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परवेज रसूल: घाटी से उभरा क्रिकेट स्टार

किट बैग में आरडीएक्स के अंश पाए जाने के बेबुनियाद आरोपों को पीछे छोड़ चुका यह ऑफ स्पिनर अब टीम इंडिया में आने की जद्दोजहद में जुटा. बेदी से लेकर आश्विन और धोनी इनके प्रशंसक.

परवेज़ रसूल
परवेज़ रसूल
अपडेटेड 12 मार्च , 2013

कश्मीरी क्रिकेटर परवेज़ रसूल को एक लम्हे ने जिंदगी भर के लिए हीरो बना दिया. जम्मू-कश्मीर में अनंतनाग जिले के 24 साल के ऑफ -स्पिनर ने टेस्ट सीरीज से पहले इंडिया ए की तरफ से अभ्यास मैच में 12 फरवरी को 7 विकेट चटका कर ऑस्ट्रेलिया को धूल चटाई. यहीं से उसकी जिंदगी ने एक जबरदस्त मोड़ ले लिया. उसके घर लौटने से पहले ही दोस्तों और घरवालों ने उसे ऑनलाइन और फोन पर होशियार कर दिया था कि उसका जबरदस्त स्वागत होने वाला है.

सैकड़ों लोग अनंतनाग जिले के छोटे-से कस्बे बिजबेहड़ा की सड़कों पर पलकें बिछाए खड़े थे. ढोल-नगाड़ों के बीच उन्हें कंधों पर उठाकर ले जाया गया. बच्चे उनसे मिलने और ऑटोग्राफ लेने को बेताब थे और उनके मां-बाप चाह रहे थे कि उनके बेटे-बेटियां उससे प्रेरणा लें. रसूल आइपीएल के इस सीजन के लिए पुणे वॉरियर्स की टीम में चुने गए हैं और अब उनकी निगाहें टीम इंडिया पर हैं. वे बताते हैं, ‘‘मुझे कितने ही ऐसे कश्मीरियों के संदेश मिले हैं, जिन्होंने कहा है कि मैं उनके बच्चों के लिए प्रेरणा बन गया हूं. वे मेरे जैसा बनना चाहते हैं. लोगों के लिए प्रेरणा बनने में अच्छा महसूस होता है, लेकिन अभी तो मुझे खुद लंबा फासला तय करना है.’’Rasool

रसूल इंडिया ए के लिए खेलने वाले कश्मीर के पहले खिलाड़ी बन गए हैं. यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है. श्रीनगर में 1983 में भारत-वेस्टइंडीज के मैच की यादें अभी तक ताजा हैं. दर्शकों ने पाकिस्तानी झंडे लहराते हुए भारत विरोधी नारे लगाए थे और भारतीय खिलाडिय़ों को गालियां दी थीं. वेस्टइंडीज के खिलाडिय़ों के बल्ले से निकले हर शॉट पर तालियां बजती थीं, जिससे वे हैरान थे. आखिरकर मैच भी वेस्टइंडीज ने जीता. उसके बाद 1986 में वनडे सीरीज का एक मैच भारत और ऑस्ट्रेलिया ने यहां खेला. फिर कभी कश्मीर में कोई अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं हुआ.

अनंतनाग जिले से निकले एक बेहतरीन क्रिकेटर गुलाम रसूल के बेटे परवेज़ के कोच अब्दुल कय्यूम खुद जम्मू-कश्मीर के बेहतरीन तेज गेंदबाज हैं. रसूल को अब देश का एक बेहतरीन स्पिनर माना जा रहा है. इस रणजी सीजन में सात मैचों में 594 रन बनाने और 33 विकेट लेने के बाद ऑस्ट्रेलिया के साथ मैच में 45 रन देकर सात विकेट हासिल करने से पता चलता है कि रसूल अचानक लोगों की नजरों में कैसे आ गए.

