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समाज से कलमबद्ध मुठभेड़

देश में एक छोर से दूसरे छोर तक मैला ढोने वालों के जीवन की नारकीय यातना का दस्तावेज बनकर सामने आती है यह किताब.

अपडेटेड 19 जनवरी , 2013

अदृश्य भारत
भाषा सिंह
पेंगुइन बुक्स,
पंचशील पार्क, नई दिल्ली-17,
कीमत: 199 रु.
customer.service@in.penguingroup.com
भाषा सिंह की पुस्तक अदृश्य भारत सिर्फ मैला ढोने के बजबजाते यथार्थ से मुठभेड़ नहीं है, जैसा कि इसके शीर्षक और उप-शीर्षक से इसके आमुख पृष्ठ पर दिखाया गया है, बल्कि भारतीय समाज और उसकी मानसिकता में रची-बसी जाति व्यवस्था के कटु अनुभवों से गुजरने की कलमबद्ध मुठभेड़ है. इस सबको भाषा ने गहन संवेदना और सामाजिक यथार्थ के साथ पेश किया है.

मुठभेड़ इन अर्थों में भी है कि जब भाषा मैला ढोने के पेशे से जुड़े परिवारों से मिलती हैं तो एक सवाल अपनी पूरी नग्नता के साथ पटना से लेकर गुजरात, पश्चिम बंगाल, अंबाला, कानपुर, कश्मीर, यानी जहां-जहां लेखिका गई, वहां-वहां यह सवाल किसी-न-किसी रूप में पूछा गया, कभी सीधे-सीधे तो कभी घुमा-फिराकर—''कौन जात हो? हमारे जात की तो नहीं लगती हो.”

भाषा के लिए यह सवाल गंभीर मुद्दों और सरोकारों से जुडऩे जैसा था. लेखिका की अपनी पत्रकारिता की इस यात्रा में ऐसे अनुभव उन्हें अनेक निष्कर्षों तक ले जाते हैं और भारतीय जीवन की कटु सचाई बनकर सामने आते हैं.

भाषा ने मैला ढोने की प्रथा का सर्वेक्षण, अध्ययन, जिसे वे अदृश्य भारत कह रही हैं, 2003 से 2011 के बीच किया था. इस अध्ययन में वे जब व्यक्तिगत अनुभवों के साथ इस समस्या को देखने की कोशिश करती हैं तो सचाई के कुछ ऐसे पहलू उजागर होते हैं, जिन्हें जाने-अनजाने अनदेखा करते रहने की प्रवृत्ति दिखाई देती है.

लेखिका कहती हैं, ''यह दुनिया इतनी अदृश्य है कि मैंने खुद 33 साल की उम्र के बाद ही इसे जातिगत कुप्रथा के रूप में महसूस किया, जबकि ऐसा नहीं कि यह पहले कभी मेरे अगल-बगल नहीं रही. मेरी परवरिश के शहर लखनऊ से लेकर कानपुर, इलाहाबाद, पटना सब जगह मैला ढोने वाली औरतें रहीं और उनकी मौजूदगी से अनजान रही. सबसे पहले मैंने इसे इलाहाबाद में देखा.” (भूमिका, पृष्ठ 21)

भाषा जिस तरह से इस प्रथा के कड़वे सच को लिपिबद्ध करती हैं वह भारतीय जीवन की विद्रूप तस्वीर ही प्रस्तुत करता है: ''चाहे पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में भाटपाडा की लक्ष्मनिया हाड़ी हो या गुजरात में अहमदाबाद की पल्लवी बेन, राजस्थान में टोंक की इंदिरा, कश्मीर की रफीका या आंध्र प्रदेश की नारायणम्मा, सब अपनी-अपनी जिंदगी मैला ढोने में खर्च करने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुंचीं कि लोग उन्हें इनसान ही नहीं समझते और सरकार को वे दिखाई नहीं देते क्योंकि वह इन्हें देखना नहीं चाहती...”

अपने स्वयं के तमाम अनुभवों को भाषा ने इस किताब में पूरी सचाई और ईमानदारी से दर्ज किया है. इसीलिए इस नारकीय यातना का दस्तावेज बनकर जब यह किताब सामने आती है, सचमुच मन गहरी पीड़ा और तकलीफदेह सचाई से रू-ब-रू होता है. जिस सचाई को सिर्फ मैला ढोने वाला ही जानता था, उसे भोग रहा था, बाकी समाज उसे निरपेक्ष भाव से देखकर आगे बढ़ जाता था क्योंकि यह उसकी सोच और मानसिकता में ही नहीं था कि सफाईकर्मी भी एक इनसान है.

किताब के दूसरे भाग में भारत सरकार के बनाए गए कार्यक्रम, पुनर्वसन, कानून आदि की सचाई को भी लेखिका ने गंभीरता से अपनी इस पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है. यह बेहद प्रभावशाली बना है. समाज सिर्फ मैला ढोने के प्रति ही गहरी वितृष्णा पैदा नहीं करता बल्कि समाज की सोच, मानसिकता और व्यवस्था आदि पर भी संजीदगी से प्रश्नचिन्ह लगाता है. इस प्रथा के प्रति मन में एक गुस्सा पैदा होता है, जो पाठकों को भीतर तक हिला देता है.

यह पुस्तक भाषा सिंह के गंभीर अध्ययन और मानवीयता के प्रति उनकी पक्षधरता को पूरी गंभीरता से सामने लाती है. यह भारतीय जीवन को एक ऐसा आईना दिखाती है, जहां भारत की कलुषिता, विद्रूपता और अमानवीयता की नग्न तस्वीर उभरती है. एक बदनुमा दाग की तरह, जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था से सीधे-सीधे मुठभेड़ करती दिखाई देती है.

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