इसे बिडंबना ही कहेंगे कि जिस साल भारत ने ओलंपिक में अपनी झोली में अब तक सबसे ज्यादा मेडल डाले उसी साल 4 दिसंबर को इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (आइओसी) ने भारत की मान्यता रद्द कर दी. आइओसी ने अपने चार्टर और नियमों के उल्लंघन के कारण यह कदम उठाया है. आखिरी बार 2011 में संशोधित ओलंपिक चार्टर के अनुसार राष्ट्रीय खेल संघों की चुनाव प्रक्रिया में सरकार की ओर से कोई दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए.
भारतीय ओलंपिक संघ (आइओए) 2010 के सरकारी खेल कोड का पालन करता है. इस निलंबन के केंद्र में हैं दिग्गज खेल प्रशासक 67 वर्षीय रणधीर सिंह और आइओए के अध्यक्ष पद के लिए हरियाणा के 49 वर्षीय प्रभावशाली नेता अभय चौटाला के खिलाफ उनकी लड़ाई. आइओए की चुनावी दौड़ में चौटाला ने रणधीर के वोट काटने के लिए जोरदार लॉबिंग की थी, जिससे उन्हें निर्विरोध चुन लिया गया. उनका कहना है कि आइओसी में भारत के नामित प्रतिनिधि होने की वजह से रणधीर ने चुनाव को अमान्य करने के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल किया और आइओसी को निलंबित करा दिया.
चौटाला कहते हैं, ‘‘इस पूरी गड़बड़ी के लिए रणधीर ही जिम्मेदार हैं. वे अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.’’ उनके अनुसार, ‘‘रणधीर ने देश के खिलाफ साजिश की है. आइओसी का पदाधिकारी होते हुए उन्हें देश की मदद करनी चाहिए थी, लेकिन उनके भी कुछ अपने हित हैं.’’
रणधीर इसका खंडन करते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ‘‘ये लोग आइओसी के बारे में नहीं जानते हैं कि वह किसी एक व्यक्तिकी मर्जी से नहीं चलती है. उसके अपने नियम हैं. ये लोग उसका पालन नहीं करते हैं. यहां तक कि मुक्केबाजी में इन लोगों (चौटाला की मंडली) ने अपनी मनमानी चलाने की कोशिश की और भारतीय मुक्केबाजी संघ निलंबित हो गया. मैं जानता था समस्या खड़ी होगी. मैंने सरकार और आइओसी को पत्र भी लिखा था. जब मुझे लगा कि दिक्कत आ सकती है, तो मैं पीछे हट गया.’’
बड़ा सवाल
भारत को दो साल पहले ही निलंबित किया जा सकता था, फिर अभी क्यों?
जिस तरह से 4 दिसंबर को आइओसी को निलंबित किया गया, उससे चौटाला के आरोपों में दम लगता है. यहां तक कि जब रणधीर ने अपना नामांकन दाखिल किया, तो उन्हें पता था कि यह चुनाव सरकारी खेल कोड के तहत कराया जाएगा, जो आइओसी के नियमों के खिलाफ होगा. यह कोड विवादास्पद खेल विधेयक का संशोधित संस्करण है. इस विधेयक को सबसे पहले 1975 में लाया गया और फिर 2010 में इसे संशोधित करके इसके नियमों को लचीला कर दिया गया.
इसके अनुसार, कोई भी व्यक्तिचार साल के कार्यकाल वाले पद पर तीन बार से ज्यादा नहीं रह सकता है. इसके अलावा पदाधिकारी की उम्र की सीमा 70 साल तय कर दी गई यानी 70 साल की उम्र के बाद वह खेल संगठनों के पद पर बना नहीं रह सकता है. चुनाव के पहले रणधीर ने एसोसिएशन के हर सदस्य को इकट्ठे होकर मिलने-जुलने के लिए आमंत्रित किया था, सिर्फ पांच से सात सदस्य ही मौजूद थे.
इसके एक दिन पहले चौटाला ने अपनी उम्मीदवारी की आधिकारिक घोषणा करने के लिए ऐसा ही निमंत्रण दिया था. उनके निमंत्रण पर भारी संख्या में सदस्य उपस्थित हुए, जिनमें विवादास्पद खेल प्रशासक सुरेश कलमाडी भी शामिल थे. संदेश स्पष्ट था. रणधीर को जब लगा कि वोट जुटाने की सारी कोशिशें बेकार हो रही हैं तो उन्होंने और उनके खेमे के सदस्यों ने एक-एक करके अपने नाम वापस ले लिए. अचानक उन्हें लगने लगा कि आइओसी के नियमों का उल्लंघन हो रहा है.
