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गर्ल बैंड: खामोश कि लब गुलाम हैं तेरे

फतवे के बाद कश्मीर में लड़कियों के एक बैंड को खामोश कर दिया गया. अभिव्यक्ति पर पाबंदी का यह सिलसिला कहां खत्म होगा?

प्रगाश बैंड
प्रगाश बैंड
अपडेटेड 16 फ़रवरी , 2013

कश्मीर के श्रीनगर में डल झील के किनारे का यह हिस्सा 25 अगस्त, 2012 को कुछ ज्यादा ही खूबसूरत दिखाई दे रहा था. 16 साल की नोमा नजीर अपनी सबसे अच्छी सहेलियों—16 वर्षीया अनीका खालिद और 15 वर्षीया फरह दीबा—के साथ मिलकर उमंग से झूम रही थी. पास से गुजरने वाले लोग उन्हें देखकर जैसे वहीं जम से गए थे. कुछ लोग तो इतने मुग्ध हो गए थे कि वे ड्रम और हवाइयन गिटारों की धुन पर अपने पैर भी थिरकाने लगे थे.

लेकिन चहकने वाली तीनों लड़कियों को बड़ी बेरहमी से खामोश कर दिया गया. उनके मधुर सुरों को बंद करने के लिए किसी एके-47 राइफल का इस्तेमाल नहीं किया गया, जो कश्मीरी आतंकवादियों का पसंदीदा हथियार रहा है. इसकी जगह फेसबुक और ट्विटर के जरिए इन स्कूली लड़कियों को मौत और बलात्कार की धमकियां देकर उन्हें चुप करा दिया गया.

3 फरवरी को 75 वर्षीय बशीरुद्दीन अहमद ने वहाबी आचार संहिता के आधार पर उनके खिलाफ एक फतवा जारी किया, जिसमें संगीत और नृत्य की मनाही की गई थी. बदरुद्दीन कश्मीर में खुद को ''ग्रैंड मुफ्ती और इस्लामी शरीयत के सुप्रीम कोर्ट का संरक्षक'' बताते हैं. उन्होंने लड़कियों और उनके परिवारवालों को सलाह या कहें, चेतावनी दी कि वे उस 'मर्यादा के भीतर' रहें जो उनके लिए बनाई गई है.

इन लड़कियों ने जनवरी, 2012 में जब 'प्रगाश' (कश्मीरी भाषा में इसका अर्थ है, पहली रोशनी, या सुबह के समय अंधकार से धीरे-धीरे रोशनी की ओर जाना) नाम से लड़कियों का सूफी रॉक बैंड बनाया था, तो उनके मन में इस मर्यादा के उल्लंघन की कोई बात ही नहीं थी. श्रीनगर के प्रजेंटेशन कॉन्वेंट में पढऩे वाली इन तीन टीन एज लड़कियों ने 24 दिसंबर, 2012 को जब अपना पहला कार्यक्रम पेश किया तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए. उन्होंने बड़े मनमोहक सुर में बुल्ले शाह का एक सूफी गीत मैं हूं बड़ी मुश्किल में, नजर तो कर ले पेश किया था. सीआरपीएफ द्वारा आर्थिक सहायता पाने वाले श्रीनगर स्थित सांस्कृतिक ग्रुप वैली यूथ एक्सप्रेशन की ओर से आयोजित वार्षिक संगीत कार्यक्रम 'बैटिल ऑफ द बैंड्स' में इन लड़कियों को उनकी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए पुरस्कृत किया गया था. अपनी सफलता से उत्साहित फरह ने अपने ग्रुप के फेसबुक पेज पर लिखा था, ''यह बैंड की जंग, 'दिग्गजों का संघर्ष था. '' (फेसबुक से उनकी सारी सामग्री को हटा दिया गया है).

उनकी प्रस्तुति के मात्र 48 घंटों बाद फेसबुक पर एक पेज दिखाई दिया, जिसमें उनके बैंड की तस्वीर दी गई थी. पेज में इन लड़कियों को ''बेहया और बिगड़ी हुई'' बताकर उनके बारे में लोगों की टिप्पणियां मांगी गई थीं. स्थानीय लोकप्रिय वेब पोर्टल कश्मीर न्यूज पर प्रधानता के साथ पेश एक आलोचनात्मक, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से अहानिकर टिप्पणी ने लोगों को ऐसा भड़काया कि लड़कियों के खिलाफ तरह-तरह की अपमानजनक धमकियों और उलाहनों की झड़ी लग गई.

