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फीफा 2014: तो, आप किस देश का साथ देंगे?

विविध संस्कृतियों वाली फुटबॉल की रंग-बिरंगी दुनिया में हम किसी एक देश के प्रशंसक नहीं.

अपडेटेड 14 जुलाई , 2014
आजग्लोबलाइजेशन के इस दौर में अकसर यह सुनने को मिलता है कि राष्ट्रीय अस्मिताएं मिटती-सी जा रही हैं. बड़े पैमाने पर सहज और निरंतर आवागमन से राष्ट्रीय परिभाषाएं पुरानी पड़ती जा रही हैं. मेरे बारे में तो यह बिलाशर्त सही है. मेरा जन्म सोवियत संघ में हुआ, पालन-पोषण ज्यादातर इंग्लैंड ही नहीं, जर्मनी और स्कॉटलैंड में भी हुआ. एक दशक से मैं प्राग और मॉस्को में काम कर रहा हूं. मेरा ज्यादातर परिवार अमेरिका में रहता है, मेरी शादी एक रूसी से हुई है और मेरे बच्चों के पास दांतों से ज्यादा पासपोर्ट हैं. इसलिए राष्ट्रीय अस्मिताओं के महा उत्सव विश्व कप की बारी आती है तो मैं कुछ उलझन में पड़ जाता हूं. फुटबॉल का जुनून मेरे सिर पर सवार रहता है. लेकिन मैं किसके पक्ष में आवज बुलंद करूं, किसमें जोश भरूं?

मैंने जीवन का 65 प्रतिशत हिस्सा इंग्लैंड में बिताया है (ठीक-ठीक कहें तो लंदन में, जो सही अर्थों में इंग्लैंड नहीं है). मेरा दिल कहता है 'इंग्लैंड का समर्थन करो' और मैं उसकी टीम को काफी करीब से जानता भी हूं. मैं इतना अंग्रेज भी हूं कि इंग्लैंड की नाकामी पर नथुने फूलने लगते हैं. लेकिन मैं इतना अंग्रेज भी हूं, जो यह जान जाए कि पहली पीढ़ी का प्रवासी ऐसा सच्चा अंग्रेज नहीं हो सकता कि देश के सरोकार उसके सिर चढ़कर बोलें. आप शायद ऐसा अमेरिका में महसूस कर सकते हैं. यहां तो यह कुछ अजीब लगता है. सच्चा अंग्रेज बनने के लिए तीन पीढिय़ां लगती हैं. पहली पीढ़ी तो ''रूसी/पोलैंडवासी''  वगैरह हो सकती है, दूसरी पीढ़ी ''रूस/पोलैंड वगैरह मूल के'', और तीसरी पीढ़ी सिर्फ अंग्रेज हो सकती है. टॉरी दिग्गज नॉरमन टेबिट का वह मशहूर 'क्रिकेट सवाल' चकरा देने वाला है जिसके जरिए किसी आप्रवासी की वफादारियों की परीक्षा ली जाती कि उसका दिल क्रिकेट में इंग्लैंड के लिए धड़कता है या नहीं. कोई एकदम नया आने वाला ही इंग्लैंड के प्रति अपना रुझन दिखाएगा जो अंग्रेजियत से रू-ब-रू न हो.

जर्मनी में बात अलग है, जहां मेरी किशोरवय उम्र गुजरी है. द्वितीय विश्व युद्ध के कई दशकों बाद तक फुटबॉल ही ऐसी चीज थी जिसमें जर्मनी के लोग गर्व से अपनी देशभक्ति का इजहार कर पाते थे. मैंने अपने दोस्तों को, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने दादा-नाना की करतूतों से शर्मसार भले न हों पर झेंपते जरूर थे, 1990 के विश्व कप में खुलकर अपनी विजयी टीम का जश्न मना रहे थे, तब उनकी आर्य भावनाओं की कप्तानी मशीन जैसी सफाई से खेलने वाले लोथार मैथ्यूज करते थे.

