इंसानियत जग रही है. यह अच्छी बात है. वैसे इस बीच एक तबके का दूसरा चेहरा भी सामने आ रहा है. एक सोसाइटी में पड़ोसन डॉक्टर को उसकी बेटी के सामने मारने की कोशिश की गई. यह दुखद है. ऐसे वक्त में भी कुछ लोग पॉलिटिक्स करना चाहते हैं.

ध्यान की बेला: देखिए, ऐसा तो है नहीं कि दो महीने में दुनिया बदल जाएगी. इनसान अध्यात्म की तरफ झुक रहा है तो ठीक है. पर ऐसा तो है नहीं कि गुफा में जाकर साधु बनकर निकलेगा. तो बस, जी रहे हैं. अध्यात्म की बात क्या करना. हां, मेडिटेशन करती हूं. वह तो पहले से करती थी. अब और समय मिल गया है. ध्यान तो वैसे सबको करना चाहिए. अभी तो खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को स्वस्थ रखने की चुनौती है.

जान है तो जहान है. इसलिए ध्यान वगैरह जरूरी है. हम जैसे लोग शूटिंग के सिलसिले में हमेशा भागमभाग में रहते हैं, कभी इस फ्लाइट में तो कभी उस शहर. अकेले वक्त बिताने की फुरसत नहीं होती.

छोड़ो कल की बातें: अब शूटिंग वगैरह कब शुरू हो पाएगी, हम लोग नॉर्मली कब ट्रैवल कर पाएंगे? हमारी जिन फिल्मों की शूटिंग पूरी हो चुकी है, वे कब रिलीज हो पाएंगी? किसी भी चीज का कुछ नहीं पता.

सांस-सांस: ब तो यह तथ्य है कि लॉकडाउन से प्रदूषण घटा है. हम अच्छी तरह से सांस ले रहे हैं. हमें अपनी सरकारों पर दबाव डालना चाहिए कि सांस लेने के लिए साफ हवा जैसी बुनियादी चीज तो सबको मिलनी चाहिए. बाल-बच्चे वालों को तो खास तौर पर शोर मचाना चाहिए.

***

Advertisement
Advertisement