कपूर खानदान के मालिकाना हक वाले पृथ्वी थिएटर में जब रणबीर कपूर नाटक देखने जाते हैं तो बाकायदा टिकट खरीदते हैं और आम लोगों की तरह लाइन में लगते हैं, जब परिणीति चोपड़ा शहर में अपनी कार में घूमने निकलती हैं तो अगली सीट पर ड्राइवर की बगल में बैठती हैं. जब विद्या बालन को अपेक्षाकृत छोटी वैनिटी वैन दी जाती है तो सेट पर मौजूद लोग जानते हैं कि वे कोई हंगामा नहीं करने वालीं और मन लगाकर शूटिंग पूरी करेंगी. वहीं शूटिंग के दौरान पांच घंटों के इंतजार के बाद भी दीपिका के चेहरे की मोहक मुस्कान फीकी नहीं पड़ती.
यह नई पौध आत्मविश्वास से लबरेज है और दूसरों को इज्जत देना जानती है. वे अपने सीनियर्स से सीखने के लिए तैयार हैं: परिणीति अपनी दोस्त दीपिका और बहन प्रियंका की दिखाई राह पर चलती हैं; आलिया रानी मुखर्जी के नक्शेकदम पर तो श्रद्धा कपूर अपनी चाची पद्मिनी कोल्हापुरी के. वे सब सेट पर समय से पहुंचते हैं, नियम से जिम जाते हैं और शॉट्स अच्छे से पूरा करते हैं. वे अपने करियर, प्यार और एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं. लेकिन काम से फुर्सत मिलते ही वे बड़े बेलौस अंदाज में बिना मेकअप बाहर निकल जाते हैं और किसी भी मुद्दे पर या रोल और साथी कलाकारों के बारे में पूछे गए सवालों का नपा-तुला जवाब देते हैं.

(पति सिद्धार्थ राय कपूर के साथ मुंबई हवाई अड्डे पर विद्या बालन)
अनुशासित रवैया, भरोसा और समय की पाबंदी आज का मंत्र है, क्योंकि भारतीय सिनेमा की दीवानगी भरी दुनिया नया कलेवर अख्तियार कर रही है जहां कारोबार फल-फूल रहा है. यहां तक कि छोटे शहर से आई कंगना रनोट ने भी जिंदगी में मिले कड़वे प्रेम संबंधों की उलझनों से निकल मामूली सितारे का चोला फेंक अभिनय का लोहा मनवा ही लिया. आज किरदार में खुद को ढालने की काबिलियत ही आपके सिर पर कामयाबी का सेहरा बांधती है न कि शानदार व्यक्तित्व. आज अभिनय की दुनिया करिश्माई या भड़कीले व्यक्तित्व की मोहताज नहीं. स्टार्स का जमाना गया.
वे कुछ अलग ही दिन थे जब बॉलीवुड में विलासितापूर्ण जिंदगी जीने वाले दिग्गज मौजूद थे. शराब और सिगरेट के धुएं में नहाए उत्साही और मस्त शम्मी कपूर जो एक बार पढ़ लेने के बाद किताबों से उन पन्नों को फाड़ देते. मधु जैन की किताब द कपूर्सः द फस्र्ट फैमिली ऑफ इंडियन सिनेमा में लिखे तथ्यों के मुताबिक वे “मर्दाना अंदाज” के कायल थे. वे ब्यूक कन्वर्टिबल भगाते और कारों को उतनी ही जल्दी-जल्दी बदलते जितनी अपनी प्रेमिकाओं को. वे शिकार, बंदूक और संगीत के दीवाने थे. वे खुद को एक मेल स्टारलेट कहते. फिल्ममेकर महेश भट्ट कहते हैं, “जब आप बीते दिनों के विलासितापूर्ण जिंदगी जीने वाले अभिनेताओं के बारे में सोचते हैं तो आपको राजेश खन्ना और शम्मी कपूर याद आते हैं.” राजेश खन्ना का घर सिल्क के बेशकीमती पर्दों से सजा था. अपने बेडरूम की दीवारों पर उन्होंने अपनी ही आदमकद तस्वीरें सजा रखी थीं. आज ये बातें अटपटी लगती हैं क्योंकि शो बिजनेस अब सुनियोजित कारोबार है. राजेश खन्ना को अपने खून से चिट्ठी लिखने वाली, उनकी दीवानगी में जिंदगी भर कुंआरी रह जाने वाली, आनंद (1997) में उनके मरने पर फूट-फूटकर रोने वाली और डिंपल से शादी करने पर उसे (डिंपल) जी भर कर कोसने वाली लड़कियां राजेश खन्ना के सुपर स्टारडम की देन थीं. फिल्म देखने की शौकीन देवयानी चैबल ने एक बार कहा था. खन्ना “अपनी ही छवि के शिकार हैं.” लेकिन आज के स्टार्स ठीक इससे उलट हैं.
