पहल-91
ज्ञानरंजन/राजकुमार केसवानी
पहल, 101, रामनगर, आधार ताल, जबलपुर,
कीमत: 50 रु.
editorpahal@gmail.com
पहल के निकलने की शुरुआत आपातकाल के आसपास हुई थी और कुल 90 अंक निकालकर 2008 में इसके प्रकाशन पर पूर्णविराम टांक दिया गया था. साढ़े तीन साल के बाद अंक 91 के साथ इसका पुनर्प्रकाशन शुरू हुआ है. इस अंक को पढ़ते-देखते कहा जा सकता है कि 75 पार के ज्ञान रंजन ने अपनी सारी शक्ति पहल लगातार छपती रहे, इसी में लगा दी है.
कभी उन्होंने कहा था कि ''मेरी जो एक प्रकृति है उसके भीतर एक ऊब है. वैसे मैं एक मॉडर्न मैन हूं, हर नई चीज के प्रति उत्साहित रहता हूं. सबसे पहले लपककर नई चीजें ग्रहण करता हूं.” इस अंक में यह दिखता भी है. गोपाल प्रधान ने 'इक्कीसवीं सदी में माक्र्सवाद’ लेख में सोवियत संघ के विघटन के बाद माक्र्सवाद विरोध कितना धीमा/तेज हुआ है, इसका विश्लेषण किया है.
भारतीय सिनेमा के सौ साल के मौके पर त्याना षुर्लेई के लेख 'फिल्मी जादू फिल्मी धोखा, फिल्मी वास्तविकता’ में आब्जेक्टिविटी है. वे लिखती हैं, ''पश्चिम के लिए फिल्म की दुनिया वास्तव में थोड़ी बेकार होती है. तथापि भारतीय, जिनके लिए वास्तव सिर्फ माया होती है, सिनेमा में सच ढूंढ़ते हैं.”
दिपेंद्रु चक्रवर्ती के 1986 में बांग्ला में लिखे लेख के हिंदी अनुवाद 'शक्तिपूजा की नव्य संस्कृति’ को पहल विशेष-1 उपशीर्षक से छापा गया है, जिसमें आज के राजनीतिक जीवन के समय-संदर्भ को भी जोड़कर देखा जाना चाहिए. अमीर खां के बहाने यतींद्र मिश्र ने शास्त्रीय संगीत में लोगों की घटती रुचि पर चिंता जाहिर की है. इस अंक की चार क हानियों में अल्पना मिश्र और नैयर मस्ऊद की कहानियां ध्यान से पढ़े जाने का आग्रह करती हैं तो देवीप्रसाद मिश्र और चंदन पांडे अपने शिल्प के कारण चौंकाते हैं.
काफी दिनों बाद राजेश जोशी की बेहतरीन कविताएं पढऩे को मिलीं. कुल 280 पन्नों में शामिल रचनाओं में संपादकीय का सच ध्वनित है, ''जीवित परंपराओं से लेकर अज्ञात भविष्यों तक की पहचान और समर्थन पहल की कोशिशों का स्थायी भाव है.”

