अध्यापकी के अपने करिअर की शुरुआत बिपिन चंद्रा ने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से की थी. इसके बाद उन्होंने कई साल तक दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाया और 1971 में वे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से जुड़ गए. मुझे याद है, मैं जब उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का छात्र हुआ करता था, तब वे इतिहासकारों के उस समूह का हिस्सा थे जिसमें तपन रायचौधरी, रोमिला थापर और एस. गोपाल जैसी जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं.
इन सबकी ओर हम बड़ी श्रद्घा और प्रेरणा वाली दृष्टि से देखा करते थे. श्रद्धा की नजर से इसलिए क्योंकि उन्होंने भारत को दुनियाभर में अलग पहचान दिलाई थी. इतिहासकारों का यह समूह देश के सियासी मिजाज की, रैडिकल मिजाज की झलक देता था.
तब तक नेहरू युग खत्म हो चुका था. पंडित नेहरू की मौत हो चुकी थी. फिर भी धर्मनिरपेक्षता, विकास, विज्ञान और तकनीक और शिक्षा का प्रसार जैसे नेहरू युग के विचारों के लिए भारी प्रतिबद्घता मौजूद थी. आशावाद अब भी पर्याप्त था और वह इन इतिहासकारों के विश्व दर्शन में भी झलकता था. लेकिन वे यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर नहीं थे, वे तो इसके आलोचक थे. उन्होंने अपने खुद के सवाल तैयार किए थे और उनके उत्तर भी दिए थे जो स्थापित विश्व दर्शन से इत्तेफाक नहीं रखते थे.
उस दौरान दुनियाभर में चल रहे उम्दा किस्म के कामों के बारे में हमने पढ़ा था. लेकिन इन शख्सियतों का काम सबसे अलग और निराला था. ये एक तरह की नई आवाजें थीं. उनके विचार और सिद्घांत बिल्कुल भिन्न थे. इसके बावजूद, भारत में इतिहास लेखन किस तरह होना चाहिए, उसके स्वरूप को लेकर वे सब एकमत थे. उनका वैश्विक दर्शन एक सा था, जो आवश्यक रूप से हमेशा मार्क्सवादी नहीं था. यह मार्क्सवाद और नेहरूवाद का मेल था. उनकी अपील जबरदस्त थी क्योंकि वे अव्यावहारिक नहीं थे. वे जानते थे कि किस चीज की अहमियत है.
ब्रिटिश राज की उनकी प्रभावशाली टीकाओं में यह बात झ्लकती है. द राइज ऐंड ग्रोथ ऑफ इकोनॉमिक नेशनलिज्म चंद्रा की सबसे अहम कृति मानी जाती है. इसमें उन्होंने व्यवस्थित ढंग और विस्तृत संसाधनों की मदद से जनचेतना के विकास में आर्थिक राष्ट्रवाद को महत्वपूर्ण कारक के रूप में पहचाना है.
वे यह साबित करने में सफल हुए कि गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और दादाभाई नौरोजी सरीखे कांग्रेस के कुछ नेता सभ्य और अमीर समाज से थे, इसके बावजूद भी वे गरीबी, असमानता और घटती जा रही संपदा जैसे मुद्दों से निबटने के लिए भिन्न श्रेणियों के हितों को समझ सके थे. ऐसा नहीं है कि ब्रिटिश नीतियों की आलोचना पहली बार हुई हो. नौरोजी यह काम कर चुके थे. लेकिन चंद्रा ने इसे एक खास दिशा और रुझान दी.
चंद्रा की खास बात थी राष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन करने का उनका तरीका. इसकी खूब आलोचना हुई. लेकिन मुझे लगता है कि गांधी के नेतृत्व में चले उस महान आंदोलन को वक्त के उस मोड़ पर यूं पहचान मिलना ब्रिटिश उपनिवेशवाद के छलावे को खत्म करने के लिए बेहद अहम था. हर देश के इतिहास में कुछ ऐसे मौके होते ही हैं जब किसी व्यक्ति या विचार की भरपूर सराहना की गई हो. संभव है आप इससे सहमत न हों लेकिन यह बात पूरी तरह से तार्किक है.
