मुंबई के एक पांच सितारा होटल की कांच की मीनारों से घिरे मनोज बाजपेयी अपनी फितरत के अनुरूप शांत और बेफिक्र दिखाई देते हैं. सहायकों की फौज उनके इर्दगिर्द मंडरा रही है. जल्दी ही होने वाले फोटो शूट के लिए स्टाइलिस्ट उनके बाल और मूंछें संवार रहा है. इस सारी आवभगत के लिए वे एहसानमंद हैं, वे कहते तो हैं, पर वे उन आत्ममुग्ध अदाकारों में से नहीं हैं जो अपनी ''जद्दोजहद" का ढोल पीटते हैं. यह ठीक है कि यह बेहद टेढ़ा-मेढ़ा घुमावदार सफर रहा है मगर आखिर में यह अच्छा ही रहा. इसके अलावा निजी यादें कोई सार्वजनिक संपत्ति नहीं हैं.
फिल्मी दुनिया में 20 से ज्यादा साल गुजारने के बाद बाजपेयी अब सहज और सुविधाजनक मुकाम पर हैं, जो उन्होंने खुद बनाया है. बड़े बैनरों या 100 करोड़ रु. की फिल्में हाथ से निकलने का उन्हें कोई मलाल नहीं है. स्वतंत्र सिनेमा में अपने ढंग से काम करके वे खुश हैं, फिर चाहे इसका यही मतलब क्यों न हो कि कुछ फिल्म निर्माता पोस्टरों पर उनका चेहरा लगाने की नीयत से उन्हें स्पेशल एपियरेंस में ले रहे हैं. वे कहते हैं, ''मौलिक कहानियों और नई-नवेली शैलियों के नौजवान डायरेक्टर बढिय़ा प्रोजेक्ट लेकर आ रहे हैं. वे लोगों से उनकी जबान में बात करने को तैयार हैं. कंटेंट फिर अचानक अहम हो गया है. वे इंटेलिजेंट हैं. वे बेधड़क हैं. वे मेरे इस भरोसे को मजबूत करते हैं कि आप बस अपना काम करने पर ध्यान दें. मैं इस सबका हिस्सा भला कैसे न बनूं?"
उनकी अगली फिल्म रुख, जो लेखक-निर्देशक अतनु मुखर्जी की पहली फीचर फिल्म है, इस महीने के आखिर में परदे पर आएगी. यह ऐसे लड़के का कहानी है जो पिता की मौत की पड़ताल करते हुए पारिवारिक रिश्तों को नए सिरे से खोजता है. बाजपेयी को पूरा भरोसा है कि यह एक नया मानदंड रचेगी. वे कहते हैं, ''डायरेक्टर ने इस पेचीदा मसले को—जिसमें एक बेटा पिता की खुदकुशी की वजहें तलाश रहा है—जितनी संवेदनशीलता के साथ संभाला, वह बेमिसाल है." वे इन द शैडोज के मुख्य किरदार में भी आ रहे हैं. यह एक मनोवैज्ञानिक ड्रामा है जिसे पहली फिल्म बना रहे दीपेश जैन ने लिखा और निर्देशित किया है. फिल्म इस महीने बुसान फिल्म फेस्टिवल में पहली बार दिखाई जाएगी.
बाजपेयी इस किस्म के प्रोजेक्ट में काम करने से हासिल ''आउटसाइडर" या पराये के तमगे से ऊब चुके हैं—और इसलिए भी कि उनके पिता मशहूर नहीं हैं. वे कहते हैं, ''इस दुनिया में कौन पराया नहीं है? हम सब पराये-अपने हैं, फिर हम चाहे जो करते हों." वे यह भी कहते हैं, ''मैं चाहे एक्टिंग क्लास ले रहा हूं या लेक्चर दे रहा हूं, हमेशा नौजवानों से यही कहता हूं कि कुनबापरस्ती को लेकर हायतौबा मत मचाओ और अपना हुनर निखारने पर जोर दो. यही चीज है जो नैया पार लगाएगी. फिल्मी दुनिया अकेली जगह नहीं है जहां (फिल्मी खानदानों से जुड़े) बच्चे दाखिल होते हैं. क्या दूसरी जगहों पर ऐसा नहीं होता?"
मेथड ऐक्टर होने के नाते बाजपेयी दृश्य के खत्म होने पर किरदार से बाहर आना अब भी सीख ही रहे हैं. वे याद करते हैं कि एक ऐसा वक्त भी था जब उनके पास दिमाग के डॉक्टर के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता था. ई. निवास की शूल में उनकी बेहद जज्बाती अदाकारी का इतना गहरा असर पड़ा था कि उससे उबरने में उन्हें महीनों लग गए थे. वे बताते हैं, ''कोई तरीका ही नहीं था कि विशेषज्ञों की मदद के बगैर मैं संभाल पाता. अब मैंने सीख लिया है कि किरदार को सेट पर ही छोड़कर कैसे आना है."
वे कहते हैं, ''सत्या में भीखू म्हात्रे से लेकर अलीगढ़ में प्रोफेसर सिरास तक हरेक किरदार ने मुझे कुछ-न-कुछ सिखाया है, जो अदाकारी के हुनर से कहीं आगे जाता है. यही मेरा कुल हासिल है." सिनेदर्शक भी इससे ज्यादा समृद्ध हुए हैं और शायद उतना ही खुद यह फिल्म उद्योग भी.

