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जर्मनी की इस जीत पर हर कोई लट्टू

ब्राजील में फुटबॉल विश्व कप विजेता वैश्विक जर्मन टीम अपने भयावह अतीत से नाता तोड़ चुके देश का यशस्वी प्रतीक बनकर उभरी.

अपडेटेड 28 जुलाई , 2014
राइनर फासबिंडर की 1979 में आई क्लासिक फिल्म द मैरिज ऑफ मारिया ब्रॉन नैतिक दुविधाओं और भावनात्मक छलावे की विचित्र कहानी है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के नए सिरे से मजबूत देश के रूप में उभरने के दौरान छाई रही है. कहानी युद्ध से लेकर 1954 के बीच घूमती है. फिल्म की नायिका मारिया सोचती है कि उसका पति युद्ध में मारा गया तो वह विजेता अमेरिका के एक जीआइ (सैनिक) की महबूबा बन जाती है लेकिन पति के मोर्चे से जिंदा लौटने पर वह अमेरिकी की हत्या कर देती है.

फिर जर्मनी की अर्थव्यवस्था कुछ सुधरने पर वह उद्योगपति की रखैल बन जाती है, 1950 के आसपास उसकी संपत्ति की वारिस बन जाती है और अपने पहले पति के साथ जुड़कर ऐशोआराम की जिंदगी बसर करने की तैयारी कर रही होती है कि तभी अचानक घर में गैस से हुए विस्फोट में मारी जाती है. विस्फोट के साथ ही फिल्म खत्म हो जाती है और अंत में जब क्रेडिट रोलिंग शुरू होती है तो पीछे से 1954 के फुटबॉल विश्व कप की कमेंटरी सुनाई पड़ती है.

तब पश्चिम जर्मनी ने अपना पहला खिताब जीता था. उत्साहित कमंटेटर चीखता है, ''डोएचलैंड ईस्ट वेटमाइस्टर” (जर्मनी विश्व विजेता) और परदे पर विस्फोट के बाद मारिया ब्रायन का जलता घर दिखता है. तमाम पोशीदा बातों से जुड़ी उसकी छोटी-सी जिंदगी का काम तमाम होता है और एक नए देश का पुनर्जन्म होता है, जो अतीत के तमाम पापों और कुकृत्र्यों से उबरकर वर्ट्सशाफ्टवुंडर यानी 'जर्मन आर्थिक चमत्कार’ के पंखों के सहारे फिर खड़ा हो रहा है. जर्मनी में विश्व कप हमेशा से ही महज फुटबॉल का मामला नहीं रहा है.

विश्व कप में जर्मनी पहली बार 1938 में झंडा ऊंचा करने को उतरा था. अडोल्फ हिटलर के अंशुलस ऑफ ऑस्ट्रिया (ऑस्ट्रिया विलय) के बाद ऑस्ट्रिया के विलक्षण खिलाडिय़ों को 'ग्रेटर जर्मनी’ टीम में शामिल कर लिया (हालांकि सबसे उम्दा खिलाड़ी माथियास सिनडेलार ने हिटलर-मैनशॉफ्ट (फुटबॉल टीम) में शामिल होने से इनकार कर दिया और 1939 में खुदकुशी कर ली). दूसरे नाजी खेलों की तरह ही जर्मन फुटबॉल टीम की भी कट्टर विचारधारा थी कि उसे कमतर नस्लों पर आर्यों की सर्वोच्चता सिद्ध करनी है.

हालांकि जर्मन टीम 1934 विश्व कप में चौथा स्थान हासिल करने में ही कामयाब हो पाई थी और 1936 के ओलंपिक में नार्वे जैसी कमजोर टीम ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इसलिए 1938 का महत्व कुछ खास था. लेकिन उद्घाटन मैच में उसका स्विट्जरलैंड से मुकाबला 1-1 से ड्रॉ रहा और फिर रिप्ले में वह 4-2 से हार गई. लेकिन वह टूर्नामेंट फासीवाद को कुछ दिलासा दे गया था. बेनितो मुसोलिनी के इटली ने फाइनल में हंगरी को 4-2 से हराकर दूसरी बार विश्व कप खिताब जीता था (मुसोलिनी के लिए फुटबॉल हिटलर से ज्यादा अहम था क्योंकि हिटलर बॉक्सिंग और दूसरे व्यक्ति विशिष्ट खेलों को ज्यादा अहमियत देता था).

