सर सैय्यद अहमद खां
प्रधान संपादक: अखिलेश
इस अंक के लेखक: वीरेंद्र कुमार बरनवाल
18/201, इंदिरा नगर लखनऊ -226016,
कीमत: 30 रु.
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सदमे उठाए, रंज सहे, गालियां सुनीं, लेकिन न छोड़ा कौम के खादिम ने अपना काम, दिखला दिया जमाने को जोरे दिलो-दिमाग, बता दिया कि करते हैं यों करने वाले काम. अकबर इलाहाबादी ने ये शेर उस शख्स की तारीफ में अर्ज किए थे, जिसे दुनिया सर सैय्यद अहमद खां के नाम से जानती है और जिसके जीवन और कृतित्व पर केंद्रित एक लघु पत्रिका के रूप में तद्भव की विशेष प्रस्तुति जनवरी अंक के साथ प्रकाशित हुई है. नाम है: ''मुस्लिम नवजागरण की मशाल: सर सैय्यद अहमद खां.” लेखक हैं, 'जिन्ना: एक पुनर्दृष्टि’ सरीखी किताब के लेखक वीरेंद्र कुमार बरनवाल.
उनकी बुनियादी प्रस्थापना ही यह है कि सर सैय्यद अहमद खां वह सेतु हैं, जिनसे होकर हिंदुस्तान के रूढिग़्रस्त मुसलमानों के लिए ज्ञान, शिक्षा और पश्चिमी आधुनिकता के दरवाजे खुले. शुरुआत सर सैय्यद के जन्म, परिवार और बचपन से होती है और यह सफर उनके क्रांतिकारी संघर्ष, आलोचनाओं और आर्थिक संकटों के बावजूद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना और एक कौम के सांस्कृतिक, बौद्घिक विकास के लिए लगातार किए जा रहे उनके प्रयासों की कहानी सुनाता है.
यह महज सर सैय्यद का सफर भर नहीं है, बल्कि उस दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक उथल-पुथल और बदलावों का इतिहास भी है. आजादी के पहले ब्रिटिश हिंदुस्तान में काम करना और भी चुनौतियों भरा था. न सिर्फ अपनी कौम की रुढ़िवादी सोच, बहुसंख्यक समाज, बल्कि सत्तासीन वर्ग का रवैया भी बहुत सहयोगपूर्ण नहीं था.
अनेक दुर्लभ सूचनाओं और दस्तावेजों से भरी यह लघु पत्रिका अपने आप में संग्रहणीय है. तद्भव ने इस दृष्टि से बहुत महत्वूपर्ण और सराहनीय काम किया है. सर सैय्यद के जीवन पर इतने फोकस तरीके से शायद इसके पहले लिखा भी नहीं गया. पत्रिका को पढ़ते हुए यह यकीन भी पुरजोर हो जाता है कि श्री बरनवाल से बेहतर इस काम को भला और कौन कर सकता था.

