राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 33 पर देवरी स्थित एक छोटा-सा मंदिर व्यस्त पर्यटन स्थल बन गया है. रांची-जमशेदपुर हाइवे पर स्थित इस मंदिर के आसपास के पेड़ों के इर्द-गिर्द लाल और पीले रंग के धागे लिपटे हुए हैं. यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए ये धागे बांधते हैं. यह मंदिर दुर्गा की चार हाथों वाली दुर्लभ मूर्ति के लिए मशहूर है, लेकिन स्थानीय टूरिस्ट गाइड इसे धोनी का मंदिर बताकर इसमें ग्लैमर जोड़ देते हैं.
क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी अपनी किशोरावस्था के दिनों से ही यहां आते रहे हैं. मंदिर के पुरोहित और फूल बेचने वाले 19 जनवरी को रांची में होने वाले एकदिवसीय मैच से पहले बड़ी बेसब्री से धोनी के आने का इंतजार कर रहे हैं. धोनी बता चुके हैं कि देवी दुर्गा की कृपा से ही वे जीवन में इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं. समझना मुश्किल है कि जिस शख्स का हर फैसला इतना तर्क आधारित होता है, वह इतना धार्मिक कैसे हो सकता है कि कभी-कभी पशुबलि से भी गुरेज न करे.
यही तो धोनी का अपना अलग अंदाज है. सचिन तेज रफ्तार से कार दौड़ाने का शौक पूरा करने के लिए बड़ी सुबह उठ जाते हैं. पर धोनी इतनी जल्दी नहीं उठते. वे तो सिर पर हेलमेट लगाकर अपनी हायाबुसा पर सवार होकर रांची या चेन्नै की सड़कों पर फर्राटा भरने निकलते हैं और बेचारे पुलिसवाले अपनी 100 सीसी की बाइक से उनका पीछा करने की कोशिश करते हुए बेबसी से हाथ मलते रह जाते हैं. बाद में धोनी और उनके दोस्त इसका जिक्र करके खूब हंसते हैं.
हालांकि भारतीय प्रशंसक हाल ही में घरेलू टेस्ट सीरीज में इंग्लैंड के हाथों मात खाने से आहत हैं, लेकिन धोनी को अपने जर्मन शेफर्ड कुत्ते सैम के मर जाने का कहीं ज्यादा दुख है, जिसे उन्होंने ट्विटर पर लिखकर जाहिर किया. उन्होंने अपने रिटायरमेंट के बाद सेना में जाने की इच्छा जाहिर की और लेफ्टिनेंट-कर्नल का मानद पद भी ले लिया, हालांकि उन्होंने सेना के वार्षिक परेड में हिस्सा लेने के प्रस्ताव को मना कर दिया है. वे पद्म पुरस्कार समारोह में हिस्सा न लेकर सरकार को नाराज भी कर चुके हैं, बताया जाता है कि उस समय वे विज्ञापनों में व्यस्त थे.
धोनी के कई रूप हैं. एक कप्तान, जो अपनी टीम और अपने खिलाडिय़ों का बचाव करता है और टीम के हारने पर अपने खिलाडिय़ों की खामियों को उजागर नहीं करता है बल्कि सबसे अच्छा खेलने वाले खिलाड़ी को तारीफ पाने का मौका देता है. वे 2015 के विश्व कप में अपना खिताब बचाने के लिए नई टीम तैयार करने में जी-जान से जुटे हैं, साथ ही वे टीम की कमजोर छवि को पूरी तरह बदल देने की भी कोशिश कर रहे हैं. धोनी की कनपटी के सफेद होते बाल चर्चा का विषय बन गए हैं. इस बारे में वे कहते हैं, ''यह दिमाग पर पडऩे वाले बहुत ज्यादा दबाव और ऊपर से शांत रहकर उसे जज्ब करने का नतीजा है.” लेकिन कप्तान धोनी की चिंताएं कुछ और भी हैं. उन्हें बीसीसीआइ के अध्यक्ष एन. श्रीनिवास का पूरा संरक्षण हासिल है. यह संयोग ही है कि श्रीनिवासन चेन्नै सुपर किंग्स के मालिक हैं और धोनी आइपीएल की इसी टीम के कप्तान हैं. धोनी इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में शर्मनाक हार और फिर अपने ही देश में इंग्लैंड के हाथों टेस्ट सीरीज और पाकिस्तान से वनडे सीरीज हारने के बाद भी कप्तानी बचाए रखने में कामयाब रहे हैं. इससे उन्होंने साबित कर दिया है कि उन्हें हाथ लगाने की ताकत किसी में नहीं है.