पश्चिम जर्मनी की फुटबॉल टीम का उदय शीत युद्ध की समाप्ति के साथ देश की आर्थिक कामयाबियों के साथ ही हुआ. जर्मनी के एकीकरण के बाद के दशकों में टीम कुछ घबराहट में दिखती थी, मानो एकीकृत जर्मनी की टीम भारी कामयाबी से दुनिया को डराकर कुछ झेंप-सी रही हो. अब नई टीम का उदय हुआ, जिसमें गैर-जर्मन नामों की भरमार है—मसलन, ओजिल, खेदिरा, पोदोल्स्की, गोमेज, क्लोज वगैरह. यह टीम आकर्षक, किसी धारा की तरह बहती फुटबॉल खेलती है. वे हारते भी हैं तो अपने कुशल पैरों की वजह से कभी नहीं. इस नई टीम ने जर्मनी के लोगों में एक नई, भूमंडलीकृत जर्मन राष्ट्रीयता को स्वीकार्य बनाया है और जर्मनी के नए प्रवासी भी इस राष्ट्रीयता के अंग की तरह एहसास कर पा रहे हैं.

इस राष्ट्रीय टीम की नई बहुसांस्कृतिक प्रकृति की विडंबना यह है कि आम तौर पर जर्मनी बहुसंस्कृतिवाद को खारिज करता रहा है, यहां तक कि एंजेला मर्केल भी प्रवासियों को जर्मन रंग-ढंग में ढलने पर जोर दे रही हैं. 1999 तक नागरिकता खून के रिश्ते तक ही सीमित थी.सार्वजनिक नीतियों के मामले में बहुसांस्कृतिक इंग्लैंड में ज्यादा स्वीकार्यता है. लेकिन जब बात फुटबॉल की आती है तो जर्मनी ज्यादा खुला देश हो जाता है. मैं सोचता हूं कि जर्मनी के लोग उनकी टीम के लिए मेरी दीवानगी का स्वागत करेंगे. हालांकि ऐसा करने की मैंने अभी कल्पना नहीं की है.

जर्मनी में मैं एक 'यूरोपीय स्कूल' में गया. यह नई तरह की राष्ट्रीयता के पोषण के लिए यूरोपीय संघ की स्थापना करने वालों के जरिए खड़ी की गई विशेष संस्थाओं में एक है. यूरोपीय संघ के सूत्रधार ज्यां मोनेट के मुताबिक, यूरोपीय स्कूलों के छात्र ''मन से यूरोपीय होंगे और एकीकृत प्रगतिशील यूरोप को साकार करने को तैयार होंगे. '' इनमें अनेक छात्र यूरोपीय संघ के नेताओं, अफसरशाहों और दूसरे पत्रकारों के बेटे-बेटी थे, जैसे मैं. स्कूल विभिन्न भाषाओं के वर्गों में बंटा था, अंगे्रजी, जर्मन, फ्रांसीसी, डच वगैरह. हम मूल पाठ्यक्रम एक भाषा में पढ़ा करते थे और इतिहास तथा भूगोल किसी विदेशी भाषा में. इस प्रयोग के कई अच्छे पहलू थे. स्कूल में हर कोई कम-से-कम तीन भाषाएं जानता था.

लेकिन अस्मिता की राजनीति के आगे यह प्रयोग नाकाम हो गया. छात्र 'मन से यूरोपीय' होने के बदले अपने देशों के प्रति अतिरेक में डूब गए. उनका देशप्रेम ऐसे बेतुके स्तर पर पहुंच गया जिसके दर्शन खासकर विश्व कप में होते हैं. मुझे गुस्तावो की याद है, वह मोटा-थुलथुला लड़का अपने इतालवी मूल को साबित करने को इस कदर उतावला रहता कि वह दूसरी भाषा में बोलने से इनकार कर देता था. गुस्तावो कभी इटली में नहीं रहा. वह ब्रसेल्स और फ्रैंकफर्ट में बड़ा हुआ था. यूरोप ने उसे जिंदगी का वह एहसास नहीं दिया.

