scorecardresearch

शायरीः जिनसे गुलज़ार है अदबी दुनिया

प्लूटो से प्लैनेट का दर्जा छिनने पर गुलज़ार उसकी “उदासी देखकर” इस कदर दुखी हो गए कि उन्होंने अपनी सारी छोटी नज्मों को उसके नाम कर दिया. अमूर्त भावों को शब्दों का जामा पहनाकर खूबसूरत नज्में लिखने वाले शायर की रचनाओं का संकलन.

अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2016

कहते हैं, आजकल फिल्मी गाने लिखने के लिए 75 शब्दों की जरूरत होती है और ज्यादातर गीतकार इतने शब्दों के भीतर ही काम चलाते हैं, लिहाजा सब गाने एक जैसे ही लगते हैं. लेकिन संपूर्ण सिंह कालरा “गुलज़ार” इन 75 शब्दों को छोड़कर 76वें लफ्ज से अपनी बात शुरू करते हैं. इसकी वजह यह है कि वे बुनियादी तौर पर अदबी शायर हैं. अदीब और शायर की हैसियत से जहां वे एहसासात और तजुर्बात को अल्फाज में ढालते हैं, वहीं फिल्मकार की हैसियत से उन्हें पर्दे पर भी बखूबी उतारते हैं.

गुलज़ार के कविता संग्रह यार जुलाहे के संपादक यतींद्र मिश्र कहते हैं, “हम जब भी किसी को संपूर्णता में देखते हैं तो प्रायरू उसकी प्रशंसित और बहुप्रचलित छवि में कैद करके ही उसका आकलन करते हैं.” लिहाजा, उन्होंने इस किताब में गुलज़ार की नज्मों की पड़ताल उनकी सिनेमाई शख्सियत से अलग नहीं बल्कि उसके हमसफर के तौर पर करने की कोशिश की है.

गुलज़ार दीनवी (दीना, पाकिस्तान, जहां उनका बचपन बीता) से अब सिर्फ गुलज़ार के नाम से मशहूर हुए इस शायर ने बंटवारे का दंश झेला, फिल्मी दुनिया में जाने से पहले मुंबई में मोटर मैकेनिक के रूप में काम किया और अपने दोस्त-सरपरस्त शैलेंद्र के साथ तरक्कीपसंद तहरीक से जुड़े.

“अट्ठारह अगस्त उन्नीस सौ चौंतीस” की “चेसिस” वाले गुलज़ार आज भी रोज सात घंटे लिखते हैं और अपनी उम्र के लोगों की तरह “हमारे जमाने में यह हुआ करता था...” जैसे जुमले नहीं फेंकते बल्कि वक्त के साथ खुद को हमकदम रखते हैं. यह दीगर बात है कि अदीबों में पाया जाने वाला नॉस्टैल्जिया उनकी रचनाओं में भी है, लेकिन यह उनके लिए “विलासिता है, मनबहलाव है. आप ऐसी हालत में नहीं रह सकते.” यही वजह है कि एक ओर उन्होंने जहां दीना की यादों को रचनाओं में ताजा किया है, वहीं अपने जमाने की लगभग हर हकीकत को दर्ज किया, चाहे वे कितनी ही तल्ख क्यों न हों.

यतींद्र ने, जो बकौल गुलज़ार “मुझसे छोटे हैं, मगर दोस्त हैं,” उनकी शायरी का गहन अध्ययन करके उन अल्फाज की छोटी फेहरिस्त बनाई है जो अक्सर उनकी रचनाओं में आते हैंः “रोटी, तवा, उपले, चूल्हा, धुआं, बरगद का पेड़, चांद, हरी पत्ती, बताशे, रेशम के तागे, शहतूत, अखबार, पंछी, जामुन बादल, घर का दरवाजा और पानी की बूंद-यह सब मिलकर गुलज़ार की कविताओं और शायरी का आनंदलोक गढ़ते हैं.”