डायरेक्टर अनुराग कश्यप कहते हैं, “इस पीढ़ी ने भव्य और भड़कीली जिंदगी की कहानियां सुनी हैं और वे खुद को उससे परे रखना चाहते हैं. वे जानते हैं कि फिल्म सिर्फ अच्छे अभिनय से नहीं चलती और उनकी मुटठी में समय का बहुत छोटा-सा टुकड़ा बंद है. वे ज्यादा तेज, ज्यादा प्रोफेशनल और ज्यादा व्यावहारिक हैं. उनके सिर पर स्टारडम का नशा सवार नहीं.” कश्यप कहते हैं कि एक ऐसा समय था जब लोग समझते थे कि राजेश खन्ना अपने सारे गाने खुद ही गाते हैं. उन्होंने अभी रणबीर कपूर के साथ एक व्यस्त शूट पूरा किया है जिनकी विनम्रता, समय की पाबंदी और स्थिति के अनुसार खुद को ढालने की जबरदस्त क्षमता उस गारंटी से भी ज्यादा मायने रखती है कि वे जिस फिल्म में भी काम करेंगे, वह जरूर हिट होगी.
कन्वर्सेशन विद वहीदा रहमान की लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर मानती हैं कि सितारों की आभा को फीका करने के पीछे मीडिया का अतिक्रमण है. वे कहती हैं, “पहले स्टार्स की जिंदगी पर रहस्य का पर्दा रहता था. लेकिन आज मीडिया और सोशल मीडिया, उन पर नजर गड़ाए रहता है और उनके एक-एक पल की खबरें परोसता रहता है.”
आज के स्टार्स का जीवन खुली किताब-सा है, जबकि पुराने जमाने के स्टार्स आपकी कल्पना में बसते थे. दूसरी वजह है उनका ढेर सारे विज्ञापनों और ब्रांड का हिस्सा बनना. “आज स्टार्स टीवी पर हर चीज बेचते नजर आ रहे हैं और उन्हें अपने नाम भी दे रहे हैं. पहले के कलाकार शायद ही कभी किसी विज्ञापन का हिस्सा बनते थे, लिहाजा लोग उन्हें पर्दे के किरदारों से ही पहचानते थे.” कोई हैरानी नहीं कि सलमान ने जैसे ही अपने लिए पब्लिसिस्ट रखा और टीवी पर दिखाई देने लगे, उनके बांद्रा स्थित घर के आसपास जाम लगाने वाली भीड़ छंटने लगी.

(मुंबई में स्ट्रीट फूड का लुत्फ लेते आदित्य कपूर और परिणीति चोपड़ा)
पहले सितारों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती थी, इसलिए उनकी शख्सियत अबूझ पहेली बनी रहती और सुनी-सुनाई बातों और अफवाहों से परवान चढ़ती जिन्हें पत्रिकाएं मसालेदार बनाकर परोसतीं. लोग किरदारों के दीवाने हो जाते थे. इसलिए अमिताभ विजय के नाम से मशहूर हो गए. उन्होंने अपनी अन्य फिल्मों में इसी से मिलते-जुलते नाम इस्तेमाल किए; खन्ना आनंद में बाबू मोशाय के नाम से अमर हो गए, तो गाइड (1965) का राजू देवानंद का पर्याय बन गया. राज कपूर ने आवारा (1951) और श्री 420 (1955) के खानाबदोश किरदार को अपने अंदर बसा लिया. आज अभिनेता बहुआयामी किरदारों में खुद को ढाल रहे हैं, वे सभी तरह की भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार है और सक्षम भी. उनका खुलापन उनके लिए शाप है और वरदान भी.
