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आया अब i गॉड का जमाना

आपके पापों पर हर दिन नजर रखने के लिए कन्फेशन ऐप से लेकर लाइव दर्शन और कुरान पढऩे वाला पेन तक सब मौजूद हैं. युवा भारत ने आध्यात्मिक होने के स्मार्ट तरीके खोज निकाले हैं

अपडेटेड 24 नवंबर , 2012

उनकी उम्र के ज्यादातर लोग स्मार्टफोन पर चौट करते हैं, मैसेज करते हैं या गेम खेलते हैं. लेकिन 29 वर्षीय शैलराज ब्रह्मभट्ट के लिए सैमसंग गैलेक्सी एस3 उनका चलता-फिरता धर्मगुरु है जो भजन सुनाता है, पंचांग बांचता है, दिन के शुभ मुहूर्त की जानकारी देता है और हनुमान चालीसा का पाठ करता है.

एक दर्जन से भी ज्यादा धर्म आधारित ऐप्स के साथ जुहू में रहने वाले ब्रह्मभट्ट अपने स्मार्टफोन के माध्यम से ईश्वर से ‘‘संपर्क साधे रहते हैं तथा उसे और अधिक प्रगाढ़ करते हैं.’’आइटी प्रोफेशनल ब्रह्मभट्ट बताते हैं, ‘‘जब भी मेरा मन शांत नहीं रहता, ये ऐप्स मेरे लिए सपोर्ट सिस्टम का काम करते हैं. एकल परिवारों में यह धार्मिक ऐप्स ऐसे ग्रैंड पैरेंट्स की भूमिका निभाते हैं जो आपको अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं.’’

ब्रह्मभट्ट की तरह बहुत से शिक्षित और युवा भारतीयों के लिए फोन और कंप्यूटर ईश्वर से जुडऩे के लिए हॉटलाइन साबित हो रहे हैं. वे अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं, दुआ करते हैं और भगवान की कृपादृष्टि चाहते हैं, और यह सब बस माउस की एक क्लिक या बटन दबाने से संभव है. अब प्रोफेशनल लोग वर्चुअल दुनिया में जीसस क्राइस्ट पर चर्चा कर रहे हैं, एनआरआइ गायत्री मंत्र में अपनी महारत पर सोशल मीडिया में इठला रहे हैं, युवा महिलाएं रीडिंग डिवाइस के जरिए कुरान पढ़ रही हैं और जिनके पास मंदिर जाने का समय नहीं है वे ऐप्स पर ही हवन कर देवी-देवताओं को मनाने की जुगत भिड़ा रहे हैं.Dharam

मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन सुभाष मायेकर कहते हैं, ‘‘शहरी युवाओं को इस बात का एहसास हो रहा है कि आधुनिकता और परंपरा एक साथ टिके रह सकते हैं. हर हफ्ते मंदिर आने वाले करीब 70 फीसदी भक्त 30 वर्ष से कम उम्र के होते हैं.’’ सिद्धि विनायक मंदिर ट्रस्ट अपनी वेबसाइट पर लाइव दर्शन कराता है जिसके माध्यम से भक्त अपने लैपटॉप या स्मार्टफोन पर भगवान की प्रतिमा के दर्शन कर सकते हैं.

धर्म और टेक्नोलॉजी के गठबंधन ने ईश्वर को ‘कूल’ बना दिया है. फोन पर बाइबिल अलर्ट, भगवद् गीता से हर दिन एक पद और कुरान पढऩे वाला पेन जिसमें कुरान की आयतों का ऑडियो बजता है, यह सब धार्मिकता की नई अभिव्यक्ति बन गए हैं. अपने आइपैड पर रोज सुबह भजन और पूजा ऐप्स चलाने वाली मुंबई की कॉमर्शियल आर्टिस्ट और डिजाइनर 29 वर्षीया निधि गोयल कहती हैं, ‘‘बदलते समय के हिसाब से धार्मिक अनुष्ठानों में बदलाव किया जा सकता है.’’ आप अपने स्मार्टफोन पर कन्फेशन ऐप के माध्यम से ‘‘अपने गुनाहों पर नजर रख सकते हैं’’, किसी प्रार्थना समूह से जुड़ सकते हैं और यहां तक कि भगवद् गीता भी पढ़ सकते हैं. अब भला कौन धार्मिक ग्रंथों में आंखें गड़ाए रखना या किसी तीर्थ स्थान में प्रवेश के लिए लंबी कतारों में खड़े रहना चाहता है? अब तो धर्म आसान, आसानी से पहुंच वाला और समय बचाने वाला हो गया है.

दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ में समाजशास्त्र के प्रोफेसर संजय श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘सबसे जरूरी चीज यह है कि जिसे हम ‘परंपरा’ समझते हैं वह खुद ही आधुनिकता की खोज है, इसलिए वर्चुअल आध्यात्मिकता पूरी तरह से तार्किक विकास है. आधुनिकता के हर दौर में उसकी अपनी परंपरा खोज ली जाती है.’’

अब तेजतर्रार आध्यात्मिक गुरु भी ऑनलाइन प्रवचन देने लगे हैं. पुणे के कॉर्पोरेट प्रोफेशनल से गुरु बने 34 वर्षीय नित्य शांति हर सुबह फेसबुक वॉल पर प्रेरक संदेश पोस्ट करते हैं जो उनके पेज को 10,000 से ज्यादा फॉलोअर देखते हैं. वे कहते हैं, ‘‘आज का युवा संबंधों से जुड़े कई मसलों, तनाव और बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है. उन्हें इसके लिए आध्यात्मिक गुरु की जरूरत पड़ती है.’’ उनके पेज को ‘‘लाइक’’ करने वाले ज्यादातर लोग 25 से 34 वर्ष की उम्र के हैं.Dharam

धार्मिक केंद्र भी नई पीढ़ी की जरूरत के मुताबिक मजे, आसानी से समझने वाली गतिविधियों और युवा आधारित कार्यक्रमों पर जोर दे रहे हैं. द इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शस्नेस (इस्कॉन) छोटे बच्चों को डांस, पेंटिंग, म्यूजिक, ड्रामा और कहानियों के माध्यम से भगवद् गीता की सीख देने के लिए गर्मियों में गीता शिविर का आयोजन करती है. इस्कॉन, हैदराबाद में रविवार को भगवद् गीता आधारित युवाओं के कार्यक्रम में शामिल होने वालों की संख्या पिछले पांच साल में बढ़ती गई है. केरल में 27 साल पहले शुरू हुए और अब सभी कैथालिक चर्चों में चलने वाले जीसस यूथ मूवमेंट में युवाओं के जमावड़े, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से युवा अनुयायिओं को आकर्षित किया जा रहा है.

रविवार की सुबह जब अन्य युवा हैंगओवर के कारण देर तक बिस्तर से चिपके रहते हैं, 24 वर्षीय सैम टिमोदी अरुल चेन्नै के सैदापेट स्थित न्यू लाइफ एसेंबली ऑफ गॉड (एनएलएजी) की ओर चल पड़ते हैं. वहां वे करीब आठ घंटे तक संगीत, बाइबिल के क्लास चलाने में मदद करने और वर्शिप बैंड के लिए ड्रम बजाने का काम करते हैं. पेशे से क्वालिटी एश्योरेंस मैनेजर अरुल कहते हैं, ‘‘लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं हमेशा खुश कैसे दिखता हूं. मैं इसकी वजह चर्च में अपने विश्वास और सेवा को बताता हूं.’’ युवाओं से जुड़ा एक और पहलू रेक्सबैंड है. जीसस यूथ की इस संगीतमय कोशिश से युवाओं को सामयिक संगीत से जोड़ा जाता है और पिछले एक दशक में इसके जरिए विभिन्न भाषाओं में 10 से ज्यादा एल्बम जारी किए गए हैं.

