भारतीय राजनीति का चेहरा जब-जब बदला है, उसके पीछे युवाओं का जज्बा और जुनून देखने लायक रहा है. चाहे वह 1970 के दशक में पटना के गांधी मैदान से उठा जेपी आंदोलन हो जिसने नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को जन्म दिया या फिर दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से शुरू हुआ अण्णा आंदोलन, जिसके जरिए दिल्ली की जनता को अरविंद केजरीवाल के रूप में एक अदद नया नेता मिला. दोनों ही आंदोलनों का मुख्य चेहरा भले युवा नहीं था लेकिन यह युवाओं की अपार ताकत और बदलाव की इच्छाशक्ति ही थी जिसने इन आंदोलनों को सफल बनाया. फिर भी युवाओें पर आरोप लगते हैं कि वे राजनीति में बदलाव तो चाहते हैं लेकिन खुद राजनीति में नहीं आना चाहते. हालांकि हाल ही में हुआ एक अध्ययन और कुछ प्रदेशों के स्थानीय निकायों के चुनाव बताते हैं कि अब ऐसा नहीं रहा. बड़ी संख्या में खासकर पढ़े-लिखे और पेशेवर युवा, न केवल राजनीति में उतर रहे हैं बल्कि आज का मतदाता उन्हें खुले मन से स्वीकार भी कर रहा है.
अच्छी खबर यह है कि राजनीति में आने के इच्छुक युवा बड़े पैमाने पर गांव, कस्बे और शहरों की स्थानीय राजनीति से अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत कर रहे हैं. इनमें गैर-राजनैतिक घराने वालों की भी अच्छी-खासी तादाद है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुए स्थानीय नगर निकायों और ग्राम पंचायत के चुनाव में बड़ी संख्या में युवा उम्मीदवार जीते हैं, इसमें भी खासकर विजेता महिलाओं की तादाद उल्लेखनीय है. इसकी वजह यह है कि दोनों प्रदेशों के निकाय चुनावों में राजनैतिक दलों ने आरक्षित सीटों से ज्यादा महिला प्रत्याशियों को खड़ा किया था.
उम्रदराज नेताओं का जमाना लदा
किसी जमाने में उम्मीदवार में सबसे ज्यादा महत्व अनुभव का हुआ करता था. सीधा मतलब है जितना ज्यादा अनुभव, उतना उम्रदराज नेता. लेकिन मध्य प्रदेश में दिसंबर 2014 से जनवरी 2015 के बीच 287 नगरीय निकायों के चुनावों में पार्टियों ने जिन उम्मीदवारों का चयन किया उससे यह अवधारणा बदलती नजर आती है.जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने वाले संस्थान भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नंस ऐंड अर्बन मैनेजमेंट (एनआइजीयूएम) ने मध्य प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में नव निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थिति का अध्ययन किया है. इसके मुताबिक, इस बार सभी प्रमुख राजनैतिक पार्टियों ने ज्यादातर युवा उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारा था और मतदाताओं ने भी युवा प्रतिनिधियों को पसंद किया. प्रदेश के नगर पालिका निगमों में महापौर के कुल 14 पदों में से सिर्फ दो की आयु 56 वर्ष से ऊपर है. नगर पालिका निगम में ही कुल 778 पार्षदों में 65 वर्ष से अधिक आयु का केवल एक पार्षद है जबकि सर्वाधिक 317 पार्षद 36 से 45 वर्ष आयु वर्ग के हैं. नगर पालिका परिषद और नगर परिषद के निर्वाचित प्रतिनिधियों में सर्वाधिक संख्या 36 से 45 वर्ष वालों की है. भविष्य की राजनीति के लिए यह अच्छा संकेत है. जैसा कि एनआइजीयूएम के डायरेक्टर एच.एम. मिश्र कहते हैं, ''लगभग 28 वर्ष तक जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने के दौरान यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में नई पीढ़ी के पढ़े-लिखे और पेशेवर युवाओं ने चुनाव में भागीदारी की है. इन स्थानीय चुनावों में पहले की अपेक्षा कहीं कम उम्र के महापौर चुने गए हैं.'' इस बार सबसे कम उम्र की महापौर, सिंगरौली की प्रेमवती खैरवार की उम्र महज 28 साल है. इसी तरह खंडवा के 21 वर्षीय सागर अनिल आरतानी प्रदेश में नगर निगम के सबसे कम उम्र के पार्षद हैं. गढ़ाकोटा नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए 25 वर्ष के भरत चौरसिया की उम्र भी प्रदेश में इस स्तर के निर्वाचित प्रतिनिधियों में सबसे कम है.