प्रशंसकों की प्रकृति भी बदल रही है. आज एक प्रशंसक ज्यादा से ज्यादा अपने मनपसंद अभिनेता का ऑटोग्राफ लेने या उनका पोस्टर अपने कमरे में लगाने या टैटू बनवाने की ख्वाहिश रखता है. कामयाबी की ओर बढ़ती आलिया के पिता महेश भट्ट कहते हैं कि उसके प्रशंसकों में चार से छह साल के बच्चे भी हैं जो उनसे मिलने आते हैं. लेकिन वे इस से सहमत हैं कि प्रशंसकों में बदलाव आया है.
वे कहते हैं, “आज वर्चुअल स्पेस प्रशंसकों की प्यास बुझ रही है. अब कुछ रहस्य नहीं रहा. लेकिन कलाकारों की पहुंच का दायरा भी बड़ा हो गया है.” आज उनको भगवान बना देना बेअदबी कहलाएगा. आलिया का करिश्मा कामयाबी की ओर बढऩे के लिए इस बात पर तो निर्भर करेगा ही कि वे इन बातों को किस तरह लेती हैं, साथ ही फिल्मों में उनके अभिनय पर भी.
बालाजी फिल्म्स के सीईओ तनुज गर्ग मानते हैं कि आज स्टार का तमगा मिलना आसान है. “स्टार आज अपनी शख्सियत को निखारने-संवारने में सक्षम हैं, उन्हें मीडिया को संभालना आता है, वे सलाहों पर अमल कर रहे हैं और उनकी छवि खास अंदाज में पेश की जा रही है और 30 साल पहले के मुकाबले उनके लिए ज्यादा आसानी से मार्केट तैयार किया जा रहा है. नए चेहरों का तेजी से उभरना इंडस्ट्री के लिए अच्छा है. हर कोई इस तेजी को महसूस करता है, ज्यादा से ज्यादा लोग प्रोफेशनल हो रहे हैं, इसलिए हमें और अधिक लोगों की जरूरत है. इससे सभी लोगों के पैर जमीन पर टिके रहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि कल न जाने किसके सितारे बुलंद हो जाएं और वह स्टार बन जाए.”
आज का सबसे बिंदास स्टार रणवीर सिंह है. वे चमकीले, बेमेल कपड़े पहनते हैं, अर्जुन कपूर के साथ दोस्ताना दिखाते हैं और ड्यूरेक्स कंडोम का प्रचार करते हैं. लेकिन स्टार्स कमोबेश जो छवि आज बना रहे हैं उसे इस स्टूडियो-प्रोडक्शन युग के मूल्यों की कसौटी पर समझदारी और अनुशासन माना जा रहा है. उनमें से कई फिल्म के अच्छे प्रदर्शन पर मुनाफे का कुछ फीसदी हासिल करते हैं. बॉक्स आफिस इंडिया के एडिटर वजीर सिंह बताते हैं कि ऐश्वर्या राय बच्चन का पूरा विज्ञापन पोर्टफोलियो परिवार को समर्पित एक महिला की शख्सियत पेश करता हैः घडिय़ां, आभूषण, रियल एस्टेट, खाना पकाना और मातृत्व उत्पाद. हालांकि, उन्होंने अपने चारों ओर एक सुरक्षित घेरा बना रखा है और इसलिए उनका जादू अब भी बरकरार है.