पश्चिम जर्मनी पर 1950 में विश्व कप में हिस्सा लेने पर प्रतिबंध था, और 1954 में युद्ध के बाद पहली दफा किसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में उसकी राष्ट्रीय धुन बजी थी (हालांकि उसमें 'डोएचलैंड उबर अलस’ यानी जर्मनी सबसे अव्वल वाला पैरा हटा दिया गया था). फाइनल में जर्मन टीम के हार जाने की ही उम्मीद थी क्योंकि सभी मैच जीतती आ रही हंगरी की टीम की अगुआई उस दौर के सबसे महान खिलाड़ी फेरेंक पुस्कस कर रहे थे, हंगरी क्वालिफाइंग दौर में जर्मनी को धूल चटा चुका था.

लेकिन हंगरी के 2-0 से आगे रहने के बाद जर्मनी ने 2-2 से बराबर कर दिया. जर्मन टीम में पुस्कस जैसा कोई सितारा नहीं था लेकिन मौसम ने उसकी मदद की. भारी बारिश हो रही थी और तब एक अनजान-सी कंपनी एडिडास के बनाए नए कील वाले जूतों की वजह से जर्मन टीम को बढ़त हासिल हुई. जर्मनी ने हॉफ टाइम के बाद एक गोल और दाग दिया. आखिर पलों में पुस्कस ने बराबरी का गोल किया मगर उसे ऑफ साइड करार दिया गया. जर्मनी में उस मैच को 'बर्न का चमत्कार’ कहते हैं और वही जर्मनी के 'आर्थिक चमत्कार’ का खेल प्रतीक बन गया.

पश्चिम जर्मनी को अगली विश्व कप विजय 1974 में हासिल हुई. तब उसने फिर अपने एकजुट टीम प्रदर्शन से उस दौर के महान खिलाड़ी हॉलैंड के जोहान क्रफ को पछाडऩे में कामयाबी पा ली थी. लेकिन 1974 के विश्व कप का सबसे महत्वपूर्ण सियासी खेल पहले दौर में ही हुआ था, जब पश्चिम जर्मनी ने पूर्वी जर्मनी के साथ साम्यवाद और पूंजीवाद के मुकाबले के तौर पर खेला. उस स्पर्धा पर शीत युद्ध का भारी साया था. सोवियत रूस ने चिली के साथ मैच खेलने से इनकार किया तो स्पर्धा से बाहर कर दिया गया था.

चिली में सोवियत समर्थक सल्वाडोर अलेंदे की सरकार का अमेरिका के सहयोगी जनरल अगस्तो पिनोशे ने तख्ता पलट कर दिया था. स्पर्धा के दौरान भारी सुरक्षा इंतजाम थे क्योंकि जर्मनी को वामपंथी अतिवादी गुट रेड आर्मी फ्रैक्शन से खतरा था. पश्चिमी जर्मनी की टीम बेशक बढ़त पर थी. वह यूरोपीय चैंपियन थी. उसमें फ्रैंज बेकनबाउर की कप्तानी में यूरोपीय चैंपियनशिप जीतने वाली टीम बेयर्न म्युनिख के कई खिलाड़ी थे. लेकिन पूर्वी जर्मनी ने अपने पश्चिमी 'भाइयों’ को 1-0 से हराकर हताश कर दिया. अंकों के आधार पर दोनों टीमें अगले दौर में पहुंच गईं लेकिन पूर्व जर्मनी के लिए वह गर्व का पल था.

शीत युद्ध की अवधि में पश्चिम जर्मनी की टीम भी वह एक तरीका थी जिसके जरिए जर्मन लोग द्वितीय विश्व युद्ध की शर्मिंदगी के एहसास के बिना अपनी देशभक्ति का इजहार कर सकते थे. इसने जर्मनी को अपनी सियासत के बदले दोयम दर्जे की भूमिका से दुनिया के भू-राजनैतिक नक्शे से लगभग गायब कर दिया था. सो, शीत युद्ध की समाप्ति के दौर में तैयार हुई पश्चिमी जर्मनी की टीम में वह सब कुछ था जो जर्मनी कूटनीति से हासिल नहीं कर सकता था:

विशुद्ध जर्मन, ताकतवर और भरोसे से भरपूर. शीत युद्ध में पश्चिम की विजय के समय 1990 में वह बुलंदी पर थी. तब उसने 'मैन-मशीन’ लोथर मैथ्यूस की अगुआई में अर्जेंटीना को हरा दिया था. हारने वाली टीम में फिर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ी डियागो मैराडोना थे, जो क्रफ और पुस्कस की तरह ही एकजुट जर्मन टीम के आगे जीत हासिल करने में पूरी तरह से नाकाम रहे, जिसका खेल उतना शानदार नहीं था.