चंद्रा केवल विचारक ही नहीं, महान शिक्षक भी थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहने के दौरान वे अपने अकादमिक करियर के शीर्ष पर थे. वे अपने छात्रों को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करते थे. वे उनके साथ मित्रवत हो जाते थे और सहज संपर्क बना लेते थे. कहीं भी, किसी भी शिक्षक की यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है. इसीलिए छात्र उनके प्रशंसक थे. यहां तक कि अन्य विषयों और संकाय के छात्र भी उनकी ओर आकर्षित होते थे. इस मायने में वे कुछ-कुछ एएमयू के मोहम्मद हबीब की तरह थे. खैर, अब वह दौर बीत चुका है. सामाजिक विज्ञान के प्रति ऐसा उदार नजरिया रखने वाले शिक्षक अब नहीं हैं.
आज वे होते तो पश्चिमी साम्राज्यवाद और समाज में अन्याय जैसे आज के गंभीर मुद्दों के खिलाफ जरूर आवाज उठाते. बतौर लेखक अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने जो महत्वपूर्ण काम किया वह सांप्रदायिकता को लेकर था. उनके नजरिए में एक तरह की ताजगी थी. यह बहुत हद तक इसलिए क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी थी, शायद इसलिए क्योंकि अपनी युवावस्था और बाद के वर्षों में उन्होंने इसका खासा अनुभव प्राप्त किया था.
भ्रामक जागरूकता की अवधारणा वे ही सामने लाए थे, जिसका मूल रूप से यह अर्थ होता था कि वास्तव में सांप्रदायिकता जैसी कोई चीज है ही नहीं क्योंकि समाज में इसका अस्तित्व ही नहीं है-इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने की थी और उनके जाने के बाद भी भारतीय समाज ने अपने निहित स्वार्थों की वजह से इसे जिंदा रखा.
चंद्रा अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, दोनों तरह की सांप्रदायिकता को एक जैसा ही मानते थे और उनके मुताबिक, दोनों तरह की सांप्रदायिकता खराब होती है. बतौर एक्टिविस्ट वे इन दोनों के खिलाफ लड़े. शायद हममें से कुछ लोग इसे भ्रामक जागरूकता नहीं मानेंगे. हम मानते हैं कि भारतीय समाज में सांप्रदायिकता की जड़ें बहुत गहरी हैं और अल्पसंख्यकों की असुरक्षा की ओर ध्यान देने की भी जरूरत है. इस मत भिन्नता के बावजूद, यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण था.
वे एक पक्के मिशन वाले इतिहासकार थे और उन्होंने हार मानने से साफ इनकार कर दिया था.
(मुशीरुल हसन जाने-माने इतिहासकार हैं. वर्तमान में वे जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड से जुड़े हैं.)
इन सबकी ओर हम बड़ी श्रद्घा और प्रेरणा वाली दृष्टि से देखा करते थे. श्रद्धा की नजर से इसलिए क्योंकि उन्होंने भारत को दुनियाभर में अलग पहचान दिलाई थी. इतिहासकारों का यह समूह देश के सियासी मिजाज की, रैडिकल मिजाज की झलक देता था.
तब तक नेहरू युग खत्म हो चुका था. पंडित नेहरू की मौत हो चुकी थी. फिर भी धर्मनिरपेक्षता, विकास, विज्ञान और तकनीक और शिक्षा का प्रसार जैसे नेहरू युग के विचारों के लिए भारी प्रतिबद्घता मौजूद थी. आशावाद अब भी पर्याप्त था और वह इन इतिहासकारों के विश्व दर्शन में भी झलकता था. लेकिन वे यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर नहीं थे, वे तो इसके आलोचक थे. उन्होंने अपने खुद के सवाल तैयार किए थे और उनके उत्तर भी दिए थे जो स्थापित विश्व दर्शन से इत्तेफाक नहीं रखते थे.
उस दौरान दुनियाभर में चल रहे उम्दा किस्म के कामों के बारे में हमने पढ़ा था. लेकिन इन शख्सियतों का काम सबसे अलग और निराला था. ये एक तरह की नई आवाजें थीं. उनके विचार और सिद्घांत बिल्कुल भिन्न थे. इसके बावजूद, भारत में इतिहास लेखन किस तरह होना चाहिए, उसके स्वरूप को लेकर वे सब एकमत थे. उनका वैश्विक दर्शन एक सा था, जो आवश्यक रूप से हमेशा मार्क्सवादी नहीं था. यह मार्क्सवाद और नेहरूवाद का मेल था. उनकी अपील जबरदस्त थी क्योंकि वे अव्यावहारिक नहीं थे. वे जानते थे कि किस चीज की अहमियत है.