अनुभव पर भारी शिक्षा
दिल्ली विधानसभा चुनाव में चुने गए आप के जनप्रतिनिधियों की तरह मध्य प्रदेश के स्थानीय चुनाव में भी कई ऐसे नव-निर्वाचित प्रतिनिधि हैं जो अपना जमा-जमाया करियर छोड़कर राजनीति में उतर आए हैं. कई ऐसे हैं जिन्होंने अच्छे वेतन वाली नौकरी का विकल्प होने के बावजूद राजनीति का दामन थामा. इसी बात की तस्दीक एनआइजीयूएम का अध्ययन भी करता है, जिसके मुताबिक, प्रदेश भर से चुने गए नगर पालिका के कुल 778 पार्षदों में 77 स्नातक, 38 स्नातकोत्तर, 18 वकील और 3 इंजीनियर हैं. महज नौ पार्षद अशिक्षित हैं. भोपाल से पार्षद बने 37 वर्षीय गिरीश शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट हैं. वे कहते हैं, ''राजनीति में अब युवाओं की नई फौज तैयार हो रही है. मतदाताओं का भी यही मानना है कि युवा नेता ईमानदारी से काम करते हैं.''
शहरी निकायों ही नहीं, ग्राम पंचायत चुनाव में भी मतदाताओं ने अनुभव की बजाए शिक्षा को ज्यादा तवज्जो दी है, यहां भी शिक्षित युवाओं का परचम लहराया है. बदलाव की खातिर राजनीति में आने वाले युवाओं की भी उम्दा मिसालें हैं. उज्जैन जिले के भिड़ावद गांव की सरपंच 21 वर्षीया ऋतु पांचाल को ही लें. एमबीए कर रही ऋतु के परिवार का राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं. क्या वजह थी जो उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना? उन्हीं के शब्दों में, ''गांव में सड़कें नहीं हैं, गांव की लड़कियों को पढ़ने भी नहीं भेजा जाता. ये दो बातें हमेशा मेरे जेहन में चुभ रही थीं. हमने सोचा कि गांव में परिवर्तन लाने के लिए हमें ही कुछ करना होगा. बस इसीलिए यह रास्ता चुना.''
राजस्थान के स्थानीय चुनावों में भी दृश्य इससे बहुत अलग नहीं. कोटा क्षेत्र की 30 वर्षीय नुपूर मालव को भी गांव की दुर्दशा ने ही अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़कर देहाती राजनीति में कूदने को मजबूर किया. बीई और एमबीए कर चुकी नुपूर दस साल से कोटा की इंस्ट्रुमेंटेशन लिमिटेड में कार्यरत थीं लेकिन राजनैतिक करियर की खातिर उन्होंने यह नौकरी भी छोड़ दी. नुपूर कहती हैं, ''गांवों की हालत खराब है, खासकर ग्रामीण महिलाओं की. उनकी बेहतरी के लिए ही मैंने नौकरी छोड़कर राजनीति में आने का फैसला किया. ग्रामीण इलाकों की समस्याओं का हल निकालना बेहद जरूरी है.''
