ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में मॉरिशस जाना हुआ, जो एक तरह से दूसरा भारत ही है. तीन दिन (18-20 अगस्त) के इस विश्वस्तरीय सम्मेलन की शुरुआत भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने के साथ हुई. दुनिया के लगभग तीन दर्जन देशों के हिंदीसेवी इसमें शरीक हुए.
मॉरिशस छोटा-सा ऐसा देश है, जो अपनी गिरमिटिया पहचान को संजोए हुए रामचरित मानस के आदर्शों पर चलने वाला, ऐसी सभ्यता का गायक है, जिसके अधिकतर घरों के छोटे-छोटे मंदिरों में मौजूद पहाड़ उठाए हनुमान जी के विग्रह और उस पर लहराती पताकाएं उसे एक विशिष्ट पहचान में तब्दील करती हैं.
साथ ही उसके अपने भूगोल में समाए प्राचीन परी तालाब को आध्यात्मिक रंग देते हुए भारत से गंगा जल लाकर उसे 'गंगा तालाब' के रूप में स्थापित किया गया है. ऐसे देश की धरती पर विश्व हिंदी सम्मेलन की रंगत सांस्कृतिक रूप से दोनों देशों के बीच सहकार का संदेश देने वाली रही. पोर्ट लुई से लेकर पाई में सम्मेलन स्थल स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय सभा केंद्र के प्रांगण तक सब ओर मॉरिशस और भारत के अननिगत राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे थे.
हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की स्वीकार्य भाषा बनाने के जतन में लगे विश्व हिंदी सम्मेलनों की भूमिका हर बार इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की रही है. इसी के तहत हिंदी का एक विश्व भाषा सचिवालय भी मॉरिशस में स्थापित हुआ है.
सम्मेलन में हिंदी को सिर्फ साहित्य या रचनाधर्मिता के स्तर पर ही केंद्रित न कर उसमें भाषा संबंधित ढेरों उपक्रमों को शामिल किया गया था. इसमें आधुनिक तौर पर हिंदी सीखने, उस भाषा के व्यावहारिक पक्ष की अधिकाधिक देशों में व्याप्ति और क्रियान्वयन के संदर्भ में भी चर्चाएं हुईं. हिंदी को वैश्विक ग्राम में देखने और उसे आधुनिक विषयों की पढ़ाई के संदर्भ में परखने की कोशिश में भी सम्मेलन ने अपनी भूमिका तलाशी.
मॉरिशस का हर दूसरा व्यक्ति हिंदी जानता है और भोजपुरी और उसी की तरह अवधी को भी थोड़ा-बहुत बोलकर अपना काम आसानी से चलाता है. मेरे ठहराव स्थल ली मैरीडियन में सुबह नाश्ते के समय अजुध्या नाम के एक सज्जन पूरी-पराठे बनाते थे.
नाम के संदर्भ के बारे में पूछने पर प्रसन्न भाव से बोले कि ''मेरे दादा का परदादा भारत में अयोध्या से आया था. उसी को याद करके हमारी वंश-परंपरा में अजुध्या सरनेम रखा जाता है.'' जब उन्हें मेरे अयोध्या से आने का पता चला तो उनकी आंखें छलछला आईं.
यह भी पता लगा कि यहां अधिकांश भारतवंशियों का सरनेम भारत में छूट गए उन गांवों और शहरों के नाम से है, जिनके पूर्वज कभी उन जगहों से निकलकर आए थे. सबसे पहले भारतीय मजदूरों के उतरने वाले प्रवासी घाट पर दस्तावेज रूप में करीब 4.5 लाख गिरमिटिया मजदूरों के रेकॉर्ड रखे हैं. उन सभी की जाति, धर्म, कस्बों, गांवों, परिवारों का ब्यौरा आप रेकॉर्डों से ले सकते हैं.
मॉरिशस के प्रधानमंत्री प्रवीण जगन्नाथ ने उद्घाटन सत्र में पोर्ट लुई के साइबर सेंटर को अटल जी के नाम पर लोकार्पित करने का ऐलान कर भारतीय प्रतिनिधियों को खुश कर दिया. पूर्व प्रधानमंत्री और सरकार में मार्गदर्शक मंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ के भावुक शब्द थेः ''मॉरिशस की आजादी के पीछे भारत का बड़ा योगदान है.
हम भारत को माता कहते हैं और इस रूप में मॉरिशस भारत के पुत्र जैसा है.'' सम्मेलन में शामिल प्रमुख रचनाकारों में प्रतिभा राय, चित्रा मुद्गल, चित्रा देसाई, निर्मला भुराडिय़ा, नरेंद्र कोहली, कमल किशोर गोयनका, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय, अशोक चक्रधर, डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण के अलावा हिंदी के कई वरिष्ठ पत्रकार और सिनेमा, रंगमंच की दुनिया के कई नाम शामिल थे. भारत लौटते हुए मॉरिशस के समुद्र का साफ, नीला जल हमें अपनी ओर बार-बार खींचता रहा.
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