बहुत से लोगों ने लड़कियों को गैंग रेप और मौत तक की धमकियां दे रखी थीं. एक ने लिखा था, ''इनके साथ भी वैसा ही होना चाहिए जो दिल्ली वाली लड़की के साथ हुआ. '' एक ने लिखा था, ''पहले से ही लिख दो. बैंड की तीन लड़कियों का जम्मू में बलात्कार हुआ और फिर उन्हें नदी में फेंक दिया गया. ''

प्रगाश के मेंटर और मैनेजर अदनान मट्टू कहते हैं, ''उन्होंने पहले मुझे निशाना बनाया और फिर लड़कियों को लताडऩे लगे. '' वे श्रीनगर में अपने संगीत स्कूल बैंड इन में लोगों को संगीत सिखाते हैं. उन्होंने टीवी वालों को बताया, ''लड़कियों ने रोते हुए मुझे फोन किया. उनके वालदैन भी घबराए हुए थे. ''

महीनेभर से ज्यादा समय तक यह बहस फेसबुक और ट्विटर पर प्रगाश के विरोधियों और उसके समर्थकों के बीच चलती रही. लेकिन एक वेब पत्रिका दकश्मीरवाला. कॉम ने कश्मीर में लड़कियों की पहली और एकमात्र बैंड के लिए मौत का आखिरी फरमान सुनाने का काम किया. इस वेब पत्रिका को फहद शाह नाम का एक पत्रकार चलाता है, जो कश्मीर को 'भारत नियंत्रित कश्मीर' कहना पसंद करता है. 1 फरवरी को शाह का लेख छपा, जिसमें बताया गया कि लड़कियों ने 'बैंड बंद करने का फैसला किया' है. इस खबर के बाद अखबारों और टीवी रिपोर्टरों ने इस नवजात बैंड को बहस के केंद्र में पहुंचा दिया. शाह ने बाद में इंडिया टुडे को बताया, ''मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह बात यहां तक पहुंच जाएगी. ''

ग्रैंड मुफ्ती बशीरुद्दीन की ओर से 3 फरवरी को फतवा जारी करने के दो दिन बाद ही इंटरनेट पर हुए हंगामे के कारण पहले से ही सहमी लड़कियों ने निजी तौर पर उन्हें बताया कि उन्होंने अपना बैंड खत्म करने का फैसला किया. उन्हें यह फैसला तब करना पड़ा, जब अलगाववादी महिला संगठन दुख्तरान-ए-मिल्लत ने भी सार्वजनिक तौर पर उन पर पाबंदी लगाने की बात का समर्थन किया. 2001 में दुख्तरान पर इस्लामी आचार संहिता का पालन न करने वाली महिलाओं पर तेजाब फेंकने का आरोप था. सूत्रों का कहना है कि दुख्तरान की मुखिया आसिया अंदराबी निजी तौर पर बैंड के सदस्यों के घर गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस बैंड की लड़कियां फतवे का पालन करें.

पिछले अगस्त में डल बुलवर्ड में नोमा ने बैंड की आलोचनाओं को बड़े आत्मविश्वास से खारिज किया था. उसने कहा था, ''कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं, लेकिन आलोचना तो सभी की होती है. '' शायरी और मौसिकी का शौक रखने वाली स्कूल की यह छोटी-सी लड़की उन मुल्लाओं और साइबर दुनिया के अनदेखे जालिमों की धमकियों की वजह से खामोश हो गई है, जिन्हें  वह कभी नाराज नहीं करना चाहती थी.

उसी की तरह डरी हुई लेकिन परिवार के साथ बंगलुरू आ जाने से खुद को सुरक्षित महसूस करने वाली अनीका कहती है कि उसे ''अब संगीत या रॉक बैंड में कोई रुचि नहीं है. '' वह अपना दुख छिपाने की कोशिश करती हुई कहती है कि तीनों लड़कियां ''ग्रैंड मुफ्ती की इज्जत'' करने की वजह से संगीत छोडऩे के लिए तैयार हो गई थीं.

उनका फैसला बशीरुद्दीन के लिए बड़े फख्र की बात थी. वे समय-समय पर फतवा जारी करने के लिए जाने जाते हैं. 2007 में उन्होंने कांग्रेस के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के खिलाफ एक फतवा जारी किया था, क्योंकि आजाद ने लोगों से महात्मा गांधी का अनुसरण करने की सलाह दी थी. 2012 के शुरू में बशीरुद्दीन ने चार ईसाई मिशनरियों को बाहर निकालने का हुक्म दिया था, क्योंकि मिशनरियों पर धर्म परिवर्तन कराने का आरोप था. उसी साल बाद में उन्होंने इंटरनेट पर इस्लाम विरोधी वीडियो प्रसारित करने के आरोप में  अमेरिकी नागरिकों पर पाबंदी लगाने का हुक्म दिया था. कथित तौर पर भारत सरकार से पैसा पाने वाले बशीरुद्दीन की कभी-कभी प्रकाशित होने वाली धार्मिक पत्रिका मीर-ए-कारवां में राज्य सरकार की ओर विज्ञापन दिए जाते हैं.

