चालीस साल के करण जौहर, 43 वर्षीय दिवाकर बनर्जी, 39 वर्षीय जोया अख्तर और 40 वर्षीय अनुराग कश्यप जैसे निर्देशकों को एक कमरे में एक साथ बैठा दें तो समझे फुलटू धमाल है. करण ने जब बताना शुरू किया कि उन्होंने जोया के पापा जावेद अख्तर को अपनी पहली फिल्म कुछ-कुछ होता है (1998) का टाइटल सांग लिखने के लिए किस तरह से मनाने की कोशिश की थी, तो सबका हंसी के मारे बुरा हाल हो गया. इन निर्देशकों ने जो फिल्में बनाई हैं वे एकदम अलग हैं, लेकिन इस चौकड़ी को सिनेमा का एक जुनून जोड़ता है, जिसे इन सब के निर्देशन वाली शॉर्ट फिल्मों में देखा जा सकता है. इन सभी शॉर्ट फिल्मों को एक साथ मिलाकर बॉम्बे टॉकीज का हिस्सा बनाया गया है. अनुराग की फिल्म एक फैन के बारे में है, जो अपने आदर्श अमिताभ बच्चन से मिलना चाहता है. करण की फिल्म के स्टार रानी मुखर्जी और रणदीप हुड्डा ऐसा नाखुश विवाहित जोड़ा बने हैं, जिनके रिश्ते का इम्तहान उनके बीच एक युवा (साकिब सलीम) के आने से होता है. जोया दिखाती हैं कि किस तरह से कैटरीना कैफ के प्यार में पागल एक बच्चा अपने परिवार के एतराज के बावजूद सपने को पूरा करता है. दिवाकर बनर्जी ने सत्यजीत रे की कहानी पटोल बाबू फिल्म स्टार का फिल्मांकन किया है, जिसमें स्ट्रगलिंग ऐक्टर को दिखाया गया है, जो बाद में ख्याति पा लेता है. बॉम्बे टॉकीज 3 मई को रिलीज होगी, जिस दिन दादा साहेब फाल्के की भारत की पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र के रिलीज होने के 100 साल पूरे हो रहे हैं. सीनियर एडिटर गायत्री जयरामन और एसोसिएट एडिटर सुहानी सिंह ने राउंडटेबल चर्चा में इन फिल्मकारों से बात की कि किस तरह सिनेमा का विकास हुआ, इंडस्ट्री के सामने क्या चुनौतियां हैं और हर शुक्रवार को किस तरह से धड़कन ऊपर-नीचे होती है.
सिनेमा बॉम्बे टॉकीज की चारों शॉर्ट फिल्मों का अहम हिस्सा है. क्या आप जज्बात के उन पहलुओं को टटोलना चाहते थे, जिन्हें यह कुरेदता-उभारता है?
जोया: कुछेक साल पहले प्रोड्यूसर आशि दुआ ने भारतीय सिनेमा के सेलिब्रेशन के लिए 25 मिनट की फिल्म बनाने के लिए मुझसे संपर्क किया. इसका बजट 1.5 करोड़ रु. का था. मैं नहीं समझती कि हममें से किसी ने बैठकर एक-दूसरे से पूछा, “आप क्या कर रहे हो? कौन-से जज्बे उकेरना चाहते हो?” हमने वही किया जो हम करना चाहते थे.
करण, आपके लिए कम बजट में फिल्म बनाना चुनौतीपूर्ण नहीं था?
करण: बिलकुल था. क्रिएटिविटी तो बाद में आती है. मैं खुद की फिल्म भी बनाता हूं, इसलिए मेरे ऊपर तो कभी इस तरह की तलवार नहीं लटकती रही. मैं ठगी विद्या से अपना पैसा नहीं बढ़ाना चाहता. संक्षिप्तता मेरी ताकत नहीं रही है. मेरी सबसे छोटी फिल्म स्टुडेंट ऑफ द ईयर (2012) 2 घंटे 25 मिनट की है और मेरी सबसे लंबी फिल्म कभी अलविदा ना कहना (2006) 3 घंटे 34 मिनट की है. हरेक को बॉम्बे टॉकीज में सिर्फ 20 मिनट दिए गए थे. जब कॉन्ट्रैक्ट आया तो उसमें 25 मिनट कहा गया. लेकिन हम सबने यह सीमा पार कर ली और 27 मिनट तक ले लिया है.