जीसस यूथ के पहले इंटरनेशनल कोऑर्डिनेटर 44 वर्षीय मनोज सनी कहते हैं, ‘‘ये युवा सिर्फ प्रवचन सुन लेने भर से संतुष्ट नहीं रहना चाहते, वे धर्म में भागीदारी कर उससे जुड़ते हैं.’’ इस तरह जैज़ और हिप-हॉप के तड़के वाली ‘जीवंत अभिव्यक्तियों और क्वाएर म्युजिक के आयोजनों में युवाओं और अशांत मन वाले लोगों का जमावड़ा होता है.

आप इसके लिए बढ़ते तनाव, प्रतिस्पर्धा या अकेलेपन किसी को भी दोष दें, लेकिन सभी धार्मिक स्थलों, आश्रमों और परिसरों में धर्म और आध्यात्मिकता का नए तरह का पुनरुत्थान देखा जा रहा है. मुंबई के पॉश कफ परेड इलाके में चलने वाली कुरान की कक्षाओं में सिर को शालीनता के साथ स्कार्फ से ढकी युवा महिलाओं को देखा जा सकता है. इसी तरह, जिज्ञासु और जानकारी न रखने वाले लोगों को पुजारी सप्ताह के हर दिन पूजा के तरीके बताते हैं, तो काम के बाद लोग श्लोक पढऩे जैसी कक्षाओं में शामिल होते हैं.

करीब एक दशक तक अमेरिका में रहने के बाद 2010 में लौटकर मुंबई आने वाले 34 वर्षीय आर्किटेक्ट चैतन्य कार्णिक कहते हैं, ‘‘लोक और अनुष्ठान परमब्रह्म या हर व्यक्ति के अंदर जो असीम ऊर्जा है उसकी अवधारणा को मजबूत करने के तरीके होते हैं. इनसे शांति और खुशी मिलती है.’’ वे बांद्रा स्थित अपने घर में जन्माष्टमी और नवरात्रि पर बड़े स्तर की पूजा का आयोजन करते हैं और 12वीं सदी की रचना गीत गोविंदम पर अपनी प्रस्तुति भी देते हैं जिसमें उनके शहर भर के दोस्त जुटते हैं.

कई लोग तो प्रसिद्धि से लेकर कार तक कुछ भी हासिल करने के लिए यज्ञ और पूजा करवाते हैं. मुंबई की टैरो कार्ड रीडर और गाइड, जिनके कुल ग्राहकों में करीब 50 फीसदी युवा हैं, 45 वर्षीया रति भंडारी कहती हैं, ‘‘युवा लोग तुरत-फुरत हल की तलाश में रहते हैं, वे उम्मीद करते हैं कि वे रत्नों और पूजा की मदद से कम-से-कम प्रयास में ही वह सब कुछ हासिल कर सकते हैं, जिसकी चाह रखते हैं.’’ संभवत: यही वजह है कि नेशनल सैंपल सर्वे के 2012 में ‘‘भारत में विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं में परिवारों की खपत’’ पर जारी एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि ग्रामीण क्षेत्र के प्रति 1,000 परिवारों में से 670 के मुकाबले शहरी क्षेत्रों में प्रति 1,000 में से 711 परिवार अगरबत्ती खरीदते हैं.’’

मुंबई की साइकोलॉजिस्ट और साइकोलॉजिकल थेरेपी में कला का इस्तेमाल करने वाले मंच द लुकिंग ग्लास की संस्थापक 30 वर्षीया प्रियंका पटेल कहती हैं, ‘‘धर्म अब इतना फैशनेबल बनता जा रहा है कि लोग अपने धार्मिक विश्वास पर इतराना चाहते हैं. असल में यह उनके तनाव भरे, दुखी और अकेलेपन से भरे जीवन से भागने की एक राह ही तो है.’’

आइआइएम-लखनऊ में ‘‘फ्रेमिंग आइडेंटिटीज ऐंड रोल्स थ्रू एक्सप्लोरेशन (अन्वेषण के माध्यम से पहचान और भूमिका का सृजन)’’ जैसे क्रेडिट कोर्सेज को शामिल किया गया है. छात्रों के आध्यात्मिक पक्ष की बात करने वाले इस क्रेडिट कोर्स की भारी मांग है. 2010 में फैकल्टी मेंबर 42 वर्षीय हिमांशु राय के शुरू किए गए इस कोर्स में 50 सीट के बैच के लिए 60 छात्रों ने आवेदन किया था. राय बताते हैं, ‘‘पिछले छह साल से युवा आध्यात्मिकता में काफी रुचि दिखा रहे हैं. भौतिक सफलता के अलावा युवा अब जीवन के ज्यादा गहरे अर्थों की तलाश भी कर रहे हैं.’’