लेकिन कुनबे-राष्ट्रीय मूल का वह एहसास मेरे लिए मुश्किल है. मेरा जन्म ऐसे देश में हुआ, जो अब नक्शे से गायब है. औपचारिक फॉर्मों में जन्मभूमि के खानों को भरना मेरे लिए हमेशा दुविधा वाला रहा है: मैं सोवियत संघ लिखता आया हूं लेकिन अब इंटरनेट पर देशों के नाम की सूची में वह नहीं है. इसलिए मैं अब यूक्रेन लिखता है: मेरा जन्म कीव में हुआ था. लेकिन उम्र के किसी भी दौर में मुझमें यूक्रेनवासी होने का एहसास नहीं जगा. मुझे इंग्लिश स्कूल में 'रूसी' कहकर चिढ़ाया जाता था. मुझे सार्वजनिक जगहों पर एंग्लो-रूसी कहा जाता रहा है. जब मैंने अपने मूल को पहचानने की कोशिश की, मैं मॉस्को में रहा. मैं वहीं था जब रूसी फुटबॉल टीम उठकर खड़ी हुई. यूरो 2008 में आर्शविन की प्रेरणा से टीम अदभुत पास के जरिए सेमीफाइनल तक पहुंच गई. यूरो 2008 में रूस के बारे में कई अच्छी बातें हुईं. तभी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवदेव ने पश्चिमोन्मुख उदार सुधारों की ओर कदम बढ़ाया.

पहली बार रूसी टीम को गस हिंडिक के रूप में विदेशी कोच मिला. उनकी नियुक्ति का राष्ट्रवादियों ने भारी विरोध किया लेकिन कामयाबी ने दिखा दिया कि रूस यूरोपीय राह पर चलकर कामयाब हो सकता है. मुझे अपने रूसी दोस्तों को हॉलैंड को हराते देख खुशी मनाते, मॉस्को के स्तालिन एवेन्यू पर झंडे लेकर रूसियों को जश्न मनाते, रात में चमचमाती मर्सिडीज पर दौड़ते देख बड़ा सुकून मिला. तब से व्लादिमिर पुतिन ने अपने दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी राजनैतिक एजेंडे के जरिए उस कामयाबी को चुरा लिया. अब एक बार फिर रूसी टीम के कोच फेबियो कापैलो हैं लेकिन वे क्रेमलिन का पैसा पाने वाले सांकेतिक यूरोपीय ही हैं. उनमें नैतिक दमखम नहीं.

इस साल रूस ने क्रीमिया का अधिग्रहण किया और यूक्रेम में छद्म युद्ध शुरू किया तो मुझे पहली बार यूक्रेनवासी होने की भावनाओं का एहसास हुआ. मैं आधी रात को इस एहसास के साथ जाग उठा कि मेरे दादा ओडेसा के थे, मेरी मां और उनका परिवार कीव का था, मेरे पिता जर्नोवित्ज के थे—और ये सभी जगहें अब टैंक से थर्रा रही हैं. अचानक, यह एहसास साफ-साफ घर कर गया कि भूमंडलीकरण के तमाम सपनों के बावजूद राष्ट्रवाद बेहद जरूरी चीज है: यही एकमात्र वह सीमा है जहां हर व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित है.

तो, मैं इस विश्व कप में यूक्रेन को समर्थन करता. समस्या यह है कि वह टीम क्वालिफाई नहीं कर पाई. या शायद यह समस्या से अधिक राहत की बात है. अब इंग्लैंड और रूस भी बाहर हो चुके हैं इसलिए मैं चैन से फुटबॉल का आनंद ले सकता हूं.
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