जिंदगी की जंग भी हौसले से लड़ी जाती है और अगर आपके पास ज्ञान है तो यही आपके हौसले की जान भी है. सोचिए, क्या कोई बेजान शरीर के सहारे पिछले दस साल से शिक्षा का उजियारा बांट सकता है? 64 वर्षीया उमा शर्मा के हाथों और चेहरे को छोड़कर बाकी पूरा शरीर लकवाग्रस्त है. दस साल से वे बिस्तर पर हैं. मगर इस दौरान उन्होंने बतौर प्रिंसिपल अपने स्कूल का कोई शैक्षिक दिवस नहीं गंवाया. वे वर्चुअल क्लास भी लेती हैं.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर शहर के नुमाइश कैंप इलाके में एक बुजुर्ग सहायिका के साथ रहने वाली उमा शर्मा परिवार में अकेली हैं और मंगल नगर स्थित नेशनल पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल हैं. उनके लिए स्कूल और घर के बीच की पांच किमी दूरी का मतलब कोई फासला नहीं है. उन्होंने बीते 27 साल में अपने लगभग पूरे परिवार को दुनिया से विदा होते देखा है, लेकिन दुखों के पहाड़ को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया और अपने ज्ञान से ऐसे बच्चों को सीबीएसई और आइसीएसई बोर्ड के टॉपर बना रही हैं जिन्हें शैक्षिक रूप से कमजोर होने का एहसास कराया गया.
करीब 27 साल पहले पति अशोक शर्मा का देहांत हो गया तो उन्होंने गंगोह कस्बे में गरीब बच्चों के लिए चार साल तक अपना एक स्कूल चलाया. एक पुत्र और तीन पुत्रियों को पाला, उनकी शादियां कीं लेकिन बेटे और एक बेटी की असामयिक मौत हो गई. ''खुद को व्यस्त रखने के लिए शैक्षिक सेवाएं ही बेहतर विकल्प नजर आईं. बाद में ऐसे बच्चों को तलाशा जिनके भीतर ऐसी भावना पैदा हो गई थी कि वे पढ़-लिख नहीं सकेंगे."
अपने बिस्तर पर लेटे हुए ही वे टैब के जरिए हर क्लास से लेकर स्टाफ रूम और प्ले ग्राउंड तक के दृश्य पर नजर रखती हैं. स्कूल प्रबंधक सुरेंद्र चौहान बताते हैं, ''हमें उनके स्कूल में उपस्थित न होने का कभी एहसास नहीं हुआ, क्योंकि उनकी वर्चुअल उपस्थिति और सक्रियता किसी सशरीर उपस्थित व्यक्ति से कहीं ज्यादा है." शर्मा बताती हैं, ''दूसरे पब्लिक स्कूलों की तुलना में हमारे स्कूल की फीस एक-तिहाई कम है और यही मेरी सामाजिक उपलब्धि है." उमा शर्मा उन लोगों के लिए मिसाल हैं जिन्हें कुछ करना हो तो वे असुविधा या अक्षमता को आड़े नहीं आने देते लेकिन जो नहीं करना चाहते उनके लिए शारीरिक रूप से सक्षम और सुविधासंपन्न होना भी मायने नहीं रखता.
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