अप्रैल की 3 तारीख को हिंदुस्तान के हिंदीभाषी प्रदेश बिहार में एक रैली के दौरान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता और तब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार पर तथाकथित 'पिंक रिवोल्यूशन’ यानी गुलाबी क्रांति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. बिहार के बाद मध्य प्रदेश में भी उन्होंने यही बात दोहराई. वे बोले कि गुलाबी क्रांति के कारण बूचडख़ानों और मांस निर्यातकों की भरमार हो गई है.
उसके बाद अचानक देखते-ही-देखते मांस मुक्त भारत का उदय होने लगा. बीबीसी गुड फूड पत्रिका और वर्ल्ड वाइड मीडिया प्रकाशन ने अपने अप्रैल अंक से मांसाहार पर कुछ न छापने का फैसला किया है. ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि ये कदम मांसाहार को सार्वजनिक रूप से प्रोत्साहन न देने की राष्ट्रीय कोशिश का एक हिस्सा हैं. पत्रिका की संपादक सोना बहादुर ने पत्रिका को मांस मुक्त किए जाने के इस बदलाव की पुष्टि की.
इस फैसले का समर्थन करते हुए वे इसे 'प्रयोगात्मक’ बताती हैं. उन्होंने कहा कि इस बदलाव का स्वास्थ्य या नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं है. उनके शब्दों में, ''शाकाहार पर जोर देने के पीछे मुख्य प्रेरणा दरअसल भारत की अद्भुत जैवविविधता से भरपूर उपज को खानपान में इस्तेमाल करने की चुनौती है. हमारे भोजन में अपार संभावनाएं हैं और उन संभावनाओं को खोजना चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि अब तक भारतीय खानपान का उतना प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है, जितना होना चाहिए था.
शाकाहारी भोजन को हम 'साइड डिश’ नहीं, बल्कि 'स्टार डिश’ मानते हैं.” अप्रैल के मध्य तक सोशल मीडिया भी शाकाहार और मांसाहार की हलचल से गुलजार हो गया. द हिंदू ने अपने कर्मचारियों के लिए यह आदेश जारी कर दिया कि वे अखबार की कैंटीन में मांसाहार न करें. अखबार के संपादक एन. राम ने कहा, ''मैं शाकाहारी लॉबी पर कुछ नहीं कहना चाहता पर इतना बता दूं कि मैं खुद शाकाहारी नहीं हूं.”
मिशेलिन गाइड (फ्रेंच कंपनी मिशेलिन द्वारा प्रकाशित वार्षिक गाइड बुक) में 28 स्टार पा चुके शेफ जोएल रोबुचॉन ने मार्च, 2014 को बिजनेस इनसाइडर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में इस बात की पुष्टि कर दी कि वे मध्य मुंबई में बन रही गगनचुंबी इमारत में 'आयु’ नाम से एक शाकाहारी रेस्तरां खोलने जा रहे हैं. कोहिनूर नाम की इस इमारत के मालिक महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना नेता मनोहर जोशी के पुत्र उन्मेष जोशी हैं.
शाकाहार समर्थक लॉबी के बढ़ते दबदबे का संकेत उद्योगपति मुकेश अंबानी ने 2013 के अंतिम दिनों में रिलायंस डिलाइट फ्रेंचाइजी से अलग होकर दे दिया. विशुद्घ शाकाहारी और पशु प्रेमी अंबानी की डिलाइट फ्रेंचाइजी को उनके रिलायंस फ्रेश स्टोर्स से पहले ही अलग किया जा चुका था ताकि शाकाहारी ग्राहकों की भावनाओं को ठेस न लगे.
2013 में शेयरधारकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए मुकेश अंबानी ने मांस की पैकेजिंग का कारोबार बंद कर दिया और 'चिकन केम फर्स्ट’ नाम से फास्ट फूड फ्रेंचाइजी खोलने का इरादा भी छोड़ दिया. मुकेश अंबानी की यह चेन केंटकी फ्राइड चिकन से मुकाबला करने वाली थी.
रिलायंस ने प्रेस के लिए जारी बयान में कहा, ''कुछ इलाकों में मांसाहारी सामग्री बेचने के लिए स्वतंत्र रूप से डिलाइट की शुरुआत की गई थी. बाद में ऐसा लगा कि कुछ ग्राहक हमारे दूसरे स्टोर्स में आने से हिचक रहे हैं. इसलिए रिलायंस रीटेल ने यह तय किया है कि हम अपने रीटेल कारोबार में सिर्फ शाकाहारी सामग्री ही बेचेंगे.”