रूढि़यों की बेडि़यां टूटीं
आम तौर पर रूढि़वादी माने जाने वाले राजस्थान में भी स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायत चुनाव के नतीजे हैरान करने वाले हैं. यहां के मतदाताओं ने शिक्षित युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को भी नेतृत्व का मौका दिया है. दरअसल इस बदलाव की वजह प्रदेश की वसुंधरा राजे सरकार का वह फैसला भी रहा जिसके तहत पंच पद को छोड़कर पंचायती राज चुनाव में अन्य सभी पदों के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों के लिए सरकार ने न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लागू कर दी थी. वरिष्ठ पत्रकार डॉ. यश गोयल कहते हैं, ''शैक्षणिक अनिवार्यता लागू करने से प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में नया और युवा नेतृत्व उभरा है और गैर-राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को भी इस बार मौका मिला है.'' लेकिन खास बात यह रही कि जनता को केवल न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पर खरे उतरने वाले ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षित जनप्रतिनिधि मिले हैं. इन्हीं में से एक हैं जैसलमेर की जिला प्रमुख चुनी गई अंजना मेघवाल. एमए और बीएड कर चुकीं 32 वर्षीया अंजना ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा की प्रमुख परीक्षा भी पास कर ली है. अंजना की कहानी मिसाल इसलिए है क्योंकि राजस्थान की आलोचना हमेशा से ही यहां की विधवाओं की स्थिति को लेकर होती रही है. अंजना ने 2011 में एक हादसे में अपने पति को खो दिया था लेकिन वे निराश होने की बजाए आसपास के लोगों के हितों की पैरोकार बन गईं. अंजना कहती हैं, ''अब मेरा सारा ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों में बालिका शिक्षा पर रहेगा.'' गोयल की मानें तो शिक्षित जन प्रतिनिधियों के आने की वजह से प्रशासनिक अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच संवाद और बेहतर हो सकेगा. संबंधित विभागों तक ग्रामीणों की समस्याएं तेजी से और सही तरह से पहुचेंगी, जिससे उनका समाधान निकालना भी आसान हो जाएगा.
महिलाएं अब कठपुतली नहीं
अजमेर की जिला परिषद तो अपने आप में एक मिसाल बनकर उभरी है जहां कुल 32 सदस्यों में से 17 महिलाएं हैं. इनमें भी ग्यारह महिलाएं स्नातक, दो पोस्टग्रेजुएट और एक डॉक्टरेट है. राजनीति न तो अब महिलाओं के लिए अछूत क्षेत्र रहा है और न ही इसमें उतरने वाली महिलाएं अपने पति, पिता या किसी परिजन की कठपुतली भर हैं. अलवर जिले के नीमराणा क्षेत्र की बिचपुरी ग्राम पंचायत की सरपंच चुनी गई 22 वर्षीया संतोष कुमारी वैसे तो नर्सिंग का कोर्स कर रही हैं लेकिन राजनीति में आने का उनका हमेशा से सपना रहा था, जिसे उनके परिवार और ग्रामीणों ने और हौसला दिया. संतोष बताती हैं, ''पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से यहां के लोग बेटी के 18 साल की होने पर भी उसका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं करवाते थे.'' लेकिन लोगों की सोच को बदलने की संतोष की कोशिश कामयाब हुई और उन्होंने सैकड़ों बेटियों का नाम उनके माता-पिता की सहमति से मतदाता सूची में शामिल करवाया. इसका फायदा खुद संतोष को भी मिला, जिन्हें ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत में शामिल तीन गांव पीपली, बिचपुरी और फतेहपुरा की जिम्मेदारी सौंप दी.
स्थानीय चुनाव में राजनैतिक पार्टियों ने भी युवा महिलाओं पर भरोसा जताया. जैसा कि एच.एम. मिश्र बताते हैं, ''मध्य प्रदेश में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं लेकिन नव-निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में महिलाओं का प्रतिशत लगभग 52 फीसदी है.'' इसका मतलब यह है कि पार्टियों ने तय फीसदी से अधिक और अनारक्षित सीटों से भी महिला उम्मीदवारों को खड़ा किया था. इन चुनावों में जीती शिक्षित युवा महिला जनप्रतिनिधि न केवल अपने इलाके की समस्याओं से अच्छी तरह वाफिक हैं बल्कि उन्होंने अपने लक्ष्य भी तय कर लिए हैं. जोधपुर विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई कर रहीं 22 वर्षीया विनीता राठौड़ कहती हैं, ''नियम और कानून की जानकारी नहीं होने की वजह से गांव के लोग लंबे समय तक जमीन और जायदाद के मसलों को लेकर कोर्ट की लड़ाई में उलझे रहते हैं. कानूनी पढ़ाई से हासिल ज्ञान का इस्तेमाल मैं उनकी इस तरह की समस्याएं सुलझाने में भी कर सकूंगी.'' उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से एमबीए कर रहीं बड़नगर तहसील के ग्राम भिड़ावद की सरपंच 21 वर्षीया पांचाल किसान परिवार से हैं. ग्रामीण जीवन से जुड़ी परेशानियों ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. वे कहती हैं, ''गांव में सड़कें नहीं होने की वजह से बरसात के दिनों में परेशानी बहुत बढ़ जाती है. हम पढ़े-लिखे हैं इसलिए सोचा कि गांव की बेहतरी के लिए कदम भी हमें ही उठाना होगा.''