क्या स्टार अपनी फिल्म की रिलीज पर प्रचार करने के लिए उतरेंगे? प्रोडक्शन हाउस चिंतित नहीं क्योंकि उन्हें मालूम है कि वे आएंगे ही. लेकिन इससे अगली सुबह की चटख सुर्खियों की फेहरिस्त में यह बात शामिल नहीं हो सकेगी. आज स्टार्स पैसे तो कमा रहे हैं, लेकिन रहस्य भरा वह चुंबकीय आकर्षण कहीं गुम हाता जा रहा है.
यह नई पौध आत्मविश्वास से लबरेज है और दूसरों को इज्जत देना जानती है. वे अपने सीनियर्स से सीखने के लिए तैयार हैं: परिणीति अपनी दोस्त दीपिका और बहन प्रियंका की दिखाई राह पर चलती हैं; आलिया रानी मुखर्जी के नक्शेकदम पर तो श्रद्धा कपूर अपनी चाची पद्मिनी कोल्हापुरी के. वे सब सेट पर समय से पहुंचते हैं, नियम से जिम जाते हैं और शॉट्स अच्छे से पूरा करते हैं. वे अपने करियर, प्यार और एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं. लेकिन काम से फुर्सत मिलते ही वे बड़े बेलौस अंदाज में बिना मेकअप बाहर निकल जाते हैं और किसी भी मुद्दे पर या रोल और साथी कलाकारों के बारे में पूछे गए सवालों का नपा-तुला जवाब देते हैं.

(पति सिद्धार्थ राय कपूर के साथ मुंबई हवाई अड्डे पर विद्या बालन)
अनुशासित रवैया, भरोसा और समय की पाबंदी आज का मंत्र है, क्योंकि भारतीय सिनेमा की दीवानगी भरी दुनिया नया कलेवर अख्तियार कर रही है जहां कारोबार फल-फूल रहा है. यहां तक कि छोटे शहर से आई कंगना रनोट ने भी जिंदगी में मिले कड़वे प्रेम संबंधों की उलझनों से निकल मामूली सितारे का चोला फेंक अभिनय का लोहा मनवा ही लिया. आज किरदार में खुद को ढालने की काबिलियत ही आपके सिर पर कामयाबी का सेहरा बांधती है न कि शानदार व्यक्तित्व. आज अभिनय की दुनिया करिश्माई या भड़कीले व्यक्तित्व की मोहताज नहीं. स्टार्स का जमाना गया.
वे कुछ अलग ही दिन थे जब बॉलीवुड में विलासितापूर्ण जिंदगी जीने वाले दिग्गज मौजूद थे. शराब और सिगरेट के धुएं में नहाए उत्साही और मस्त शम्मी कपूर जो एक बार पढ़ लेने के बाद किताबों से उन पन्नों को फाड़ देते. मधु जैन की किताब द कपूर्सः द फस्र्ट फैमिली ऑफ इंडियन सिनेमा में लिखे तथ्यों के मुताबिक वे “मर्दाना अंदाज” के कायल थे. वे ब्यूक कन्वर्टिबल भगाते और कारों को उतनी ही जल्दी-जल्दी बदलते जितनी अपनी प्रेमिकाओं को. वे शिकार, बंदूक और संगीत के दीवाने थे. वे खुद को एक मेल स्टारलेट कहते. फिल्ममेकर महेश भट्ट कहते हैं, “जब आप बीते दिनों के विलासितापूर्ण जिंदगी जीने वाले अभिनेताओं के बारे में सोचते हैं तो आपको राजेश खन्ना और शम्मी कपूर याद आते हैं.” राजेश खन्ना का घर सिल्क के बेशकीमती पर्दों से सजा था. अपने बेडरूम की दीवारों पर उन्होंने अपनी ही आदमकद तस्वीरें सजा रखी थीं. आज ये बातें अटपटी लगती हैं क्योंकि शो बिजनेस अब सुनियोजित कारोबार है. राजेश खन्ना को अपने खून से चिट्ठी लिखने वाली, उनकी दीवानगी में जिंदगी भर कुंआरी रह जाने वाली, आनंद (1997) में उनके मरने पर फूट-फूटकर रोने वाली और डिंपल से शादी करने पर उसे (डिंपल) जी भर कर कोसने वाली लड़कियां राजेश खन्ना के सुपर स्टारडम की देन थीं. फिल्म देखने की शौकीन देवयानी चैबल ने एक बार कहा था. खन्ना “अपनी ही छवि के शिकार हैं.” लेकिन आज के स्टार्स ठीक इससे उलट हैं.
