अगर 2004 में एनडीए की सरकार सत्ता में आती तो 1967 बैच के आइएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्र कैबिनेट सचिव बन गए होते. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनने के कारण उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया. फिर भी उत्तर प्रदेश कैडर के इस अधिकारी ने यूपीए सरकार के दौरान भी वाणिज्य, रसायन, उर्वरक और टेलीकॉम जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में बड़ी भूमिका निभाई और अब वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दफ्तर में सबसे बड़े अधिकारी बनकर लौटे हैं.
मोदी ने उन्हें अपने पीएमओ में प्रधान सचिव बनाकर इस बात का संकेत दे दिया है कि वे वफादारियों को नहीं, बल्कि अनुभव और पिछले रिकॉर्ड को महत्व दे रहे हैं. प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है. प्रधान सचिव दरअसल पीएमओ, कैबिनेट सचिवालय और विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों के बीच मुख्य संपर्क की तरह काम करता है.
मिश्र टेलीकॉम सचिव के पद से रिटायर हुए थे और उसके बाद 2006 में उन्हें भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआइ) का अध्यक्ष बना दिया गया था, जो नौकरशाही में उनके करियर का सबसे कठिन दौर था. यह वही समय था, जब तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने बिल्कुल मनमाने तरीके से 2जी टेलीकॉम के लाइसेंस बांटे थे, जिसकी वजह से देश को कथित तौर पर 1.76 लाख करोड़ रु. का नुकसान उठाना पड़ा था.
नृपेंद्र मिश्र इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा रहे. उन्हें इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से गवाह बनाया गया था. उन्होंने राजा के इस बयान को गलत बताया कि प्राधिकरण ने पहले आओ, पहले पाओ की नीति का समर्थन किया था. उन्होंने बताया कि टीआरएआइ ने लाइसेंस बांटने के लिए नीलामी कराने की सिफारिश की थी, लेकिन मंत्री ने टीआरएआइ की उस सलाह को मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट में अपनी गवाही में उन्होंने तत्कालीन टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा द्वारा उन्हें लिखी गई एक चिट्ठी का भी उल्लेख किया कि यूपीए सरकार का आवंटन स्थापित नीति के अनुरूप था.
मिश्र को पीएमओ में नियुक्त करने का फैसला भी विवादों से पूरी तरह मुक्त नहीं था. वजह साफ थी. 1997 के टीआरएआइ कानून के मुताबिक, यदि इसका कोई अध्यक्ष और सदस्य अपने पद से इस्तीफा देता है तो पद से हटने के बाद वह कैबिनेट या राज्य सरकार में कोई अन्य पद ग्रहण नहीं कर सकता. मिश्र को वापस लाने के लिए इस कानून में संशोधन जरूरी था. इसलिए मोदी सरकार ने कानून में संशोधन करने के लिए फटाफट एक अध्यादेश जारी कर दिया. इस अध्यादेश के आने के साथ ही उस कानूनी विवशता से मुक्ति मिल गई.
मिश्र ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर की डिग्री हासिल की है. अपने चार दशक के लंबे करियर में मिश्र न सिर्फ केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक में भी काम कर चुके हैं. कल्याण सिंह के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के दौरान मिश्र उनके प्रधान सचिव के तौर पर भी काम कर चुके हैं. -
मोदी ने उन्हें अपने पीएमओ में प्रधान सचिव बनाकर इस बात का संकेत दे दिया है कि वे वफादारियों को नहीं, बल्कि अनुभव और पिछले रिकॉर्ड को महत्व दे रहे हैं. प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है. प्रधान सचिव दरअसल पीएमओ, कैबिनेट सचिवालय और विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों के बीच मुख्य संपर्क की तरह काम करता है.
मिश्र टेलीकॉम सचिव के पद से रिटायर हुए थे और उसके बाद 2006 में उन्हें भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआइ) का अध्यक्ष बना दिया गया था, जो नौकरशाही में उनके करियर का सबसे कठिन दौर था. यह वही समय था, जब तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने बिल्कुल मनमाने तरीके से 2जी टेलीकॉम के लाइसेंस बांटे थे, जिसकी वजह से देश को कथित तौर पर 1.76 लाख करोड़ रु. का नुकसान उठाना पड़ा था.
नृपेंद्र मिश्र इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा रहे. उन्हें इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से गवाह बनाया गया था. उन्होंने राजा के इस बयान को गलत बताया कि प्राधिकरण ने पहले आओ, पहले पाओ की नीति का समर्थन किया था. उन्होंने बताया कि टीआरएआइ ने लाइसेंस बांटने के लिए नीलामी कराने की सिफारिश की थी, लेकिन मंत्री ने टीआरएआइ की उस सलाह को मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट में अपनी गवाही में उन्होंने तत्कालीन टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा द्वारा उन्हें लिखी गई एक चिट्ठी का भी उल्लेख किया कि यूपीए सरकार का आवंटन स्थापित नीति के अनुरूप था.
मिश्र को पीएमओ में नियुक्त करने का फैसला भी विवादों से पूरी तरह मुक्त नहीं था. वजह साफ थी. 1997 के टीआरएआइ कानून के मुताबिक, यदि इसका कोई अध्यक्ष और सदस्य अपने पद से इस्तीफा देता है तो पद से हटने के बाद वह कैबिनेट या राज्य सरकार में कोई अन्य पद ग्रहण नहीं कर सकता. मिश्र को वापस लाने के लिए इस कानून में संशोधन जरूरी था. इसलिए मोदी सरकार ने कानून में संशोधन करने के लिए फटाफट एक अध्यादेश जारी कर दिया. इस अध्यादेश के आने के साथ ही उस कानूनी विवशता से मुक्ति मिल गई.
मिश्र ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर की डिग्री हासिल की है. अपने चार दशक के लंबे करियर में मिश्र न सिर्फ केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक में भी काम कर चुके हैं. कल्याण सिंह के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के दौरान मिश्र उनके प्रधान सचिव के तौर पर भी काम कर चुके हैं. -