जोया: नहीं. मैंने अपनी फिल्म 24 मिनट की ही रखी है.
अनुराग: जोया का एक मिनट मैंने चुरा लिया है.
दिवाकर: मुझे तो असल में पता ही नहीं है कि मेरी फिल्म कितनी लंबी है.
अनुराग, आपकी फिल्म की शूटिंग अमिताभ बच्चन के जुहू स्थित बंगले प्रतीक्षा के बाहर की गई है. दिवाकर, आपकी फिल्म दादर में तैयार हुई है. आप सब किस तरह की मुंबई दिखाना चाहते थे?
अनुराग: मैं मुंबई आया था तो जुहू देखकर दंग रह गया था, जहां सारे स्टार रहते थे. मेरी फिल्म जुहू से शुरू होकर चंदन में खत्म होती है, जो बच्चन साहब के बंगले से पांच मिनट की दूरी पर स्थित सिंगल स्क्रीन थिएटर है.
दिवाकर: मैं परेल-लालबाग में रहता हूं. वहां पिछले आठ साल से रह रहा हूं और काम कर रहा हूं. यह इलाका मुंबई में पिछले 10-15 साल में आए बदलावों को दर्शाता है. मॉल, जिस तरह के हम कपड़े पहनते हैं, जैसी भाषा बोलते हैं, मेरी बिल्डिंग के ठीक बगल की झुग्गी बस्ती में जिस तरह का म्युजिक बजता है. मैंने बॉलीवुड और कुछ यूरोपीय भाव वाले गीतों को बजते सुना है जिसमें हिंदी और मराठी संगीत भी मिल जाता है.
जोया: यह तो भयानक लगता होगा.
दिवाकर: यह बहुत ही मजेदार है. तुम्हें आना चाहिए. मेरा कैरेक्टर चॉल में रहता है जो मेरे ऑफिस के साथ ही है. मैं हर दिन जब अपने ऑफिस से बाहर निकलता हूं तो अब भी अपनी लोकेशन देखता हूं. इससे वास्तव में यादें ताजा हो जाती हैं. यह कॉटन मिल का इलाका भी है. इस तरह मेरी फिल्म कई तरीके से उस बंबई का जिक्र करती है जहां कॉटन मिलें बंद हो गई हैं, परिवारों की पूरी पीढ़ी की जीविका छिन गई है, एक पीढ़ी बेरोजगारी के साथ बड़ी हो रही है और उनका जीवन किस तरह का है. यह इस इलाके का संक्षिप्त स्वरूप पेश करती है.
करण: मैंने मुंबई को कभी भी नहीं दिखाया है. यह पहला मौका है, जब मैंने पहली बार मुंबई की सड़कों पर शूटिंग की है.
जोया: मेरी फिल्म में मुंबई की कहानी नहीं है. यह बिना नाम वाली जगह है. यह किसी भी जगह फिट हो सकती है.
आपने कास्टिंग किस तरह की?
अनुराग: विनीत कुमार (जिसने अमिताभ बच्चन के कट्टर फैन की भूमिका निभाई है) इस रोल के लिए बिल्कुल सही आदमी था.
करण: क्या उसका हेयरस्टाइल भी उन्हीं की तरह था?
अनुराग: सब कुछ वैसा ही. वह भी उसी इलाके (उत्तर प्रदेश) का है और (सिचुएशन को) अच्छी तरह समझता है.
जोया: मेरी फिल्म में काम करने वाला बच्चा आठ साल का है. मेरे कास्टिंग डायरेक्टर ने उसे ढूंढ़ा. वह चिल्लर पार्टी (2011) में भी था. कमाल का है.
अनुराग: गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012) में मनोज बाजपेयी के बचपन की भूमिका भी निभा चुका है वो, और जो करण का हीरो है वह गैंग्स ऑफ वासेपुर-2 (2012) की हीरोइन का भाई है.
करण: हां, साकिब सलीम हुमा (कुरैशी) का भाई है.
