मोती सागर
रामायण, रामानंद सागर और रवींद्र जैन लगता है एक दूसरे के लिए ही बने थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि पापाजी (रामानंद सागर) पहले एक उपन्यासकार, लेखक थे. और एक लेखक अपने पात्रों की संवेदना किस तरह से व्यक्त कर सकता है, उसे वे भलीभांति जानते थे. उनके दिमाग में यह बात पहले से ही साफ थी कि धारावाहिक रामायण में संगीत का रोल बेहद अहम होगा.
दरअसल इसकी प्रेरणा उनको रामलीला से मिली थी, जिसमें रामायणी या सूत्रधार दोहे और चौपाइयों के माध्यम से सीन को आगे बढ़ाते थे. संवाद तो महत्वपूर्ण होते ही थे, कथा को गति देने और संवेदना को उभारने का काम दोहे और चौपाई इतने असरदार ढंग से करते थे कि दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते ही रह जाते थे. पापाजी ने संगीत की उसी शैली का प्रयोग किया.
रवींद्र जैन सचमुच संगीत के जीनियस थे. वे विद्वान और आशु कवि थे और पापा जी साहित्यकार. इसी वजह से दोनों में गहरी दोस्ती थी. हम लोग प्यार से उन्हें दद्दू कहते थे. रामायण बनने के पहले वे घर पर आकर पापाजी को ढेरों रचनाएं सुनाते और अक्सर ऐसा होता कि वहीं बैठे-बैठे वे लिख भी लेते और कंपोज भी कर देते. पापाजी उनकी प्रतिभा से चमत्कृत थे.
यही कारण था कि जब रामायण बनाने की योजना शुरू हुई तो पापाजी ने शीर्षक गीत के लिए जयदेव और शेष पूरे रामायण के लिए रवींद्र जी को रखा. और फिर उन दोनों की जुगलबंदी खूब चली. दद्दू पापाजी से कहते कि आप हमारे गुरु हो और पापाजी उनको कहते कि आप हमारे गुरु हो. उन दोनों के बीच गुरु की पदवी देने-लेने का यह सिलसिला आजीवन चलता रहा. पापाजी ने उनको कभी एहसास न होने दिया कि वे निर्माता-निर्देशक हैं. हम सभी भाई पापाजी की तरह ही उनका उसी तरह सम्मान करते थे.
दद्दू मात्र संगीत निर्देशक, गीतकार और गायक ही न थे. वे राम और कृष्ण के भक्त भी थे. वे कहा करते थे, उन्हीं की प्रेरणा से मैं यह सब कर पा रहा हूं और मैं इस महान कार्य में सहभागी भी उनकी ही कृपा से हुआ हूं.
एक दिन की बात है, दद्दू भयंकर बुखार में थे. इस बात की जानकारी उन्होंने हम लोगों को नहीं दी. उस समय रिकॉर्डिंग की व्यवस्था हम लोगों ने घर पर ही कर रखी थे. एक कमरे को स्टुडियो में कन्वर्ट करके रिकॉर्डिंग की जाती थी. एपिसोड फाइनल करके टेलीकास्ट के लिए जाना था. दद्दू टाइम पर आ गए. तब तक उनकी पत्नी ने फोन करके बताया कि उन्हें भयंकर बुखार है. पापाजी ने उनका माथा छुआ और उन पर नाराज हो गए. वे उनको घर भिजवाने की व्यवस्था करने में जुट गए. लेकिन दद्दू ने कहा कि 'मुझे राम के कार्य के लिए ही भेजा गया है और मैं यह एपिसोड करके ही जाऊंगा.' उन्होंने दवा लेकर वह एपिसोड पूरा किया.
एक एपिसोड का किस्सा सुनिए. इसमें सीनवाइज कई चेंज थे. सीन में प्रोग्रेशन भी था और घोर इमोशन भी. दद्दू ने कई कंपोजिशन सुनाईं. पापाजी कुछ बोल नहीं रहे थे. पापाजी ने तय किया कि कल एक सिटिंग फिर करेंगे. इसके बाद दद्दू चले गए. रात में एक बजे अचानक दद्दू का फोन आया. उन्होंने कहा कि 'स्टुडियो खुलवाओ, मुझे रिकॉर्ड करनी है.' वे रात में ही आए. हारमोनियम पर पापाजी को सुनाया. पापाजी ने कहा, बस यही तो चाहता था. दद्दू ने कहा कि आपके चाहने के पहले मैं भी यही चाहता था. उनके बोलते ही हम सब खिलखिलाकर हंस दिए.
रवींद्र जैन सरीखी प्रतिभा वाले लोग बहुत कम होते हैं. पापाजी और दद्दू की संगति आजीवन चली. बाद के सभी सीरियल्स का गीत-संगीत भी दद्दू ने ही किया. उनके न रहने पर हम लोगों ने अपने धारावाहिकों में उनसे सीखे संगीत का पूरा उपयोग किया. यही कारण है कि आप आज भी सागर फिल्म्स और सागर पिक्चर्स के प्रोजेक्ट्स में संगीत पर किए गए काम को अलग से ही पहचान सकते हैं.
(रामायण के सह निर्देशक मोती सागर से पटकथा लेखक विजय पंडित की बातचीत के आधार पर)
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