पेटा (पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) और पीसीआरएम (फिजिशियंस कमेटी फॉर रिस्पांसिबल मेडिसिन) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की जोरदार हिमायत के कारण पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और नैतिक तर्कों के आधार पर शाकाहार का चलन बढ़ रहा है. लेकिन उसके साथ ही यह भी एक धारणा है कि भारत में बहुत बड़ी तादाद शाकाहारियों की है.
वीगन समर्थक संगठन पेटा इंडिया की सीईओ पूर्वा जोशीपुरा मानती हैं कि भारत में कुल आबादी का 20-40 प्रतिशत हिस्सा शाकाहारी है, जो दुनिया में शाकाहारियों की सबसे बड़ी आबादी है. गूगल ट्रेंर्ड्स के मुताबिक, वीगनिज्म यानी भोजन में सभी तरह के पशु उत्पादों का उपयोग न करने के बारे में खोज पिछले दो सालों में दोगुनी हो गई है.
द हिंदू में मांसाहार पर प्रतिबंध के आदेश पर उभरे आक्रोश को छोड़ दें तो यह सच है कि पश्चिम में पीसीआरएम जैसे दफ्तरों में मांसाहार पर प्रतिबंध बहुत आम बात है. दुनिया भर में वीगन भोजन का चलन नए युग की जीवन शैली अपनाने वाले लोगों तक सीमित है. हालांकि इसे कूल, मस्त, खुराक के पाबंद, सेहत के दीवानों और नैतिकता प्रिय लोगों की पसंद माना जाने लगा है और यूके जैसे बाजारों में मांस की जगह टोफू (सोयाबीन का पनीर) जैसी चीजें ले रही हैं.
भारत में खुराक का नक्शा विविधताओं से भरा दिखता है. फ्यूचर ग्रुप में चीफ बिलीफ ऑफिसर और पौराणिक विषयों के जानकार देवदत्त पटनायक कहते हैं, ''भारत में धार्मिक भेद को छोड़ दें तो भी यहां भिन्न-भिन्न 7,000 समुदाय हैं. हर समुदाय का खानपान अलग है.
मुझे नहीं लगता कि कोई यह जानता है या जान सकता है कि सब क्या खाते थे, क्या खाते हैं और क्या खाएंगे. पर मुझे लगता है कि शायद हर किसी को दूसरों के खानपान पर लगाम लगाने का बहाना खोजने में मजा आता है. अगर इसको धर्म से भी जोड़ा जा सके तो यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया जा सकता.”
लेकिन जोशीपुरा उग्र वीगनिज्म के उदय की वकालत करती हैं. पेटा शुरू से ही जागरूकता पैदा करने और कानूनी उपायों का सहारा लेने के साथ-साथ इस तरह की गतिविधियों पर जोर देता रहा है. वे कहती हैं, ''उग्र वे हैं, जो मांस और दूसरे पशु उत्पाद बेचते हैं और उनका प्रचार करते हैं.
वे लोगों से इस बात को छिपाते हैं कि पशुओं के साथ कैसी क्रूरता का व्यवहार होता है. सबसे बुनियादी बात यह है कि पशु संरक्षण कानूनों का भी खुलेआम उल्लंघन होता है. वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और क्रूर सामग्री बेचकर लोगों को अस्पताल और कब्र में भेजने में मदद करते हैं. वे धरती को नष्ट कर रहे हैं.”
बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे में हमेशा गोधन के संरक्षण का मुद्दा प्रबल रहा है. 17वीं पशुधन गणना में मवेशियों की घटती दर ही शायद नरेंद्र मोदी की चिंता का कारण रही होगी. 1992 में 20.458 करोड़ के मुकाबले 2007 में मवेशियों की संख्या 19.908 करोड़ रह गई. भारत दुनिया में गोमांस का सबसे बड़ा निर्यातक भी है. गणना के अनुसार 2012-13 में 3.2 अरब डॉलर मूल्य का 11.08 लाख टन गोमांस निर्यात किया गया.
2012 में डेयरी उद्योग ने एकजुट होकर मांग की कि मांस उद्योग के लिए सब्सिडी बंद की जाए. उनका तर्क था कि मांस के ऊंचे दामों के लालच में कम उम्र के पशुओं को भी काटा जा रहा है और पैसे के लालच में युवा किसान अपने मवेशियों को बेच देते हैं.
