खुशबू-ए-कश्मीर
मनोज शीरी
जम्मू-कश्मीर एकेडमी ऑफ आर्ट
कल्चर ऐंड लैंग्वेज
लाल मंडी, श्रीनगर
कीमत: 200 रु.
कश्मीर के सीमावर्ती कुपवाड़ा जिले में नियंत्रण रेखा के करीब स्थित लोलाब में रहने वाले राधा कृष्ण वहां के इकलौते कश्मीरी पंडित थे. पेशे से फार्मासिस्ट. एक दिन कुछ आतंकवादी अपने कमांडर का इलाज करवाने को उन्हें उठा ले गए. लौटने पर सुरक्षाबलों ने उन्हें इस बिना पर धर लिया कि उन्होंने आतंकवादियों की मदद की है. छूटने पर वे चैन की सांस लेते, उससे पहले ही आतंकवादियों ने पकड़ लिया कि कहीं उन्होंने पुलिस को कुछ बताया तो नहीं. दुश्चक्र से परेशान हो उन्होंने घर छोडऩे का फैसला किया. वे पुश्तैनी घर से निकलने को हुए, तभी गांव वाले आंगन में इकट्ठा हो गए और उनसे रुक जाने की मिन्नत की. उनका दिल भर आया और उन्होंने अपना फैसला बदल दिया.
यह कोई सच्ची दास्तां नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर के एक पुलिस अफसर मनोज शीरी के लघुकथा संग्रह खुशबू-ए-कश्मीर से ली गई एक कहानी है. कश्मीर में 1989 में अलगाववादी आंदोलन भड़कने से पहले तक कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों के बीच जैसे रिश्ते थे, उन्हें आधार बनाकर लिखी गई कहानियों का संग्रह है यह पुस्तक. पिछले दो दशक में मुसलमानों और पंडितों ने जो दर्द झेला है, खुशबू-ए-कश्मीर खांटी उर्दू में उसी का एक वृत्तांत है.
शीरीं बताते हैं, ''मैंने पंडितों और मुसलमानों के दर्द को देखा है जिन्हें रोज अपनी पहचान साबित करनी होती थी.” शीरीं बारामूला जिले के इसी नाम के छोटे-से गांव के रहने वाले हैं. कई दूसरे परिवारों की तरह वे भी जम्मू चले आए थे. वहां कुछेक साल एक अखबार में काम करते रहे, बाद में पुलिसबल में चले गए. फिलहाल वे जम्मू-कश्मीर पुलिस के प्रवक्ता पद पर हैं.
बारह कहानियों के इस संग्रह की एक और हिला देने वाली कहानी है हसरत नातमाम. 65 साल के पं. जवाहरलाल के अपने सेब के बाग थे. बाद में वे आकर जम्मू के मिश्रीवाला कैंप में रहने लगे. वे बीमार पड़े तो अस्पताल में सेब खाने की इच्छा हुई. चुपके से बाहर निकले, फल वाले ने उन्हें चोर समझकर पीट दिया. उनका एक पुराना मुसलमान नौकर उन्हीं के बगीचे के सेबों की एक टोकरी लेकर आता है, तब तक वे गुजर चुके होते हैं. अंधी मां नाम की कहानी में शीरी ने आतंकवाद की धुंध में मानवीयता के चेहरे को उजागर किया है. वे सीमांत जिले कुपवाड़ा के हंदवाड़ा इलाके के एक पंडित मोहल्ले में पाठकों को ले जाते हैं जहां एक अंधी, बेऔलाद बूढ़ी विधवा ने एक आतंकवादी को शरण दी हुई है. उसने दरिया पार करने में बुढिय़ा की मदद की थी.
आतंकवादी ने खुद को श्रीनगर का एक दुकानदार बताया था. वहां पहले दिन आतंकवादी राम और सीता की तस्वीरों पर जमी धूल को पोंछता है. वह घरेलू कामों में भी हाथ बंटाने लगता है. एक दिन पुलिस के छापे में घर से पिस्तौल बरामद होती है. महिला पुलिस से आतंकवादी को और आतंकवादी महिला को छोड़ देने को कहते हैं. अंत में पुलिस दोनों को पागल बताकर पागलखाने भेज देती है.
शीरी अपनी हर कहानी में शिद्दत से कश्मीरियत को उभारते नजर आते हैं, जो दोनों समुदायों के आपसी सद्भाव से बनी है. इतने हलचल भरे दौर में यह पुस्तक लिखने का उद्देश्य शीरी का इतना ही था कि वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच छोटे-छोटे रिश्तों को सामने ला सकें.

