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जवां गीतों की दुनिया

यतींद्र मिश्र की किताब हमसफर  जहां हिंदी सिने संगीत के सफर का आख्यान है तो नया ज्ञानोदय के सरहद विशेषांक में अमन की कामना की गई है.

अपडेटेड 2 जून , 2014
हमसफर
हिंदी सिनेमा और संगीत   लेखक: यतींद्र मिश्र
प्रकाशक:  पेंगुइन बुक्स, पंचशील पार्क, नई दिल्ली कीमत: 299 रु.

राज कपूर की मशहूर फिल्म जागते रहो का गाना जागो मोहन प्यारे आज भी जब हमारे कानों में पड़ता है तो इस बात का एहसास हो जाता है कि एक नए दिन की शुरुआत हो गई है. हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के ये सार्थक और दिल को छू लेने वाले गीत आज भी हमारे मशीनी जीवन में संवेदनाओं को जगाने का काम करते हैं.

कवि, संपादक और सिने अध्येता यतींद्र मिश्र की यह किताब हिंदी सिने जगत के प्रतिष्ठित 23 संगीतकारों की एक-एक प्रतिनिधि फिल्म के बहाने उनकी संगीत यात्रा, वैचारिकी, सिने संगीत में आए रचनात्मक बदलाव, स्थापना और प्रमुख गायक स्वरों के बनने-बिगडऩे के सफर को गहरे जाकर परखती है.

संगीत निर्देशक पंकज मलिक से शुरू यह यात्रा अनिल विश्वास, सी. रामचंद्र, नौशाद, सलिल चौधरी, सचिन देव बर्मन, ओ.पी. नैयर, आर.डी. बर्मन, शंकर जयकिशन और हृदयनाथ मंगेशकर जैसे संगीत निर्देशकों की एक फिल्म के गीतों की विवेचना के बरअक्स उस समय के संगीत परिदृश्य का पूरा खाका पेश किया गया है.

साथ ही फिल्म के हर गीत के लिए सार्थक धुन के प्रति उनकी तैयारी, रिहर्सल और उनकी लगन आदि को सामने रखती है. आज जब फिल्मी संगीत में शब्द और भाव बेमानी होते जा रहे हैं, उस दौर में यह किताब वाकई सुनहरे अतीत को जानने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

इसी के साथ लेखक ने गीतों के साथ जुड़े रागों और इस्तेमाल में लाए गए म्युजिकल इंस्ट्रुमेंट— तबला, सारंगी, हारमोनियम, एकॉर्डियन और पियानो के प्रयोग का पूरा विवरण दिया है. हिंदी सिनेमा के अंदरूनी संसार में जारी राजनीति का भी जगह-जगह पर रोचक वर्णन है. स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, आशा भोंसले जैसे गायक-गायिकाएं गीत गाने के लिए कितनी तैयारी करते थे और उनमें अपने काम को लेकर कितनी दीवानगी थी, इसका यतींद्र ने बड़ा ही रसीला वर्णन किया है.

लेखक ने गीतों के सृजन के पीछे छिपी इन संगीतकारों की तैयारी, मेलोडी को लेकर उनकी दीवानगी का दिलचस्प वर्णन किया है. देवानंद की कालजयी फिल्म गाइड के मशहूर गीत आज फिर जीने की तमन्ना है केसृजन से जुड़ा यह अंश देखें: ''एक स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा और उसके सपनों  की उन्मुक्त उड़ान को कालजयी शब्द और स्वर देने में आज फिर जीने की तमन्ना है  मिसाल बन चुका है.

रोजी (वहीदा) का अपने पति मार्को (किशोर साî) से यह कहने 'मार्को मैं जीना चाहती हूं’ के बाद इस गीत की व्यंजना जैसे उन तमाम भारतीय स्त्रियों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली बन गई थी, जिनके बेमेल, नीरस वैवाहिक जीवन में उनका खुद का हुनर घुट रहा था.” इतिहास गवाह है कि इन गीतों ने अपने समय में पूरे मुल्क को झूमने पर मजबूर किया था और हर उम्र के श्रोता को सराबोर किया था. आज भी उनकी प्रासंगिकता और माधुर्य कम नहीं हुआ है.

पर यह किताब पंकज राग की किताब धुनों की यात्रा  की प्रतिच्छाया से बुरी तरह ग्रस्त नजर आती है. यह बात खलती है. लेखक को रवि की प्रतिनिधि फिल्म के बतौर चौदहवीं का चांद की बजाए गुमराह या दो बदन का चयन करना चाहिए था. उन्हें खेमचंद प्रकाश, श्याम सुंदर, गुलाम हैदर, आर.सी. बोराल, बुलो सी. रानी जैसे दिग्गज संगीतकारों की एक प्रतिनिधि फिल्म को भी शामिल करना चाहिए था. पुस्तक की भूमिका में इसका जिक्र किया गया है. इक्का-दुक्का खामियों के बावजूद यह यतींद्र का सार्थक प्रयास है.


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नया ज्ञानोदय
मई 2014, सरहद विशेषांक
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड, नई दिल्ली
कीमत: 70 रु.
अमन की आशा में
मनुष्य को युद्धों ने कितना नुकसान पहुंचाया है, इसका गवाह दुनिया का इतिहास है. उन त्रासदियों को याद करना आज भी उतना ही प्रासंगिक है. क्रीमिया-यूक्रेन का संकट, सीरिया के हालात और अगर हम अपने गिरेबां में झांके तो पड़ोसी देशों से हमारी तनातनी. दुनिया के देशों के बीच खिंची दीवारों और अशांति के ये हालिया उदाहरण भर हैं.  इन्हीं हालात और सरहदों के बीच बंटे समाज की शिनाख्त करता है नया ज्ञानोदय पत्रिका का ताजा सरहद विशेषांक.
संपादकीय और ज्ञान चतुर्वेदी के स्थायी स्तंभ के अलावा यह अंक 11 खंडों में विभाजित है.

इसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के ऐतिहासिक संदेश हैं. तो मुकेश कुमार बताते हैं कि कैसे देश का मीडिया सरहदों पर सैनिक गतिविधियों को तो जगह देता है, लेकिन वहां आसपास की जनता की पीड़ा को नजरअंदाज करता है. मंटो और भीष्म साहनी से लेकर विदेशी लेखकों की मशहूर कहानियां भी इसमें शामिल हैं. कविताओं में फैज़ और गुलजार के अलावा कई प्रतिष्ठित शायरों की नज्में हैं, जिनसे गुजरते हुए इन त्रासदियों का बोध होता है.

मनोहर श्याम जोशी की कच्छ से कश्मीर तक और ओम थानवी की कराची यात्रा के संस्मरण भी हैं. वहीं फौजियों के पत्र सैनिकों के दर्द को शिद्दत से उभारते हैं. अंक में हिंदी सिनेमा के जरिए भी सरहदों की पीड़ा की पड़ताल की गई है. कुल मिलाकर यह अंक सिर्फ पठनीय ही नहीं, बल्कि संग्रह करने लायक है. सबसे जरूरी है अमन-चैन की कामना. जैसाकि इसके संपादक लीलाधर मंडलोई ने अपने संपादकीय में जिक्र किया है. ऐसा ही हो, आमीन!
-सरोज कुमार
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