सरकार का कृषि और प्रसंस्कृत आहार उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (अपीडा) मांस की ढुलाई, प्री कूलिंग सुविधा, कोल्ड स्टोरेज, ब्रांड प्रचार और क्वालिटी नियंत्रण के लिए 25 से 60 प्रतिशत तक की सब्सिडी देता है. इसके अलावा बिक्री कर और आयकर पर भी छूट दी जाती है. इसे देखकर यह साफ जाहिर हो जाता है कि अंबानी जैसे कारोबारी समूह भी शुरू में मांस के कारोबार की तरफ क्यों आकर्षित हुए होंगे, जबकि वे खुद मांस के लिए मवेशियों को मारने-काटने के सख्त विरोधी रहे हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि शाकाहार समर्थकों का दबदबा इतना बढ़ गया?
शाकाहारी दुनिया में भले बहुमत में न हों, पर सत्ता में जरूर हैं. जोशीपुरा बताती हैं कि अमेरिका में बिल गेट्स, ट्विटर के संस्थापक इवान विलियम्स और बिज स्टोन ने 'बियांड मीट’ का समर्थन किया है. यह कैलिफोर्निया स्थित कंपनी है, जो बाजार में पशु प्रोटीन की जगह वनस्पति प्रोटीन लाने के लिए बड़े पैमाने पर विकल्प और समाधान देती है.
भारत में सत्ता प्रतिष्ठान के समर्थकों और मीडिया घरानों के मालिकों से लेकर मुकेश अंबानी या गौतम अडानी जैसे बड़े-बड़े उद्योगपति तक, सब शाकाहारी हैं. कुमार मंगलम बिरला ने इस साल जनवरी में मैकिन्जे ऐंड कंपनी के एक प्रकाशन में रिइमेजिनिंग इंडिया नाम से एक लेख लिखा था.
इस लेख में बिरला ने स्वीकार किया कि उन्होंने बहुत हिचकते हुए पांच साल पहले आदित्य बिरला ग्रुप को 36 देशों के अपने दफ्तरों में मांसाहार की अनुमति दी थी. अपने उस लेख में बिरला ने लिखा था, ''अगर हम दुनिया पर अपनी छाप छोडऩा चाहते हैं तो हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि दुनिया भी हमारे ऊपर अपनी छाप छोड़ेगी.”
उसके बाद अचानक देखते-ही-देखते मांस मुक्त भारत का उदय होने लगा. बीबीसी गुड फूड पत्रिका और वर्ल्ड वाइड मीडिया प्रकाशन ने अपने अप्रैल अंक से मांसाहार पर कुछ न छापने का फैसला किया है. ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि ये कदम मांसाहार को सार्वजनिक रूप से प्रोत्साहन न देने की राष्ट्रीय कोशिश का एक हिस्सा हैं. पत्रिका की संपादक सोना बहादुर ने पत्रिका को मांस मुक्त किए जाने के इस बदलाव की पुष्टि की.
इस फैसले का समर्थन करते हुए वे इसे 'प्रयोगात्मक’ बताती हैं. उन्होंने कहा कि इस बदलाव का स्वास्थ्य या नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं है. उनके शब्दों में, ''शाकाहार पर जोर देने के पीछे मुख्य प्रेरणा दरअसल भारत की अद्भुत जैवविविधता से भरपूर उपज को खानपान में इस्तेमाल करने की चुनौती है. हमारे भोजन में अपार संभावनाएं हैं और उन संभावनाओं को खोजना चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि अब तक भारतीय खानपान का उतना प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है, जितना होना चाहिए था.
शाकाहारी भोजन को हम 'साइड डिश’ नहीं, बल्कि 'स्टार डिश’ मानते हैं.” अप्रैल के मध्य तक सोशल मीडिया भी शाकाहार और मांसाहार की हलचल से गुलजार हो गया. द हिंदू ने अपने कर्मचारियों के लिए यह आदेश जारी कर दिया कि वे अखबार की कैंटीन में मांसाहार न करें. अखबार के संपादक एन. राम ने कहा, ''मैं शाकाहारी लॉबी पर कुछ नहीं कहना चाहता पर इतना बता दूं कि मैं खुद शाकाहारी नहीं हूं.”