जोया: अगर गैंग्स ऑफ वासेपुर नहीं बनती तो हमें कोई कलाकार नहीं मिलता.
दिवाकर: सदाशिव अमरापुरकर भी तो हैं. मैं तो अर्द्ध सत्य (1983) देखने के बाद से ही उनके साथ काम करना चाह रहा था.
हम सिनेमा को फिल्मकारों की नजर से देखते आए हैं. यह दर्शकों की नजरों का सम्मान है.
करण: शहरों में ही नहीं बल्कि छोटे कस्बों में भी बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का है, जो पारंपरिक ढर्रे की फिल्मों से पक चुके हैं और नई शैली, कहानियों और बेहतर तकनीक की फिल्में देखना चाहते हैं. मैं नहीं समझता, पिछले एक अरसे में एक भी अच्छी फिल्म आई हो और उसका लोगों पर असर न हुआ हो. दर्शकों के बारे में अपनी बनी-बनाई धारणा की वजह से ही हमने सिनेमा की तरक्की को रोक दिया है.
जोया, फिल्मी परिवार से होना वरदान है या बोझ?
जोया: आप फिल्मी परिवारों के बच्चों से मिलें तो वे आपको बॉक्स ऑफिस से त्रस्त मिलेंगे. अपने पलने-बढऩे के दौरान हमें कभी भी फिल्मी पत्रिकाएं पढऩे को नहीं मिली हैं. मेरी मां तो बाल कलाकार थीं. उन्होंने 3 वर्ष की उम्र से फिल्मों में काम शुरू कर दिया था. मेरे डैड लेखक के रूप में फिल्मों में आए लेकिन वे शायर भी हैं. वे एक दूसरे दौर के लेखक हैं, जब पूरी तरह से अलग लोकाचार थे. हमारे घर में तरह-तरह के कलाकार आते थे, घर में खुला माहौल था. मैं फिल्म इंडस्ट्री में हूं, लेकिन इस इंडस्ट्री के अपने सभी दोस्तों के लिए मैं कुछ हद तक बाहरी हूं और मेरे सभी बाहरी दोस्तों के लिए मैं फिल्म इंडस्ट्री की बच्ची हूं. लेकिन मेरे लिए यह हमेशा फिफ्टी-फिफ्टी का मामला रहा है.
करण: मैं नहीं समझता कि किसी फिल्मी परिवार का कोई भी बच्चा दिबाकर या अनुराग बन सकता है. यह मुमकिन नहीं. मैंने उनका काम देखा और यह समझ गया कि वे इंडस्ट्री से नहीं हैं. उन्होंने अपने पिता को पंजाब के डिस्ट्रीब्यूटर से बात करते हुए नहीं सुना होगा जैसा मैंने सुना है. मैं एक छोटे फ्लैट में रहता था और हर दिन सुबह जगने पर डैडी को उस डिस्ट्रीब्यूटर से शुद्ध पंजाबी में बात करते सुनता था. ‘ड्रॉप हो गई पिच्चर!” क्यों? “क्लाइमेक्स ढीली है?” “सेकंड हाफ में ड्रॉप हो जाता है.” ‘मनडे को कलेक्शन गिर जाएंगे.” अगर मैं दिवाकर या अनुराग से पूछूं कि ब्रेकअप क्या होता है तो वे नहीं बता पाएंगे.
कभी ऐसा भी समय था कि जब भारत के डिस्ट्रीब्यूशन मैप के बारे में उसी तरह जानकारी रहती थी जैसे राजनीतिक मैप के बारे में. आज के फिल्मकारों को भी दर्शकों को उसी तरह जानने की जरूरत है?
अनुराग: मैं यह नहीं समझता कि कोई फिल्म कैसे हर जगह पहुंच सकती है. मेरा तर्क यह है कि आज की सबसे बड़ी हिट फिल्म 3 ईडियट्स (2009) रही है, जिसे 1.2 अरब वाले इस देश के 2.5 करोड़ लोगों ने ही देखा है. मैं सिर्फ यही कर सकता हूं कि ऐसी फिल्म पर काम करूं जो फ्लॉप न हो ताकि अगली फिल्म बना सकूं. जब मेरी फिल्में देश में रिलीज नहीं हो रही थीं तो मैंने पासपोर्ट बनवाया और उन्हें विदेश ले गया. 2004 के पहले तो मेरे पास पासपोर्ट भी नहीं था, मुझे अंग्रेजी बोलनी भी नहीं आती थी.