फिर कथित तौर पर रणधीर ने आइओसी में अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया. जल्द ही आइओए पर दो साल से निलंबन की लटकती आ रही तलवार बिना किसी चेतावनी के गिर पड़ी. खेल मंत्रालय के अधिकारी उम्र की सीमा और उनके कार्यकाल तथा खेल संगठनों के निंदा प्रस्ताव पर अपने रुख के बारे में 2010 में आइओसी को अवगत करा चुके थे, इसके बावजूद आइओसी ने इसे सरकार की दखलंदाजी माना और अधिकारियों के स्पष्टीकरण को नामंजूर कर दिया. आइओसी ने निलंबन की धमकी देते हुए 23 नवंबर को अपना पहला पत्र भेजा था. इससे दो दिन पहले रणधीर ने नामांकन वापस लिया था. यह संयोग विचारणीय है.
मजे की बात है कि रणधीर ने पिछले साल प्रशासक के तौर पर अपना करियर खत्म करने का फैसला किया था और उन्होंने मीडिया को भावनाओं से ओत-प्रोत एक भावुकता भरा पत्र भेजा था, जिसमें उन्होंने आइओए और आइओसी को छोडऩे की इच्छा जताई थी. लेकिन आइओसी के प्रतिनिधि की सीट अपनी बेटी सुनयना कुमारी को सौंपने की उनकी इच्छा ने लोगों को भड़का दिया. अधिकारियों को लगा कि यह सीट उनके परिवार की बपौती नहीं है (उनके पिता राजा भालेंदर सिंह 45 वर्ष तक आइओसी के सदस्य रहे थे). इसके अलावा दूसरे और भी उम्मीदवार थे, जो इस पद के लिए उनकी बेटी से ज्यादा काबिलियत रखते थे. सुनयना लॉन बॉलिंग एसोसिएशन की अध्यक्ष हैं.
कलमाडी की छाया
पूर्व आइओए प्रमुख ने पुराने साथी रणधीर के खिलाफ चौटाला का इस्तेमाल किया
अपने प्रस्ताव का विरोध होने का अंदाजा होने पर रणधीर को लगा कि अच्छा यही होगा कि वे फिर से चुनाव लड़ें और अपना अधिकार कायम करें. राष्ट्रमंडल खेलों (सीडब्लूजी) के बाद जेल जा चुके और भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे सुरेश कलमाडी को मजबूरन समय पूर्व रिटायर होना पड़ा था. कलमाडी को यह मौका ठीक लगा और वे रणधीर को अध्यक्ष पद पर चुने जाने से रोकने के लिए नेपथ्य में सक्रिय हो गए.
कलमाडी और रणधीर कभी भी अच्छे दोस्त नहीं रहे. दो दशकों का उनका साथ सीडब्लूजी के बाद कड़वाहट में बदल गया. कलमाडी जहां इस बात से नाराज थे कि रणधीर खेलों में सिर्फ दिखावे की भूमिका निभा रहे थे और इसके कारण अपनी साफ छवि बनाए हुए थे, तो रणधीर को लगता था कि उन्हें किनारे कर दिया गया है.
कलमाडी को लगा कि चौटाला को रणधीर के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है. हरियाणा का यह नेता ताकत और प्रभाव के मामले में रणधीर की बराबरी का था-2000 में सिडनी ओलंपिक के दौरान उनकी शानदार पार्टी और मुक्केबाजी संघ का प्रमुख चुने जाने पर सभी मेहमानों को चांदी का उपहार बांटने के मौके को भला कौन भुला सकता है. लेकिन अब भी किसी को सुनिश्चित करना था, जो उनके पक्ष में पर्याप्त वोट डलवा सके. कलमाडी के भरोसेमंद साथी ललित भनोट, जिनके खिलाफ भी सीडब्लूजी घोटाले में चार्जशीट दाखिल की गई थी, सामने आए और उन्होंने बिचौलिए की भूमिका निभाई.
रणधीर कहते हैं कि उन्होंने कई मौकों पर इस तरह के नतीजों के बारे में आइओए को आगाह किया था. ‘‘मैंने कहा कि जब तक सभी पक्ष इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो जाते, चुनाव टाल दिया जाए, आइओए, आइओसी और सरकार साथ बैठकर इस मसले को सुलझा सकते हैं. मेरी एक नहीं सुनी.’’ वे कहते हैं कि समय आ गया है कि जिन लोगों की खेल की पृष्ठभूमि नहीं है, उन्हें बाहर करके व्यवस्था ठीक हो. रणधीर पूछते हैं, ‘‘जब आइओसी ने कहा था कि वे कोई चुनाव या बैठक नहीं कर सकते हैं तो भी वे नहीं माने. फिर कौन दोषी है.’’ यह बहस का मुद्दा है.

