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विस्थापन की पीड़ा

नजर लागी राजा इस पूरे संग्रह में लगातार ध्यान खींचती है. यह एक अद्भुत प्रेम कविता है. शारीरिक सौंदर्य के साथ प्रेम के उदात्त स्वरूप का ऐसा वर्णन इधर की कविता में दिखना लगभग बंद हो गया है.

अपडेटेड 9 सितंबर , 2013
कविता लगातार कवि के मन में चलती रहने वाली प्रक्रिया है. कविता लिखना राजरोग जैसा होता है. कभी के बाद अभी वही लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. कविता के गुणग्राही पाठक जानते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल का अपना एक मिजाज, एक शिल्प और कहने का एक खास ढंग है. उनका पाठक अखबारों, टीवी, कहानियों की यथार्थवादी दुनिया, कविता के एक खास शिल्प से थोड़ी देर के लिए बाहर निकलकर उनके यहां मुक्ति की सांस लेता हुआ अपने को थोड़ी देर के लिए मुक्त करता है. शुक्ल अपने पाठकों के बीच समादृत और लोकप्रिय हैं.

इस पूरे संग्रह में एक कविता अंधेरी रातों में चांद की तरह चमकती हुई हमारा ध्यान खींचती है, वह है नजर लागी राजा. यह एक अद्भुत प्रेम कविता है. शमशेर जैसी विंबधर्मिता तो यहां नहीं है लेकिन शमशेर की याद आना स्वाभाविक है. पूरी कविता में नायिका नायक को काला चश्मा उतारने के लिए मनौव्वल करती हुई गीत के शिल्प में अपनी बात कहती है. क्योंकि मैं बहुत सावली हूं/काले चश्मे में मैं नहीं दिखूंगी. वह बतलाती है मेरी छाती चकमक पत्थर की तरह कठोर और गोल है/तुम्हारे हाथ भी चकमक पत्थर की तरह कठोर हैं/हाथों के आघात से जो चिनगारी पैदा होगी. उसी की यह बुझता संसार प्रतीक्षा कर रहा है/कि जल उठे/और प्रेम की अग्नि को पा सके. शारीरिक सौंदर्य के  साथ प्रेम के उदात्त स्वरूप का ऐसा वर्णन इधर की कविता में दिखना लगभग बंद हो गया है. शुक्ल सिर्फ एक कविता के सहारे उस तरफ इशारा कर देते हैं. यह इशारा कम महत्वपूर्ण नहीं है.

इसी दुनिया और इसी समय में गुजरात और मुंबई हैं. वहां रहने वाली जनता-जनार्दन है. बाहरी कहे जाने वाले लोग हैं. उनका करुण विलाप है. उनके भावों और संवेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति है. कवि उन्हें देखता है तो उसे पूरा बिहार दिखता है. उन एक व्यक्ति या शब्द नहीं, वह अपने आप में एक  मुकम्मल राष्ट्र है. एक पूरा संसार है. उसी तरह गुजराती या मराठी सिर्फ एक भाषा या अस्मिता का संकट नहीं है. वह मनुष्यता को पैरों तले कुचलकर, मेघनाद की तरह का अट्टहास है. एक मनुष्य के अंदर कितने तरह के मनुष्य रहते हैं, शुक्ल की कविता उसकी परतों को खोलती है, सच को नंगी आंखों से दिखलाती है. आपको उन्हें पढ़कर गहरा संताप होगा. दुख होगा.

इस संग्रह में बार-बार उनका पड़ोस, उनकी उम्र, कविताकर्म, छत्तीसगढ़ और आदिवासी आते-जाते रहते हैं. इस संग्रह में अपने बचे हुए जीवन को कवि बार-बार गिनकर गुल्लक में रखता हुआ दिखाई पड़ता है. उसकी पहरेदारी करता हुआ. यह बचा हुआ जीवन, उसे बार-बार आगे की तरफ ले जाता है. जहां पड़ोस है. उसके अपने घर के छोटे-छोटे बच्चे हैं. उनकी आत्मीयता है. दुख है. सुख है. अपने गांव के लोग हैं. वह इन सबके बीच संन्यास नहीं लेना चाहता. जिंदा रहना चाहता है. सांसों का हिसाब-किताब रखना कम महत्वपूर्ण नहीं होता. पड़ोसी के दुख की, जंगल के आदिवासियों की और पेड़ से घोसले के बेदखल हो जाने की चिंता करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता. शुक्ल के पहले के संग्रहों में भी ये चिंताएं हैं लेकिन यहां उनका और अधिक विस्तार है.

पहले एक आदिवासी महिला जंगल जाते हुए नहीं डरती थी, लेकिन बाजार जाते डरती थी. अब उनके बेदखल होने का समय है. आज के क्रूर समय में एक कवि आदि मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते की वकालत करता हैः प्रकृति रहती हैं प्रकृति के  पड़ोस में और जो प्रकृति के सबसे निकट है/जंगल उनका है. इस रिश्ते को बचाने की गुहार एक कवि बार-बार करता है. वास्तव में पूरा संग्रह विस्थापित होने की पीड़ा को आवाज देता है. मुखर आवाज.
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