बॉलीवुड मेरी नजर में एक परिवार जैसा है. एक ऐसा परिवार जिसमें नौजवान बच्चे होते हैं, माता-पिता होते हैं और घर के बुजुर्ग भी होते हैं. हर किसी का अपना-अपना महत्व होता है. जिस तरह घर में नौजवान बच्चों के आने से नई ऊर्जा या रौनक आ जाती है, वैसा ही आलम इन दिनों बॉलीवुड में भी है. जिस तरह हर पीढ़ी अपनी रंगत लेकर आती है. वैसा ही इस पीढ़ी के साथ भी है. यह नई पीढ़ी 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक की देन है. इस पीढ़ी का अंदाजा मुझे अपने घर में ही लग जाता है. अब आलिया को ही लीजिए. वह 21 साल की है और उसने अपनी तीन फिल्मों के साथ वह सब कुछ कर दिया है, जो मैं पिछले 40 साल में नहीं कर सका.
नई पीढ़ी के आने से पुरानी का महत्व खत्म नहीं होता है. हर दौर में ऐसा समय आता है. हर दौर के सुपरस्टार्स को आहिस्ता-आहिस्ता अपना ताज नई पीढ़ी को सौंपना पड़ता है. यह वक्त का तकाजा है और उसकी जरूरत भी. इसके साथ ही ऑडियंस की मांग भी, क्योंकि बदलते ऑडियंस के साथ स्टार्स को लेकर पसंद भी बदलती है. लेकिन कोई भी सितारा आप्रांसगिक नहीं हो जाता. मसलन, अमिताभ बच्चन आज भी काम कर रहे हैं. शाहरुख, सलमान, आमिर, अजय देवगन, अक्षय कुमार, इमरान हाशमी, सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरुण धवन भी फिल्में दे रहे हैं और ये सब एक साथ चल रहे हैं. नई पीढ़ी आने से पुरानी खत्म नहीं होती है. वक्त आवाज उठाता है और कुछ बदलाव हो जाते हैं.
जब नई और पुरानी पीढ़ी की तुलना होती है तो मेरे दिमाग में अकसर यही बात आती है कि मौजूदा पीढ़ी बहुत ही प्रोफेशनल और काम को लेकर सीरियस है. मैंने इस पीढ़ी का विराट स्वरूप देखा है. वे कम उम्र में काफी ज्यादा जानते हैं, अपनी पुरानी पीढ़ी की तुलना में वे कहीं आगे हैं. उनमें अपने काम की समझ है, ऐक्टिंग भी जानते हैं और उसके साथ ही बिजनेस मॉडल की भी वे गहरी समझ रखते हैं.
इस मामले में हमारी पीढ़ी के लोग कुछ अधूरे थे. यह सब मैच्योरिटी का नतीजा है क्योंकि जब समाज मैच्योर होता है, तो उसका असर उस पीढ़ी पर भी दिखता है. बस, नए बच्चों पर भी इसी मैच्योरिटी का असर है. यही वह वजह है, जो इनके साथ काम करने को आसान बनाती है. समझ के मामले में सुपीरियर होने की वजह से कई काम आसानी से निबट जाते हैं, जबकि अपने समय में मैंने कई तरह की समस्याओं को झेला है.
खान तिकड़ी, अजय देवगन और अन्य सितारे लगभग ढाई दशक से एंटरटेन कर रहे हैं, लेकिन यह दौर बहुत मुश्किल है. लोग आज की हेडलाइंस को कल तक याद नहीं रखते हैं. दुनिया क्षण-क्षण बदल रही है. ऐसे में उन्हें टिकना है, अपनी पुरानी पीढ़ी की तरह लंबी पारी खेलनी है तो उन्हें तरह-तरह के रोल करने होंगे और किसी तरह के टाइपकास्ट में फंसने से बचना होगा क्योंकि 10-20 साल तक खुद अच्छा काम करना आसान नहीं है. देखना यह है कि इस नई पीढ़ी में इतनी ऊर्जा और माद्दा है कि यह इस तरह की कामयाबी दोहरा पाएगी.
(लेखक फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं)
नई पीढ़ी के आने से पुरानी का महत्व खत्म नहीं होता है. हर दौर में ऐसा समय आता है. हर दौर के सुपरस्टार्स को आहिस्ता-आहिस्ता अपना ताज नई पीढ़ी को सौंपना पड़ता है. यह वक्त का तकाजा है और उसकी जरूरत भी. इसके साथ ही ऑडियंस की मांग भी, क्योंकि बदलते ऑडियंस के साथ स्टार्स को लेकर पसंद भी बदलती है. लेकिन कोई भी सितारा आप्रांसगिक नहीं हो जाता. मसलन, अमिताभ बच्चन आज भी काम कर रहे हैं. शाहरुख, सलमान, आमिर, अजय देवगन, अक्षय कुमार, इमरान हाशमी, सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरुण धवन भी फिल्में दे रहे हैं और ये सब एक साथ चल रहे हैं. नई पीढ़ी आने से पुरानी खत्म नहीं होती है. वक्त आवाज उठाता है और कुछ बदलाव हो जाते हैं.
जब नई और पुरानी पीढ़ी की तुलना होती है तो मेरे दिमाग में अकसर यही बात आती है कि मौजूदा पीढ़ी बहुत ही प्रोफेशनल और काम को लेकर सीरियस है. मैंने इस पीढ़ी का विराट स्वरूप देखा है. वे कम उम्र में काफी ज्यादा जानते हैं, अपनी पुरानी पीढ़ी की तुलना में वे कहीं आगे हैं. उनमें अपने काम की समझ है, ऐक्टिंग भी जानते हैं और उसके साथ ही बिजनेस मॉडल की भी वे गहरी समझ रखते हैं.
इस मामले में हमारी पीढ़ी के लोग कुछ अधूरे थे. यह सब मैच्योरिटी का नतीजा है क्योंकि जब समाज मैच्योर होता है, तो उसका असर उस पीढ़ी पर भी दिखता है. बस, नए बच्चों पर भी इसी मैच्योरिटी का असर है. यही वह वजह है, जो इनके साथ काम करने को आसान बनाती है. समझ के मामले में सुपीरियर होने की वजह से कई काम आसानी से निबट जाते हैं, जबकि अपने समय में मैंने कई तरह की समस्याओं को झेला है.
खान तिकड़ी, अजय देवगन और अन्य सितारे लगभग ढाई दशक से एंटरटेन कर रहे हैं, लेकिन यह दौर बहुत मुश्किल है. लोग आज की हेडलाइंस को कल तक याद नहीं रखते हैं. दुनिया क्षण-क्षण बदल रही है. ऐसे में उन्हें टिकना है, अपनी पुरानी पीढ़ी की तरह लंबी पारी खेलनी है तो उन्हें तरह-तरह के रोल करने होंगे और किसी तरह के टाइपकास्ट में फंसने से बचना होगा क्योंकि 10-20 साल तक खुद अच्छा काम करना आसान नहीं है. देखना यह है कि इस नई पीढ़ी में इतनी ऊर्जा और माद्दा है कि यह इस तरह की कामयाबी दोहरा पाएगी.
(लेखक फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं)