क्योंकि मिसाल सामने है
जब राजस्व सेवा का एक अधिकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आ सकता है तो हम क्यों नहीं, शायद यही बात राजनीति में उतरने का फैसला लेने वाले युवाओं के जेहन में रही होगी. निश्चित ही आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल समेत अन्य पार्टियों के भी युवा नेता देशभर के युवाओं के लिए मिसाल बनते दिख रहे हैं. यूथ ऐंड इलेक्टोरल पॉलिटिक्स: ऐन इमर्जिंग एंगेजमेंट के लेखक और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक डॉ. संजय कुमार कहते हैं, ''निर्भया कांड (2012 में हुआ दिल्ली गैंगरेप) और अण्णा आंदोलन जैसी घटनाओं ने युवाओं को अपनी सक्रियता दिखाने के लिए मंच उपलब्ध करवाया. यहां उन्हें लगा कि वे भी अपनी आवाज उठा सकते हैं. इसीलिए पिछले 5-6 साल, खासकर हाल में हुए लोकसभा चुनाव में युवा मतदाता बड़ी संख्या में मतदान करने पहुंचे.''
बदले राजनैतिक माहौल ने युवाओं के भीतर यह आत्मविश्वास भी जगाया कि राजनीति में आकर भी वे देश के लिए कुछ कर सकते हैं. दिल्ली के रोहतास नगर से विधायक 28 साल की सरिता सिंह ने चार साल पहले अण्णा आंदोलन से जुड़ने के दौरान ही राजनीति में आने की ठान ली थी. वे कहती हैं, ''देश का युवा समझदार हो रहा है. वह भी देश के लिए कुछ करना चाहता है.'' दिल्ली यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र में एमए कर चुकीं सरिता के परिवार ने भी पहले पहल उनके राजनीति में आने का विरोध किया था. लेकिन केजरीवाल को अपना आदर्श मानने वाली सरिता के दृढ़ निश्चय के आगे परिवार ने भी घुटने टेक दिए. डॉ. कुमार कहते हैं, ''राजनीति को लेकर युवाओं के मन में जो हिचक हुआ करती थी, वह अब टूट गई है. अब उनके सामने ऐसी कई मिसालें हैं, ऐसे सफल लोग हैं जो अपना करियर छोड़कर राजनीति में आए हैं. ऐसे लोगों के कारण राजनीति की प्रामाणिकता भी बढ़ी है.''
शायद इसीलिए कई पेशेवर भी राजनीति में उतर आए हैं. एनआइजीयूएम का अध्ययन बताता है कि मध्य प्रदेश में 588 जनप्रतिनिधि स्नातक हैं. यह अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण नतीजे पर पहुंचा है और वह यह है कि शिक्षित युवा और महिलाओं के लिए अब राजनीति अछूती नहीं रही. यह भविष्य के लिए शुभ संकेत है.
कानून से पहले उसका तोड़
ग्रामीण राजनीति में राजस्थान सरकार ने न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता लागू की तो फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने का धंधा चल निकला है. राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने ग्राम पंचायत के चुनाव में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लागू की थी तो यह सोचकर कि जनता के प्रतिनिधि शिक्षित होंगे तो उनकी समस्याओं को बेहतर ढंग से पेश कर सकेंगे. हालांकि सरकार के इस निर्णय के साथ ही विभिन्न पार्टियों और सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई थी कि इस नियम के चलते फर्जी सर्टिफिकेट बनाने वालों का धंधा चल निकलेगा. वह अंदेशा अब सही साबित होता दिख रहा है.