ब्रिटिश राज की उनकी प्रभावशाली टीकाओं में यह बात झ्लकती है. द राइज ऐंड ग्रोथ ऑफ इकोनॉमिक नेशनलिज्म चंद्रा की सबसे अहम कृति मानी जाती है. इसमें उन्होंने व्यवस्थित ढंग और विस्तृत संसाधनों की मदद से जनचेतना के विकास में आर्थिक राष्ट्रवाद को महत्वपूर्ण कारक के रूप में पहचाना है.
वे यह साबित करने में सफल हुए कि गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और दादाभाई नौरोजी सरीखे कांग्रेस के कुछ नेता सभ्य और अमीर समाज से थे, इसके बावजूद भी वे गरीबी, असमानता और घटती जा रही संपदा जैसे मुद्दों से निबटने के लिए भिन्न श्रेणियों के हितों को समझ सके थे. ऐसा नहीं है कि ब्रिटिश नीतियों की आलोचना पहली बार हुई हो. नौरोजी यह काम कर चुके थे. लेकिन चंद्रा ने इसे एक खास दिशा और रुझान दी.
चंद्रा की खास बात थी राष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन करने का उनका तरीका. इसकी खूब आलोचना हुई. लेकिन मुझे लगता है कि गांधी के नेतृत्व में चले उस महान आंदोलन को वक्त के उस मोड़ पर यूं पहचान मिलना ब्रिटिश उपनिवेशवाद के छलावे को खत्म करने के लिए बेहद अहम था. हर देश के इतिहास में कुछ ऐसे मौके होते ही हैं जब किसी व्यक्ति या विचार की भरपूर सराहना की गई हो. संभव है आप इससे सहमत न हों लेकिन यह बात पूरी तरह से तार्किक है.
चंद्रा केवल विचारक ही नहीं, महान शिक्षक भी थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहने के दौरान वे अपने अकादमिक करियर के शीर्ष पर थे. वे अपने छात्रों को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करते थे. वे उनके साथ मित्रवत हो जाते थे और सहज संपर्क बना लेते थे. कहीं भी, किसी भी शिक्षक की यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है. इसीलिए छात्र उनके प्रशंसक थे. यहां तक कि अन्य विषयों और संकाय के छात्र भी उनकी ओर आकर्षित होते थे. इस मायने में वे कुछ-कुछ एएमयू के मोहम्मद हबीब की तरह थे. खैर, अब वह दौर बीत चुका है. सामाजिक विज्ञान के प्रति ऐसा उदार नजरिया रखने वाले शिक्षक अब नहीं हैं.
आज वे होते तो पश्चिमी साम्राज्यवाद और समाज में अन्याय जैसे आज के गंभीर मुद्दों के खिलाफ जरूर आवाज उठाते. बतौर लेखक अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने जो महत्वपूर्ण काम किया वह सांप्रदायिकता को लेकर था. उनके नजरिए में एक तरह की ताजगी थी. यह बहुत हद तक इसलिए क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी थी, शायद इसलिए क्योंकि अपनी युवावस्था और बाद के वर्षों में उन्होंने इसका खासा अनुभव प्राप्त किया था.
भ्रामक जागरूकता की अवधारणा वे ही सामने लाए थे, जिसका मूल रूप से यह अर्थ होता था कि वास्तव में सांप्रदायिकता जैसी कोई चीज है ही नहीं क्योंकि समाज में इसका अस्तित्व ही नहीं है-इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने की थी और उनके जाने के बाद भी भारतीय समाज ने अपने निहित स्वार्थों की वजह से इसे जिंदा रखा.
चंद्रा अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, दोनों तरह की सांप्रदायिकता को एक जैसा ही मानते थे और उनके मुताबिक, दोनों तरह की सांप्रदायिकता खराब होती है. बतौर एक्टिविस्ट वे इन दोनों के खिलाफ लड़े. शायद हममें से कुछ लोग इसे भ्रामक जागरूकता नहीं मानेंगे. हम मानते हैं कि भारतीय समाज में सांप्रदायिकता की जड़ें बहुत गहरी हैं और अल्पसंख्यकों की असुरक्षा की ओर ध्यान देने की भी जरूरत है. इस मत भिन्नता के बावजूद, यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण था.
वे एक पक्के मिशन वाले इतिहासकार थे और उन्होंने हार मानने से साफ इनकार कर दिया था.
(मुशीरुल हसन जाने-माने इतिहासकार हैं. वर्तमान में वे जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड से जुड़े हैं.)