मिशेलिन गाइड (फ्रेंच कंपनी मिशेलिन द्वारा प्रकाशित वार्षिक गाइड बुक) में 28 स्टार पा चुके शेफ जोएल रोबुचॉन ने मार्च, 2014 को बिजनेस इनसाइडर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में इस बात की पुष्टि कर दी कि वे मध्य मुंबई में बन रही गगनचुंबी इमारत में 'आयु’ नाम से एक शाकाहारी रेस्तरां खोलने जा रहे हैं. कोहिनूर नाम की इस इमारत के मालिक महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना नेता मनोहर जोशी के पुत्र उन्मेष जोशी हैं.
शाकाहार समर्थक लॉबी के बढ़ते दबदबे का संकेत उद्योगपति मुकेश अंबानी ने 2013 के अंतिम दिनों में रिलायंस डिलाइट फ्रेंचाइजी से अलग होकर दे दिया. विशुद्घ शाकाहारी और पशु प्रेमी अंबानी की डिलाइट फ्रेंचाइजी को उनके रिलायंस फ्रेश स्टोर्स से पहले ही अलग किया जा चुका था ताकि शाकाहारी ग्राहकों की भावनाओं को ठेस न लगे.
2013 में शेयरधारकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए मुकेश अंबानी ने मांस की पैकेजिंग का कारोबार बंद कर दिया और 'चिकन केम फर्स्ट’ नाम से फास्ट फूड फ्रेंचाइजी खोलने का इरादा भी छोड़ दिया. मुकेश अंबानी की यह चेन केंटकी फ्राइड चिकन से मुकाबला करने वाली थी.
रिलायंस ने प्रेस के लिए जारी बयान में कहा, ''कुछ इलाकों में मांसाहारी सामग्री बेचने के लिए स्वतंत्र रूप से डिलाइट की शुरुआत की गई थी. बाद में ऐसा लगा कि कुछ ग्राहक हमारे दूसरे स्टोर्स में आने से हिचक रहे हैं. इसलिए रिलायंस रीटेल ने यह तय किया है कि हम अपने रीटेल कारोबार में सिर्फ शाकाहारी सामग्री ही बेचेंगे.”
पेटा (पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) और पीसीआरएम (फिजिशियंस कमेटी फॉर रिस्पांसिबल मेडिसिन) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की जोरदार हिमायत के कारण पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और नैतिक तर्कों के आधार पर शाकाहार का चलन बढ़ रहा है. लेकिन उसके साथ ही यह भी एक धारणा है कि भारत में बहुत बड़ी तादाद शाकाहारियों की है.
वीगन समर्थक संगठन पेटा इंडिया की सीईओ पूर्वा जोशीपुरा मानती हैं कि भारत में कुल आबादी का 20-40 प्रतिशत हिस्सा शाकाहारी है, जो दुनिया में शाकाहारियों की सबसे बड़ी आबादी है. गूगल ट्रेंर्ड्स के मुताबिक, वीगनिज्म यानी भोजन में सभी तरह के पशु उत्पादों का उपयोग न करने के बारे में खोज पिछले दो सालों में दोगुनी हो गई है.
द हिंदू में मांसाहार पर प्रतिबंध के आदेश पर उभरे आक्रोश को छोड़ दें तो यह सच है कि पश्चिम में पीसीआरएम जैसे दफ्तरों में मांसाहार पर प्रतिबंध बहुत आम बात है. दुनिया भर में वीगन भोजन का चलन नए युग की जीवन शैली अपनाने वाले लोगों तक सीमित है. हालांकि इसे कूल, मस्त, खुराक के पाबंद, सेहत के दीवानों और नैतिकता प्रिय लोगों की पसंद माना जाने लगा है और यूके जैसे बाजारों में मांस की जगह टोफू (सोयाबीन का पनीर) जैसी चीजें ले रही हैं.
भारत में खुराक का नक्शा विविधताओं से भरा दिखता है. फ्यूचर ग्रुप में चीफ बिलीफ ऑफिसर और पौराणिक विषयों के जानकार देवदत्त पटनायक कहते हैं, ''भारत में धार्मिक भेद को छोड़ दें तो भी यहां भिन्न-भिन्न 7,000 समुदाय हैं. हर समुदाय का खानपान अलग है.