डायरेक्टर अनुराग कश्यप कहते हैं, “इस पीढ़ी ने भव्य और भड़कीली जिंदगी की कहानियां सुनी हैं और वे खुद को उससे परे रखना चाहते हैं. वे जानते हैं कि फिल्म सिर्फ अच्छे अभिनय से नहीं चलती और उनकी मुटठी में समय का बहुत छोटा-सा टुकड़ा बंद है. वे ज्यादा तेज, ज्यादा प्रोफेशनल और ज्यादा व्यावहारिक हैं. उनके सिर पर स्टारडम का नशा सवार नहीं.” कश्यप कहते हैं कि एक ऐसा समय था जब लोग समझते थे कि राजेश खन्ना अपने सारे गाने खुद ही गाते हैं. उन्होंने अभी रणबीर कपूर के साथ एक व्यस्त शूट पूरा किया है जिनकी विनम्रता, समय की पाबंदी और स्थिति के अनुसार खुद को ढालने की जबरदस्त क्षमता उस गारंटी से भी ज्यादा मायने रखती है कि वे जिस फिल्म में भी काम करेंगे, वह जरूर हिट होगी.
कन्वर्सेशन विद वहीदा रहमान की लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर मानती हैं कि सितारों की आभा को फीका करने के पीछे मीडिया का अतिक्रमण है. वे कहती हैं, “पहले स्टार्स की जिंदगी पर रहस्य का पर्दा रहता था. लेकिन आज मीडिया और सोशल मीडिया, उन पर नजर गड़ाए रहता है और उनके एक-एक पल की खबरें परोसता रहता है.”
आज के स्टार्स का जीवन खुली किताब-सा है, जबकि पुराने जमाने के स्टार्स आपकी कल्पना में बसते थे. दूसरी वजह है उनका ढेर सारे विज्ञापनों और ब्रांड का हिस्सा बनना. “आज स्टार्स टीवी पर हर चीज बेचते नजर आ रहे हैं और उन्हें अपने नाम भी दे रहे हैं. पहले के कलाकार शायद ही कभी किसी विज्ञापन का हिस्सा बनते थे, लिहाजा लोग उन्हें पर्दे के किरदारों से ही पहचानते थे.” कोई हैरानी नहीं कि सलमान ने जैसे ही अपने लिए पब्लिसिस्ट रखा और टीवी पर दिखाई देने लगे, उनके बांद्रा स्थित घर के आसपास जाम लगाने वाली भीड़ छंटने लगी.

(मुंबई में स्ट्रीट फूड का लुत्फ लेते आदित्य कपूर और परिणीति चोपड़ा)
पहले सितारों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती थी, इसलिए उनकी शख्सियत अबूझ पहेली बनी रहती और सुनी-सुनाई बातों और अफवाहों से परवान चढ़ती जिन्हें पत्रिकाएं मसालेदार बनाकर परोसतीं. लोग किरदारों के दीवाने हो जाते थे. इसलिए अमिताभ विजय के नाम से मशहूर हो गए. उन्होंने अपनी अन्य फिल्मों में इसी से मिलते-जुलते नाम इस्तेमाल किए; खन्ना आनंद में बाबू मोशाय के नाम से अमर हो गए, तो गाइड (1965) का राजू देवानंद का पर्याय बन गया. राज कपूर ने आवारा (1951) और श्री 420 (1955) के खानाबदोश किरदार को अपने अंदर बसा लिया. आज अभिनेता बहुआयामी किरदारों में खुद को ढाल रहे हैं, वे सभी तरह की भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार है और सक्षम भी. उनका खुलापन उनके लिए शाप है और वरदान भी.