महारथियों को मात
अक्सर बड़ी जीत के लिए तरसने वाले देश को धोनी ने पहला वर्ल्ड टी20 चैंपियन बनाया, उसे ऑस्ट्रेलिया में वनडे सीरीज में दुर्लभ जीत दिलाई, श्रीलंका को पहली बार उसी की धरती पर वनडे सीरीज में मात दी, देश को टेस्ट रैकिंग में नंबर वन बनाया और सबसे बढ़कर 28 साल बाद देश को विश्व कप का तोहफा दिया. इन सब उपलब्धियों ने उन्हें भारतीय क्रिकेट की एक दिग्गज हस्ती बना दिया है.
लेकिन इसी के साथ दूसरे दिग्गज, जिनका धोनी की इन उपलब्धियों में बड़ा योगदान रहा है, धीरे-धीरे दरकिनार हो गए. सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वी.वी.एस. लक्ष्मण, सचिन तेंडुलकर और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गज खिलाड़ी जब रिटायर हुए या उन्हें टीम से हटाया गया तो इसके पीछे धोनी का नाम लिया गया. इस तरह वे न सिर्फ दिग्गज हैं बल्कि दिग्गजों को ठिकाने लगाने वाले के रूप में भी देखे जाते हैं.
गांगुली को ऑस्ट्रेलिया में 2008 की सीबी सीरीज से हटा दिया गया था, जिसके बाद बंगाल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष प्रसून मुखर्जी ने खुलेआम धोनी की भूमिका पर सवाल खड़ा किया था. सूत्रों के मुताबिक, लक्ष्मण ने न्यूजीलैंड टेस्ट सीरीज में चुने जाने के बावजूद रिटायर होने की अपनी योजना की घोषणा कर दी थी क्योंकि सूत्रों के अनुसार, धोनी ने उन्हें ऐसी घोषणा करने को बाध्य किया था. बताते हैं, धोनी ने उनके सामने शर्त रखी थी कि वे सीरीज से पहले रिटायर होने की योजना की घोषणा करें, वरना उन्हें टीम से निकाल दिया जाएगा. लक्ष्मण ने यह कहकर मामले को और भी संदिग्ध बना दिया कि वे फोन पर धोनी से बात नहीं कर सके. ठीक उसी हफ्ते उन्होंने टीम इंडिया के सदस्यों को अपने घर डिनर पर बुलाया और मेहमानों की सूची में धोनी का नाम नहीं था. सचिन तेंडुलकर ने भी अचानक वनडे अंतरराष्ट्रीय मैचों से रिटायर होने की घोषणा कर दी, जबकि कुछ पल बाद ही पाकिस्तान के खिलाफ सीरीज के लिए टीम का चुनाव होने जा रहा था. उन्होंने अपने बयान में कहा कि अब भविष्य की टीम तैयार करने का समय आ गया है. दिल्ली में तीसरे वनडे मैच के दौरान पाकिस्तान के महान क्रिकेटर हनीफ मोहम्मद ने तेंडुलकर के रिटायर होने के समय पर सवाल उठाया. उनका मानना था कि इसके पीछे जरूर कोई बात है. सहवाग और धोनी के बीच दरार की बात कई बार सामने आ चुकी है और कप्तान ने इस सलामी बल्लेबाज को टीम से बाहर का रास्ता दिखाने में हिचक नहीं दिखाई है.
उप-कप्तानों को निगलते धोनी
टीम इंडिया का मजबूत स्तंभ होने के अलावा लक्ष्मण, सहवाग, युवराज सिंह, सुरेश रैना और गौतम गंभीर के बीच एक और समानता है. वे सभी धोनी की कप्तानी के तहत उप-कप्तान रह चुके हैं और उन्होंने आइपीएल में बेहतरीन कप्तानी की मिसाल पेश करते हुए धोनी की कप्तानी को कड़ी चुनौती भी दे डाली है. अब यह महज संयोग है या कोई सोची-समझी चाल कि इन सभी को बड़े ही तरीके के साथ टीम से बाहर किया जाता रहा है.