मुझे नहीं लगता कि कोई यह जानता है या जान सकता है कि सब क्या खाते थे, क्या खाते हैं और क्या खाएंगे. पर मुझे लगता है कि शायद हर किसी को दूसरों के खानपान पर लगाम लगाने का बहाना खोजने में मजा आता है. अगर इसको धर्म से भी जोड़ा जा सके तो यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया जा सकता.”
लेकिन जोशीपुरा उग्र वीगनिज्म के उदय की वकालत करती हैं. पेटा शुरू से ही जागरूकता पैदा करने और कानूनी उपायों का सहारा लेने के साथ-साथ इस तरह की गतिविधियों पर जोर देता रहा है. वे कहती हैं, ''उग्र वे हैं, जो मांस और दूसरे पशु उत्पाद बेचते हैं और उनका प्रचार करते हैं.
वे लोगों से इस बात को छिपाते हैं कि पशुओं के साथ कैसी क्रूरता का व्यवहार होता है. सबसे बुनियादी बात यह है कि पशु संरक्षण कानूनों का भी खुलेआम उल्लंघन होता है. वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और क्रूर सामग्री बेचकर लोगों को अस्पताल और कब्र में भेजने में मदद करते हैं. वे धरती को नष्ट कर रहे हैं.”
बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे में हमेशा गोधन के संरक्षण का मुद्दा प्रबल रहा है. 17वीं पशुधन गणना में मवेशियों की घटती दर ही शायद नरेंद्र मोदी की चिंता का कारण रही होगी. 1992 में 20.458 करोड़ के मुकाबले 2007 में मवेशियों की संख्या 19.908 करोड़ रह गई. भारत दुनिया में गोमांस का सबसे बड़ा निर्यातक भी है. गणना के अनुसार 2012-13 में 3.2 अरब डॉलर मूल्य का 11.08 लाख टन गोमांस निर्यात किया गया.
2012 में डेयरी उद्योग ने एकजुट होकर मांग की कि मांस उद्योग के लिए सब्सिडी बंद की जाए. उनका तर्क था कि मांस के ऊंचे दामों के लालच में कम उम्र के पशुओं को भी काटा जा रहा है और पैसे के लालच में युवा किसान अपने मवेशियों को बेच देते हैं.
सरकार का कृषि और प्रसंस्कृत आहार उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (अपीडा) मांस की ढुलाई, प्री कूलिंग सुविधा, कोल्ड स्टोरेज, ब्रांड प्रचार और क्वालिटी नियंत्रण के लिए 25 से 60 प्रतिशत तक की सब्सिडी देता है. इसके अलावा बिक्री कर और आयकर पर भी छूट दी जाती है. इसे देखकर यह साफ जाहिर हो जाता है कि अंबानी जैसे कारोबारी समूह भी शुरू में मांस के कारोबार की तरफ क्यों आकर्षित हुए होंगे, जबकि वे खुद मांस के लिए मवेशियों को मारने-काटने के सख्त विरोधी रहे हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि शाकाहार समर्थकों का दबदबा इतना बढ़ गया?
शाकाहारी दुनिया में भले बहुमत में न हों, पर सत्ता में जरूर हैं. जोशीपुरा बताती हैं कि अमेरिका में बिल गेट्स, ट्विटर के संस्थापक इवान विलियम्स और बिज स्टोन ने 'बियांड मीट’ का समर्थन किया है. यह कैलिफोर्निया स्थित कंपनी है, जो बाजार में पशु प्रोटीन की जगह वनस्पति प्रोटीन लाने के लिए बड़े पैमाने पर विकल्प और समाधान देती है.
भारत में सत्ता प्रतिष्ठान के समर्थकों और मीडिया घरानों के मालिकों से लेकर मुकेश अंबानी या गौतम अडानी जैसे बड़े-बड़े उद्योगपति तक, सब शाकाहारी हैं. कुमार मंगलम बिरला ने इस साल जनवरी में मैकिन्जे ऐंड कंपनी के एक प्रकाशन में रिइमेजिनिंग इंडिया नाम से एक लेख लिखा था.
इस लेख में बिरला ने स्वीकार किया कि उन्होंने बहुत हिचकते हुए पांच साल पहले आदित्य बिरला ग्रुप को 36 देशों के अपने दफ्तरों में मांसाहार की अनुमति दी थी. अपने उस लेख में बिरला ने लिखा था, ''अगर हम दुनिया पर अपनी छाप छोडऩा चाहते हैं तो हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि दुनिया भी हमारे ऊपर अपनी छाप छोड़ेगी.”