1990 में पश्चिमी जर्मनी की युद्ध के बाद सबसे मार्के की कामयाबी थी. दोनों जर्मनी के एक होने के बाद, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय टीम के महाशक्ति बनने की संभावना बढ़ गई थी. यह सोचकर ही अगल-बगल के देश असहज हो उठे थे. क्या फिर बिगड़ैल, बर्बर जर्मनी का उदय होगा? इसके बदले जर्मनी की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मंदी की शिकार होने लगी, और पूरब के कल्याणकारी राज्य के बोझ से पस्त होती चली गई. टीम भी डांवाडोल हो गई. वह 2002 के विश्व कप फाइनल में अपने भाग्य के भरोसे पहुंच तो गई लेकिन ब्राजील के आगे आसानी से हथियार डाल दिए. मानो एकीकृत जर्मनी कामयाब होने से डरा हुआ था.

साल 2004 के बाद धीरे-धीरे एक नई जर्मन टीम उभरनी शुरू हुई. फर्क सिर्फ यह था कि यह अलग किस्म की जर्मन टीम थी, यह आर्य नस्ल ही नहीं, बल्कि आप्रवासियों जैसे मेस्युट ओजिल, सामी खदिरा, जिरोम बोटेंग, मारियो गोमेज, मिरोस्लाव क्लोज वगैरह की टीम थी. ऐसी वैश्विक टीम ने 2014 का विश्व कप जीतकर 1938 के बैताल को कब्र के हवाले कर दिया है (हालांकि कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं: जैसे इस बार भी एकीकृत जर्मनी ने दुनिया के सबसे उम्दा खिलाड़ी लियोनेल मेस्सी को हराया).

यह वैश्विक जर्मनी अब ऐसा देश है जो नाजी अतीत के बोझ से मुक्त होने का दावा कर सकता है, या जब उसकी स्वभूमि में जर्मन भाव कुछ कम हुआ तो उसकी देशभक्ति स्वीकार्य हो गई. इसी के साथ जर्मनी यूरोप में महाशक्ति के रूप में उभर आया है. फर्क बस इतना है कि अब कोई देश उसकी वृद्धि से घबराता नहीं है. 2011 में यूरोजोन संकट के दौरान जर्मनी से अधिक सक्रियता की उम्मीद में रैडेक सिकोस्र्कि ने कहा था, ''पोलैंड के इतिहास में ऐसा कहने वाला शायद मैं पहला विदेश मंत्री कहलाऊंगा लेकिन मुझे कहने दीजिए कि मैं ताकतवर जर्मनी से ज्यादा निष्क्रिय जर्मनी से डरता हूं.”

उन्होंने बेशक यह उम्मीद भी की कि बर्लिन रूस के व्लादीमिर पुतिन के आगे उठ खड़ा होगा. यानी जर्मनी अपनी भू-राजनैतिक हैसियत वापस हासिल कर रहा है, लेकिन इसका मतलब अपनी कुछ बढ़त को कूटनीतिक निष्पक्षता के लिए गंवाना भी होगा. मसलन, वह हर किसी से व्यापार करना चाहता है और अपनी भू-राजनैतिक जिम्मदारियों की कतई फिक्र नहीं करता (जर्मन कारोबारी लॉबी पुतिन के रूस में भी बड़े पैमाने पर सक्रिय है, और वह क्रेमलिन के खिलाफ पाबंदियां लगाने से बर्लिन को रोकने में सबसे आगे है). आइए, उम्मीद करें कि जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल भी वैसे ही अपनी जिम्मदारियां कुशलता से अंजाम दे, जैसी फुटबॉल टीम के कोच योआखिम लोएव ने दीं.
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