धोनी की कप्तानी के तहत तैयार हुए सभी संभावित कप्तानों में से सिर्फ गंभीर ही खेल के सभी फॉरमेट में अपनी जगह बनाए रखने में कामयाब रहे हैं. लक्ष्मण को संन्यास लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. युवराज का टेस्ट करियर पूरी तरह खत्म हो चुका है और वनडे मैचों में भी काफी हद तक उनका करियर दांव पर है. टीम में रैना की जगह बार-बार सवालों के घेरे में आती रही है और टेस्ट में फिलहाल उन्हें वापस जगह मिलने की संभावना न के बराबर है. टेस्ट की कप्तानी के सबसे बड़े दावेदार सहवाग—जैसा चयन समिति से बाहर हो चुके मोहिंदर अमरनाथ ने दिसंबर में उजागर किया था—इंग्लैंड के खिलाफ शुरू होने वाले पहले तीन वनडे मैचों से बाहर हो चुके हैं. पूर्व चयन समिति के तहत धोनी के सबसे तगड़े प्रतिद्वंद्वी गौतम गंभीर टीम में अपनी जगह सही साबित करने के लिए जद्दोजहद करते नजर आ रहे हैं.
ऑस्ट्रेलिया से टेस्ट सीरीज हारने और चयनकर्ताओं की ओर से पहली बार कप्तानी बदले जाने के मामले पर विचार किए जाने के तुरंत बाद धोनी ने फरवरी-मार्च 2012 के दौरान ऑस्ट्रेलिया के वनडे दौरे में तेंडुलकर, सहवाग और गंभीर को बारी-बारी से खिलाए जाने का अपना मशहूर प्रयोग शुरू किया था. इसके कुछ ही दिन बाद बांग्लादेश में होने वाले एशिया कप में सहवाग को टीम से बाहर कर दिया गया और गंभीर की उप-कप्तानी छीन ली गई. अचानक विराट कोहली को उप-कप्तानी का भार दे दिया गया. सूत्रों का कहना है, यह एक सोची-समझी चाल थी कि धोनी की कप्तानी को किसी तरह का खतरा न हो क्योंकि कोहली उस वक्त कप्तानी के लिए बहुत युवा थे.
एक-व्यक्ति की चयन समिति
टीम के सूत्रों का कहना है कि धोनी वन-मैन चयन समिति हैं. यह बात इसी एक उदाहरण से साबित हो जाती है कि 2011 में इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज के दौरान किस तरह आधी-अधूरी तैयारी वाले आर.पी. सिंह को दौरे के बीच में ही टेस्ट टीम में शामिल कर लिया गया था या किस तरह पीयूष चावला कुछ खास न कर पाने के बावजूद टीम में आते-जाते रहे हैं या किस तरह रवींद्र जाडेजा एकाएक सभी फारमेट में जगह पा जाते हैं.
पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह कहते हैं, ''समस्या यह है कि धोनी ने कभी-कभार ही घरेलू क्रिकेट खेली है और वे खिलाडिय़ों को ठीक से नहीं जानते हैं. इसलिए वे कुछ ही खिलाडिय़ों को बार-बार मौका देते रहते हैं.” अंदरूनी लोगों का कहना है कि धोनी की असली ताकत श्रीनिवासन हैं, जो उन्हें पूरा समर्थन देते हैं. भारतीय क्रिकेट में इस तरह का समर्थन कोई नई बात नहीं है. गांगुली और जगमोहन डालमिया के बीच भी इसी तरह कप्तान और मुख्य प्रशासक का मजबूत रिश्ता था. इसका फायदा गांगुली को मिला.
लेकिन सितंबर, 2014 के बाद क्या होगा, जब श्रीनिवासन बीसीसीआइ की लगाम अपने किसी उत्तराधिकारी को सौंप देंगे? 2015 के फरवरी-मार्च में वर्ल्ड कप होना है, क्या उस समय भी श्रीनिवासन और धोनी की जोड़ी टीम इंडिया का भविष्य तय करेगी? क्या धोनी कड़े संघर्ष के बाद जीते गए कप को बचा पाएंगे? इसकी संभावना कम ही है कि धोनी की परीकथा में कोई बड़ा मोड़ आए.

