नए ढांचे में पंचायती राज लागू होने का यह रजत जयंती वर्ष है. लोकतंत्र की निचली इकाई ग्राम पंचायतों को वित्तीय और अधिशासी अधिकार संपन्न बनाने का सपना 25 साल बाद भी जारी है. जागरूक प्रतिनिधि पंचायत स्तर पर निरंतर प्रयास कर रहे हैं. ओडिशा की आरती देवी की दूरदर्शिता की वजह से गंजाम जिले की धनुकापाड़ा ग्राम पंचायत का डंका पूरे देश में गूंजा. 2012 में आरती देवी सबसे युवा सरपंच (कार्यकाल 2012-2017) हुईं. बैंक अफसर की नौकरी छोड़कर सरपंच बनीं उम्र 32 वर्षीया आरती ने अपनी ग्राम पंचायत के अभिनव विकास की नई परिभाषा गढ़ दी.
उन्होंने दोबारा सरपंच का चुनाव नहीं लड़ा पर नियमित ग्राम पंचायत जाती हैं, लोगों से मिलती हैं. उनकी बैठकों में डेढ़-दो हजार की भीड़ दौड़ी चली आती है. वे कहती हैं कि युवा पीढ़ी को बढ़ाना है तो जगह खाली करनी होगी. फरवरी, 2014 में अमेरिका में उन्होंने इंटरनेशनल विजिटर्स लीडरशिप प्रोग्राम में भारत का प्रतिनिधित्व किया. ओडिशावासी इसे अपने लिए गौरव की बात मानते हैं. उनकी कहानी उन्हीं की जबानीः
"शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव की ही थी. वहां की संस्कृति-सभ्यता मुझमें रची-बसी थी. बड़ी बात यह कि गांव के लिए कुछ करने का जज्बा मुझमें हमेशा रहा, बस तलाश थी एक अवसर की, जो मिल गया. पढ़-लिखकर बैंक में नौकरी की. लंबे समय बाद गांव जाने का मौका मिला. गांव वालों ने मेरे सामने प्रस्ताव रख दिया कि सरपंच का चुनाव लड़िए.
गांव आपके साथ है. सोचा क्या करूंगी सरपंच बनकर, गांव वालों से हफ्ते-दो हफ्ते का समय मांगा. बस, ले लिया निर्णय और शुरू हो गई यात्रा. मैंने नौकरी छोड़ दी. चुनाव लड़ा, आसपास की 47 पंचायतों में मुझे सबसे ज्यादा वोट मिले.
महिला होने की वजह से मुझे अपने काम करने में कोई दिक्कत नहीं हुई. सच पूछिए तो मुझे महिलाओं-पुरुषों ने मिलकर लड़ाया. धीरे-धीरे ग्रामसभा की बैठक में डेढ़ से दो हजार महिलाएं आने लगीं. लोगों में आगे बढऩे की ललक थी. मैं साक्षरता पर जोर देने लगी.
एक हजार महिलाओं को पढऩा-लिखना आ गया. उन्हीं में से वार्ड मेंबरों का चुनाव किया. हमने नारा दिया "टीपा नूहें-दस्तखत'' यानी अंगूठा नहीं, हस्ताक्षर. महिला सशक्तीकरण के लिए स्वतंत्र महिला ग्रामसभा बनाई. धनुकापाड़ा पंचायत में डेढ़ लाख पेड़ लगाए जो अब बड़े हो गए हैं. गांव वालों ने बच्चे की तरह इनकी देखभाल की. हमारी पंचायत को प्रकृति मित्र का पुरस्कार मिला.
यही नहीं, ग्राम पंचायत में पक्की सड़क के लिए आंदोलन चलाया. न केवल धनुकापाड़ा पंचायत, बल्कि कड़ाछईं, पांकलबाड़ी और के तुबाड़ी पंचायत के लोग साथ जुड़े. पीएमआरवाइ में 7.42 करोड़ रु. स्वीकृत करा लिया. चमाचम सड़कें बन गईं.
हमारे गांव का 10वीं तक का स्कूल एक टीचर के भरोसे था. मैंने पंचायती फंड से ढाई-ढाई हजार रु. में गांव के पढ़े-लिखे बेरोजगार तीन युवकों को टीचर रख लिया. स्कूल चल निकला. पहले के रिजल्ट में 14 बच्चे फर्स्ट और सेकंड डिवीजन से पास हुए.
इसके अलावा राज्य सरकार से ग्राम पंचायत स्तर पर स्वतंत्र महिला ग्रामसभा, कल्याण मंडप, पंचायत स्तर पर राष्ट्रीयकृत ग्रामीण बैंक या सहायक बैंक शुरू करवाया ताकि चिटफंड कंपनियों में ग्रामीणों का पैसा न फंसे. हर घर में शौचालय, पानी की सप्लाई का कनेक्शन और लीज पर लेकर निजी जमीन पर पेड़ लगाए और फिर किसानों को वापस कर दिया. मैंने स्वच्छ भारत अभियान में ग्राम पंचायत के गांवों में 1,500 शौचालय बनवाए हैं. इनमें से 15 महिला शौचालय हैं. महिलाओं के स्नानघर भी बनवाए. ये मेरी बड़ी उपलब्धियां हैं.
पीडीएस में घोटाले का पहला मामला पकड़ा. तीन चार महीने से राशन ही नहीं मिल रहा था. नियम पुस्तिका पढ़ी तो समझ में आया कि क्या कर सकती हूं. फिर पेंशन गड़बड़ी, इंदिरा आवास योजना में बिचौलियों का खेल समझी. एक बात मैंने मजबूती से लागू की कि योजनाएं गांव आएं तो लाभार्थी चिन्हित हों और लाभ उन तक एक व्यक्ति के माध्यम से नहीं, समिति के माध्यम से पहुंचे.
लेकिन अब दोबारा सरपंच का चुनाव नहीं लडूंगी. युवाओं को प्रोत्साहित करूंगी. युवा आगे आएं, नेतृत्व करें. ग्राम पंचायत की सेवा जहां भी हूं, करती रहूंगी. कामकाज के बारे में मुख्यमंत्री (नवीन पटनायक) से बातचीत हुई. सेवा के क्षेत्र में कुछ नया करने का जज्बा होना चाहिए, प्लेटफॉर्म कुछ भी हो.
मेरी राय में पंचायत स्तर पर जो भी केंद्र के सहयोग से कामकाज हो रहा है, उसकी मैपिंग की जानी चाहिए. गरीबी हटाने के नाम पर धन के व्यय पर नजर रखी जानी चाहिए. इसके
अलावा पंचायत को कार्यक्रमों के लिए राज्यों को और धन दिया जाए जिसका पंचायत पदाधिकारियों के माध्यम से व्यय हो. इससे जरूरी यह कि ग्राम सभाओं और वार्ड सभाओं में लोगों से राय-मशविरा कर अनिवार्य रूप से जिला योजनाएं बनाई जाएं. मैंने राज्य सरकार को बताया कि पंचायत अधिकारियों का कैडर ही पृथक कर दिया जाए.''
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