करण: फिक्की फ्रेम्स की रिसर्च बताती है कि इस देश के सिर्फ 8 से 9 फीसदी लोग सिनेमा पर खर्च करते हैं और हम अपने को फिल्मों से प्यार करने वाला मुल्क कहते हैं. ऐसा कतई नहीं है. चुनौती तो बाकी 90 फीसदी लोगों को सिनेमा घरों तक लाने की है.
पहले की तुलना में आज फिल्में बनाना आसान हो गया है?
अनुराग: मैं जो भी बनाना चाहता हूं उसके लिए हमेशा खुद को आजाद महसूस करता रहा हूं. यह काफी आसान है. मुझे कम जूझना पड़ा है.
करण: इस समय भी कम से कम 1,500 प्रतिभावान लोग अपनी मेज पर जबरदस्त स्क्रिप्ट लेकर बैठे होंगे. इनमें से कितनों की किस्मत अनुराग और दिवाकर जैसी होगी? कुछ हद तक किस्मत हम पर मेहरबान रही है.
दिवाकर: आज भारत में फिल्म बनाना दुनिया की किसी भी अन्य जगह के मुकाबले आसान है. यह निर्देशकों के लिए अच्छा समय है.
फिल्में देखने के अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताएं.
अनुराग: हमें एक बड़ी सफेद दीवार के ऊपर प्रोजेक्टर से फिल्म दिखाई जाती थी. हम सब बच्चे फर्श पर आगे की तरफ बैठे रहते और हमारे मां-बाप कुर्सियों पर. इस तरह करीब 100-150 लोगों ने एक फिल्म देखी. इस तरह मैंने हिंदी फिल्में देखी हैं. हमने इसके लिए पैसा भी नहीं दिया था.
करण: मैं शुक्रवार को रिलीज होने वाली हर हिंदी फिल्म देखता था, यहां तक कि श्याम बेनेगल, गोविंद निहलाणी और केतन मेहता की फिल्में भी. गुरुदत्त की फिल्में मुझे खासतौर से प्रेरित करती थीं क्योंकि मुझे ट्रेजडी पसंद थी. यश चोपड़ा की ग्लैमर वाली दुनिया पसंद थी और यहां तक कि उन्होंने जब दीवार (1975) जैसे मर्दों के टकराव वाले रास्ते को चुना तो इसका भी मैंने मजा लिया.
दिवाकर: बचपन में मेरे ऊपर सबसे ज्यादा दूरदर्शन का असर था. मैं दिल्ली में रहता था, जहां इंटरनेशल फिल्म फेस्टिवल होता था, इसके गोवा जाने से पहले. मुझे कई क्लासिक और समकालीन अंतरराष्ट्रीय सिनेमा देखने का मौका मिला, भले मैं यह नहीं जानता था कि यह सब क्या है.
सिनेमा के 100 साल को डिफाइन करने वाला डायलॉग?
अनुराग: वह डायलॉग है, “गब्बर को एक ही आदमी मार सकता है, खुद गब्बर (शोले, 1975).” यह जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है.
करण: एक डायलॉग हम हर समय सुनते रहे हैं, “मेरे पास मां है.”
दिवाकर: मैं सिर्फ यही कह सकता हूं, “तेरा क्या होगा कालिया? (शोले)”.
ऐसी फिल्म जिसके बारे में सोचते हैं कि काश आपने बनाई होती.
अनुराग: मैं उड़ान (2010) के लिए ऐसा हमेशा महसूस करता रहा हूं.
करण: मैं कभी नहीं सोचता कि काश मैंने फलां फिल्म बनाई होती.
जोया: शोले मेरी पसंदीदा फिल्म है, बेशक यही बनाना चाहती.
दिवाकर: मैं शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) बनाना चाहता.
अनुराग: बैंडिट क्वीन (1994) न बनी होती तो राम गोपाल वर्मा सत्या (1998) भी नहीं बना पाते.