उसके चयन के पीछे राजनैतिक पक्षपात की अटकलों से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बहुत नाराज हैं. उन्होंने 21 फरवरी को ट्वीट किया, ‘‘यह परवेज़ और उसकी पूरी जिंदगी की मेहनत की ही बेइज्जती नहीं है, बल्कि कश्मीर के लोगों की भी बेइज्जती है, जो खोखले आदर्श नहीं चाहते. परवेज़ रसूल को टीम इंडिया में जगह तभी मिलनी चाहिए, जब चयनकर्ता उसे इसका हकदार मानें.’’

रातोरात मिली इस शोहरत का रसूल पर कोई असर नहीं है. वे करीब डेढ़ महीने घर से दूर रहे और आने वाले सीजन में भी बहुत व्यस्त रहने वाले हैं. इस बीच उन्हें दोस्तों के साथ चाय पर गपशप करने और उनकी जुटाई अखबारों की कतरने पढऩे का वक्त मिल गया है. वे बताते हैं, ‘‘लोग मेरे बारे में बात करते हैं, क्योंकि मैं घाटी से आया हूं. भारतीय टीम में ऐसे तमाम खिलाड़ी हैं, जो छोटे शहरों से आते हैं. मैं भी उनमें से एक हूं और अपनी मेहनत से आगे आया हूं. मुझे पता है, लोग मुझे इस तरह का पहला कश्मीरी क्रिकेटर कह रहे हैं, लेकिन एक दिन मुझे अपना नाम भारत के बेहतरीन ऑल राउंडर्स में लिखाना है, जिसे लोग उसके राज्य की वजह से नहीं, उसके हुनर की वजह से पसंद करें और इज्जत दें.’’

कठिन शुरुआत
लेकिन 18 अक्तूबर, 2009 को यह मंजिल दूर दिखाई देती थी, जब रसूल को इस इल्जाम में 24 घंटे तक बंगलुरू पुलिस के सवालों का जवाब देना पड़ा कि उसके किट बैग में आरडीएक्स के अंश कहां से आए? उस समय वह अंडर-22 टूर्नामेंट में जम्मू-कश्मीर से खेल रहा था. इस घटना ने उसे कुछ देर के लिए हिला दिया, लेकिन उसने हार नहीं मानी.

उसके शब्दों में, ‘‘मीडिया को समझना चाहिए कि मैं इस इल्जाम से इसलिए बरी नहीं हुआ कि मेरी किस्मत अच्छी थी, बल्कि पुलिस से चूक हुई थी. उनकी मशीन में खराबी थी, जिसके लिए उन्होंने मुझसे माफी मांगी. मैंने यह सब अपने दिमाग से निकाल दिया है लेकिन सब बार-बार मुझसे इसके बारे में सवाल पूछते हैं. वह 2009 की बात थी, आज 2013 है. मुझे इससे चिढ़ होती है. हर कोई मुझे यह अहसास क्यों दिलाता रहता है कि मेरा कोई अतीत है? प्लीज़. मेरा कोई अतीत नहीं है. मेरी नजरें अब एक शानदार मुस्तकबिल पर टिकी हैं.’’

फिरकी का किस्सा
बल्ले बनाने वाली विलो लकड़ी के लिए मशहूर कश्मीर के बाशिंदे रसूल की तमन्ना बल्लेबाज बनने की थी, लेकिन भारत के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी के एक वाक्य ने उनकी जिंदगी बदल दी. वे बताते हैं, ‘‘बेदी सर ने पिछली जुलाई में मुझे गेंदबाजी करते देखा तो मुझसे कहा कि मैं पूरे सूबे का सबसे अच्छा ऑफ स्पिनर हूं.

उन्होंने कहा कि मेहनत करोगे तो बहुत नाम पाओगे. तुम्हें कहां तक जाना है, खुद तय करो. मैं उस रात सो नहीं सका. वे दुनिया के बेहतरीन स्पिनर थे और भारत के कप्तान रह चुके हैं. उन्होंने यूं ही तो नहीं कह दिया होगा. उनकी बात सुनकर मुझे गेंदबाजी पर गंभीरता से सोचने की प्रेरणा मिली.’’ बेदी कहते हैं, ‘‘परवेज में अच्छी बात है कि ऑफ स्पिनर के नाते उसका एक्शन बहुत साफ है और एक अच्छी स्टॉक डिलीवरी भी है. वह उम्दा ऑल राउंड क्रिकेटर है.’’