श्रीनगर में होने वाली इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से देशभर में नाराजगी की लहर दौड़ गई. फिल्म निर्देशक महेश भट्ट भी इससे खासे विचलित हैं. वे पूछते हैं, ''इस देश में कानून का राज चलेगा या हम लोगों को मुठ्ठीभर लोगों की सनक का बंदी बनकर रहना होगा? '' वे लड़कियों के साथ होने वाले अन्याय से दुखी होकर कहते हैं, ''15 और 16 साल की ये बच्चियां जानती हैं कि सरकार कभी भी उन्हें बचाने के लिए नहीं आएगी. ''

उनके ट्वीट में कहा गया कि कुछ ''बेवकूफ लोग'' लड़कियों के एक प्रतिभाशाली बैंड को खामोश नहीं करा सकते. लेकिन इस तरह के प्रोत्साहित करने वाले ट्वीट के बावजूद बेबाकी से बोलने वाले युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की ओर से भरोसा जगाने वाला कोई आश्वासन नहीं आया. किशोर लड़कियों से खुद मिलने की सलाह को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ लड़कियां या उनके परिवारवाले ही इस बात का फैसला कर सकते हैं कि उन्हें गाना जारी रखना चाहिए या नहीं. बताते हैं कि इससे पहले उन्होंने एक ट्विटर संदेश दिया था जिसमें उन लड़कियों को मुफ्ती के फतवे को ''नजरअंदाज'' करने की सलाह दी गई थी, लेकिन बाद में अपनी सलाह कथित रूप से वापस ले ली.

कश्मीर में जन्मे फिल्म अभिनेता आमिर बशीर काफी नाराज थे. उन्होंने टीवी पर होने वाली एक बहस में जोर देकर पूछा, ''इसका क्या मतलब है कि यह लड़कियों पर निर्भर है? अगर कोई धमकी दे रहा है और जान से मारने की धमकी दे रहा है तो आप अब किस बात का इंतजार कर रहे हैं. '' लेकिन एक बार फिर बीच का सुरक्षित रास्ता अपनाते हुए अब्दुल्ला की पुलिस ने बशीरुद्दीन को बचाते हुए धमकी देने के जुर्म में गुमनाम लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर लिया.

कुछ लोगों की गिरफ्तारी के बाद अब्दुल्ला ने बृहस्पतिवार को कहा, ''लड़कियों को ऑनलाइन धमकी देने वाले लोगों को बख्शा नहीं जाएगा. '' सीपीएम की नेता वृंदा करात कहती हैं कि केंद्र सरकार नोमा और उसकी सहेलियों को सुरक्षा मुहैया कराने के मामले में विफल रही है. वे कहती हैं, ''कश्मीर के बारे में कोई राजनैतिक बहस न होने वाले माहौल के कारण ही ऐसा वातावरण पैदा होता है, जिसमें कठमुल्ला ताकतें लोगों पर अपना हुक्म चला सकती हैं. ''

कश्मीर की सूफी परंपरा में अटूट विश्वास रखने वाली पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती का कहना है,  ''यहां की औरतें तब भी बुरका नहीं पहनती थीं, जब आतंकवाद अपने चरम पर था. '' लेकिन इस मामले से शायद वे भी हिल गई हैं. वे कहती हैं, ''यह सरकार की समस्या है. उसे ही इसे सुलझना चाहिए. ''

हिंदुस्तानी गायिका शुभा मुद्गल का मानना है कि ''परंपरा कभी ठहरती नहीं है. और नियम कभी थोपे नहीं जा सकते हैं. '' लेकिन श्रीनगर में उस व्यक्ति द्वारा नियमों को थोपा जा रहा है, जो बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं और कहते हैं कि महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय के लिए पुरुषों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. बशीरुद्दीन ने 5 फरवरी को रिपोर्टरों से कहा, ''अगर वे चाहें तो अपनी माताओं और बहनों के सामने नाच और गा सकती हैं. ''

अनीका कहती है कि वह अभी छोटी है, इसलिए उसे नहीं मालूम कि संगीत गैर-इस्लामी है, जैसा कि ग्रैंड मुफ्ती बताते हैं. लेकिन उनके जैसे 'ज्ञानी' आदमी की बदौलत इन लड़कियों ने पिछले हफ्ते समझदार होने का सबक हासिल कर लिया है.

—साथ में राहुल जयराम और नसीर गनई

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