प्रशंसकों की प्रकृति भी बदल रही है. आज एक प्रशंसक ज्यादा से ज्यादा अपने मनपसंद अभिनेता का ऑटोग्राफ लेने या उनका पोस्टर अपने कमरे में लगाने या टैटू बनवाने की ख्वाहिश रखता है. कामयाबी की ओर बढ़ती आलिया के पिता महेश भट्ट कहते हैं कि उसके प्रशंसकों में चार से छह साल के बच्चे भी हैं जो उनसे मिलने आते हैं. लेकिन वे इस से सहमत हैं कि प्रशंसकों में बदलाव आया है.
वे कहते हैं, “आज वर्चुअल स्पेस प्रशंसकों की प्यास बुझ रही है. अब कुछ रहस्य नहीं रहा. लेकिन कलाकारों की पहुंच का दायरा भी बड़ा हो गया है.” आज उनको भगवान बना देना बेअदबी कहलाएगा. आलिया का करिश्मा कामयाबी की ओर बढऩे के लिए इस बात पर तो निर्भर करेगा ही कि वे इन बातों को किस तरह लेती हैं, साथ ही फिल्मों में उनके अभिनय पर भी.
बालाजी फिल्म्स के सीईओ तनुज गर्ग मानते हैं कि आज स्टार का तमगा मिलना आसान है. “स्टार आज अपनी शख्सियत को निखारने-संवारने में सक्षम हैं, उन्हें मीडिया को संभालना आता है, वे सलाहों पर अमल कर रहे हैं और उनकी छवि खास अंदाज में पेश की जा रही है और 30 साल पहले के मुकाबले उनके लिए ज्यादा आसानी से मार्केट तैयार किया जा रहा है. नए चेहरों का तेजी से उभरना इंडस्ट्री के लिए अच्छा है. हर कोई इस तेजी को महसूस करता है, ज्यादा से ज्यादा लोग प्रोफेशनल हो रहे हैं, इसलिए हमें और अधिक लोगों की जरूरत है. इससे सभी लोगों के पैर जमीन पर टिके रहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि कल न जाने किसके सितारे बुलंद हो जाएं और वह स्टार बन जाए.”
आज का सबसे बिंदास स्टार रणवीर सिंह है. वे चमकीले, बेमेल कपड़े पहनते हैं, अर्जुन कपूर के साथ दोस्ताना दिखाते हैं और ड्यूरेक्स कंडोम का प्रचार करते हैं. लेकिन स्टार्स कमोबेश जो छवि आज बना रहे हैं उसे इस स्टूडियो-प्रोडक्शन युग के मूल्यों की कसौटी पर समझदारी और अनुशासन माना जा रहा है. उनमें से कई फिल्म के अच्छे प्रदर्शन पर मुनाफे का कुछ फीसदी हासिल करते हैं. बॉक्स आफिस इंडिया के एडिटर वजीर सिंह बताते हैं कि ऐश्वर्या राय बच्चन का पूरा विज्ञापन पोर्टफोलियो परिवार को समर्पित एक महिला की शख्सियत पेश करता हैः घडिय़ां, आभूषण, रियल एस्टेट, खाना पकाना और मातृत्व उत्पाद. हालांकि, उन्होंने अपने चारों ओर एक सुरक्षित घेरा बना रखा है और इसलिए उनका जादू अब भी बरकरार है.
क्या स्टार अपनी फिल्म की रिलीज पर प्रचार करने के लिए उतरेंगे? प्रोडक्शन हाउस चिंतित नहीं क्योंकि उन्हें मालूम है कि वे आएंगे ही. लेकिन इससे अगली सुबह की चटख सुर्खियों की फेहरिस्त में यह बात शामिल नहीं हो सकेगी. आज स्टार्स पैसे तो कमा रहे हैं, लेकिन रहस्य भरा वह चुंबकीय आकर्षण कहीं गुम हाता जा रहा है.