मेहनत का फल
रसूल ने अभी सोचा नहीं है कि आइपीएल से मिले 20 लाख रु. का क्या करेंगे? फिलहाल तो उन्हें  एक सफेद स्विफ्ट कार खरीदनी है. एक बड़ा घर? बाद में सोचेंगे. पर इतना तय है कि वे कश्मीर से बाहर कभी नहीं बसेंगे क्योंकि उसका सारा संघर्ष यहीं से जुड़ा है. बचपन में उसे मैट वाली विकेट से काम चलाना पड़ता था. साल के 6 महीने तो मौसम की भेंट चढ़ जाते थे, फिर बार-बार कर्फ्यू. वे बताते हैं, ‘‘कर्फ्यू हटते ही पास के मैदान में जाकर अभ्यास करता था. हां, बेहद कम सुविधाएं और बुनियादी चीजें भी न होने से मुश्किल तो होती थी.’’ इम्तहान के दौरान ही क्रिकेट का सीजन होता था, सो पढ़ाई चौपट रहती थी. ‘‘पढ़ाई में मैं अच्छा था लेकिन कई बार इम्तहान नहीं दे पाया. आखिरकार ग्रेजुएट हो गया.’’ उन्होंने बिजबेहड़ा कॉलेज से बीए किया है.

जम्मू-कश्मीर की टीम के उसके साथियों ने उसका नाम पैरी से बदलकर इंडिया कर दिया है. लेकिन उनके शब्दों में, ‘‘यह असल में उपनाम की आड़ में मजाक उड़ाने का तरीका है. पर अच्छा लगता है मुझे. यह मुझे मेरा मकसद याद दिलाता रहता है.’’ रसूल को क्रिकेट खेलने की प्रेरणा देने वाले जम्मू-कश्मीर के कोच कय्यूम बहुत खुश हैं, ‘‘मैं इसे अपनी जीत मानता हूं. मैं चाहता हूं, वह इंडिया के लिए खेले, वह इसका हकदार है.’’

टीम इंडिया के साथ प्रैक्टिस बॉलर के नाते ट्रेनिंग का स्वाद चखने के बाद रसूल की चाहत अब और भी बढ़ गई है, ‘‘भारतीय टीम की बस में सफर करना, उनके साथ लंच और नाश्ता करना, सब एकदम सपने जैसा था. रविचंद्रन आश्विन ने मेरे पास आकर पूछा, ‘तुम परवेज रसूल हो? हाय! मैं आश्विन. तुम्हारा सीजन बहुत अच्छा रहा. अच्छी गेंदबाजी की. मैंने तुम्हारे कुछ विकेट देखे, मुझे बहुत अच्छा लगा.’’

रसूल आगे जोड़ते हैं, ‘‘एम.एस. धोनी ने मुझसे कहा कि नेट्स के दौरान फील्ड का खाका दिमाग में रखकर उन्हें गेंद डालूं. मैंने जब अपनी लाइन लेकर गेंद फेंकी तो उन्होंने मेरी तारीफ की. जिंदगी में इतना अच्छा कभी महसूस नहीं हुआ.’’ ऑस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों से मिली तारीफ ने भी दिल खुश कर दिया. ऑस्ट्रेलियाई अंदाज की आधे-अधूरे ढंग से नकल करते हुए वे बताते हैं कि नाथन लियॉन और पीटर सिडल कहने लगे, ‘‘दोस्त, बहुत अच्छी बॉलिंग की तुमने. बहुत खूब. अच्छे बॉलर हो.’’

पर रसूल को अभी सुकून कहां? उन्हें अभी अपने आदर्श सचिन तेंडुलकर से मिलना है और एक बार फिर टीम इंडिया से जुडऩा चाहते हैं. इस दफा मेहमान की तरह नहीं, उसका सदस्य बनकर.

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