इनमें चांद ऐसा लफ्ज है जो बार-बार आता है, और ऐसा लगता है, मानो यह उनकी शायरी की पहचान बन गया है. “चांद गुलज़ार की कविता में इकलौता ऐसा बिंब है, जो लगभग बार-बार हमसे मुखातिब होता है. वह अकेले में ही कभी-कभी पूरा दृश्य बनता है या किसी नज्म में अपने प्रवेश के साथ सारी दृश्यावली को विशिष्ट किस्म का “गुलज़ार टाइप” बना देता है.” मसलनः चुपके से झांके चंदा या रोज अकेली आये/चांद कटोरा लिये भिखारन रात.

ब्रह्मांड की अमूर्त प्रकृति से आकर्षित होने वाले गुलज़ार खुद मानते हैं, “मैं अक्सर चांद के बारे में लिखता हूं, और यह किसी शख्स या खासियत को सिम्बोलाइज करता है.” नासा उनकी पसंदीदा वेबसाइट है. ताज्जुब नहीं कि उन्होंने “प्लूटो” से उपग्रह का रुतबा छिनने पर अपनी सारी लघु कविताएं उसके नाम कर दीं. पंद्रह पांच पचहत्तर से लगता है कि गुलज़ार रवायतों के गुलाम नहीं हैं.

अमूर्त भावों को अल्फाज का जामा पहनाकर खूबसूरत नज्म की शक्ल देना गुलज़ार की खासियत है. वे गुलो-बुलबुल की शायरी नहीं करते, लेकिन प्यार के एहसास को जिस “खामोशी” के साथ उन्होंने पेश किया, शायद वह हमेशा याद किया जाएगाः प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज नहीं/एक खामोशी है सुनती है कहा करती है/यह न बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कहीं/नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है.

अमूर्त को मूर्त रूप देने की गुलज़ार की महारत पर आने वाली नस्लें रश्क करेंगी और मुमकिन है हिंदी या उर्दू अदब का कोई छात्र उनके इस हुनर को अपने शोधपत्र का विषय बनाए. उसे यार जुलाहे से काफी मदद मिलेगी क्योंकि यतींद्र ने इसमें गुलज़ार की सारी प्रतिनिधि नज्मों का “गुच्छा” बनाने की कोशिश की है. इनसे गुलज़ार की शख्सियत और उनकी फलसफाना सोच को समझने में मदद मिलती हैः क्या लिए जाते हो तुम कन्धों पे यारो/इस जनाजे में तो कोई भी नहीं है.../सिर्फ मिट्टी है ये मिट्टी/मिट्टी को मिट्टी में दफनाते हुए/रोते हो क्यों? (मर्सिया).

गुलज़ार कोई इनकलाबी शायर नहीं हैं लेकिन इंसान की बेबसी और हालात पर तल्ख टिप्पणी देखिएः कब्रिस्तान है, कब्रिस्तान से गुजरो तो आहिस्ता बोलो/...लोग अपने जिस्मों के कब्रों में बस मिट्टी ओढ़े दफ्न पड़े हैं (कब्रिस्तान). एक और देखेः मुझको भी तरकीब सिखा कोई, यार जुलाहे!...मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता/लेकिन उसकी सारी गिरहें/साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे! इसी तरह “एक मंजर”, “मौत का क्या है”, “रात के पेड़ पे”, “जिक्र आए तो मेरे लब से दुआएं निकले”, “बेसबब मुस्करा रहा है चांद”, “जिंन्दानामां”...अगर गुलज़ार चंद नुक्ते की गलतियों और एक जगह लब्बोलुबाब की जगह लब्बोलुआब को नजरअंदाज कर दें तो यकीनन उन्हें भी यह मजमूआ पसंद आएगा. इस संग्रह की सारी नज्में और गज़लें उस शख्सियत के तसव्वुर और फिक्रो-हुनर का आईना हैं, जिसके दम से हिंदुस्तानी जबान की दुनिया गुलज़ार है.

समीक्षा की गई किताब का ब्यौरा
गुच्छा (गुलज़ार की चार किताबों का सेट)
लेखकः प्लूटोः गुलज़ार, पंद्रह पांच पचहत्तरः गुलज़ार, कुसुमाग्रज की चुनी सुनी नज्मेः तर्जुमा गुलज़ार और यार जुलाहे...गुलज़ारः संपादक यतींद्र मिश्र
प्रकाशकः वाणी
मूल्यः 1,250 रु.

Advertisement
Advertisement