नागौर जिले के रियाबड़ी तहसील की सैंसड़ा ग्राम पंचायत में माडूडी देवी पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज के बूते सरपंच बनने का आरोप है. दरअसल माडूडी देवी ने फर्जीवाड़ा करने मेंे एक बड़ी चूक कर दी. पहली चूक—माडूडी ने चेन्नै की श्री राधाकृष्ण मिडिल स्कूल पुडुपक्कम से जून 1991 में टीसी जारी होना बताया. लेकिन 1996 तक चैन्ने का नाम मद्रास ही था. वहीं दूसरी चूक भामाशाह कार्ड में उन्होंने खुद को अशिक्षित बताया जिसमें हस्ताक्षर की जगह उन्होंने अंगूठा लगाया था. इसी तहसील के ग्राम पंचायत डोडियाना की सरपंच आठवीं पास प्रमाण पत्र के बूते सरपंच बनी हैं जबकि भामाशाह कार्ड के नामांकन पत्र मेंे सरपंच घेवरीदेवी ने खुद को पांचवीं पास बताया है.
दरअसल सरपंची पद के बडे रुतबे और करोड़ों रु. के बजट से लालायित होकर सरंपच पद के प्रत्याशियों ने फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल किया.
फर्जी दस्तावेज बनाने वाले शैक्षणिक संस्थानों ने भी जमकर चांदी कूटी. नागौर के रोल गांव के भरत बाल निकेतन स्कूल के संचालक रामविलास चारण ने 15 लोगों की फर्जी टीसी बनाई और इनमें से 14 लोग सरपंच बन गए. चारण ने फर्जी टीसी बनाने के लिए 50,000 रु. से लेकर एक लाख रु. तक वसूले थे. मजे की बात है कि कई टीसी स्कूल को मान्यता मिलने से पहले की तारीखों में जारी हुए हैं.
फर्जी दस्तावेजों का मामला उस वक्त खुला जब नागौर जिले की चूंटीसरा ग्राम पंचायत की सीता देवी ने सरपंच नारायणी देवी और चारण के खिलाफ मामला दर्ज करवाया. पता चला कि सरपंच की टीसी रविवार को जारी की गई थी. फर्जी टीसी पर जिला शिक्षा अधिकारी की फर्जी सील भी थी.
नागौर जिले में फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के बल पर सरपंच बनने के करीब ढाई दर्जन मामले सामने आ चुके है. इनमें से ज्यादातर महिलाएं हैं. सीकर जिले में भी एक निजी स्कूल का ऐसा ही कारनामा सामने आया, जबकि दौसा जिले में ऐसे 20 सरपंचों के खिलाफ मामाले दर्ज हो चुके हैं. जिले के बांदीकुई स्थित टैगोर विद्या मंदिर के संचालक शिवप्रकाश तिवाड़ी ने फर्जी टीसी के लिए पांच से बीस हजार रु. तक लिए थे. इसी तरह सीकर के आलोक बाल शिक्षण संस्थान के निदेशक अशोक काबरा और दलाल बाबूलाल को फर्जी मार्कशीटों के साथ गिरफ्तार किया गया है. यहां से पुलिस को विभिन्न विभागों की नकली 37 मुहरें मिली हैं.
फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर सरपंच और पंचायत सदस्य बने लोगों की पोल खुलने के साथ ही राज्य सरकार का न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता का फैसला भी सवालों के घेरे में आ गया है. —साथ में रोहित परिहार, विजय महर्षि, राजेंद्र शर्मा, पीयूष पाचक, विमल भाटिया, क्षितिज गौड़, समीर गर्ग, महेश शर्मा और शुरैह नियाज़ी
सियासी जमीन पर नई पौध
मध्य प्रदेश और राजस्थान में ग्रामीण और शहरी निकायों के चुनावों में अप्रत्याशित तौर पर युवाओं और उच्च शिक्षित तबके ने जमाया रंग. इन प्रदेशों में ग्राम पंचायत के चुनाव में भी मतदाताओं ने अनुभवी की बजाए शिक्षित उम्मीदवारों को ज्यादा तवज्जो दी है.

अपडेटेड 18 मार्च , 2015
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