मुंबई में रहने वाली कंप्यूटर इंजीनियर 29 वर्षीया परीनाज पटेल ने इस बात पर जोर दिया, ‘‘अनुष्ठानों में बदलते समय के मुताबिक बदलाव किया जा सकता है.’’ वे जन्मदिन या किसी महत्वपूर्ण त्योहार के अवसर पर दादर के फायर टेंपल में जाती हैं और नए साल के पहले 10 दिनों तक मुक्त का पालन करती हैं जिसके तहत मृत लोगों की याद में फूलों का गुलदस्ता रखा जाता है. इस मंदिर में जाने से उन्हें श्भावनात्मक शांति और दुनिया का सामना करने के लिए मन की शांति मिलती है.’’ पुणे की

55 वर्षीया समाजशास्त्री शिल्पा देशमुख कहती हैं, ‘‘हर ओर भ्रष्टाचार, अपराध और तनाव के दौर में अनुष्ठान और धर्म आंतरिक शांति की तलाश का तरीका होते हैं और इनसे नकारात्मकता दूर होती है.’’

दुनियावी बुराइयों को दूर करने की रामबाण दवा होने के साथ ही धर्म विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों को परस्पर जोडऩे वाला तत्व भी साबित हो रहा है. राजधानी दिल्ली में रहने वाले कश्मीरी पंडित फरीदाबाद के खीर भवानी और दिल्ली के हरि पर्वत मंदिर में विभिन्न उत्सवों, संगीत और खान-पान के कार्यक्रमों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं.

रूट्स इन कश्मीर आंदोलन के संस्थापक 40 वर्षीय राशनीक खेर कहते हैं, ‘‘अपने घर सहित सब कुछ खो देने वाले एक समुदाय के लिए ऐसे मंदिर उनकी संस्कृति को याद दिलाते रहने और लोगों को एक-दूसरे से जोडऩे के धागे का काम करते हैं. धार्मिक स्थल होने के साथ ही ये विरासत और परंपरा के संरक्षण के लिए भी सामाजिक महत्व रखते हैं.’’ युवाओं को ध्यान में रखते हुए पिछले साल साकेत स्थित गार्डन ऑफ  फाइव सेंसेज में एक अलग से नवरेह (नव वर्ष) उत्सव मनाया गया जिसमें पृथ्वी और रूह जैसे कश्मीरी रॉक बैंड ने परफॉर्म किया.

उदयपुर के सिटी पैलेस में हर दशहरे पर अश्व पूजन का आयोजन किया जाता है. यह असल में राजपूतों की शताब्दियों पुरानी परंपरा को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, जिसमें शाही परिवारों के घोड़ों की यज्ञ और अन्य समारोहों के माध्यम से पूजा की जाती है. इसी तरह के एक अनुष्ठान का अपने पिता अरविंद सिंह मेवाड़ के साथ नेतृत्व करने वाले ऑस्ट्रेलिया में शिक्षित शाही परिवार के 27 वर्षीय वंशज लक्ष्यराज सिंह ने बताया, ‘‘यह सिर्फ पुरानी परंपराओं का सम्मान करने की बात नहीं है, यह नई पीढ़ी को जोडऩे के लिए भी है. विरासत के साथ जीना अनुभवों का सामूहिक आदान-प्रदान होता है और आइपैड और आइफोन के जमाने में अतीत इसी तरह से ही खुद को प्रसारित करता है.’’

पढ़ाई या कामकाज के लिए विदेश जाने वाली पीढ़ी के लिए तो इस तरह के अनुष्ठान उन्हें एक विदेशी परिवेश में जमीन से जोड़े रखते हैं और नए सिरे से उनको भारत से जोड़ते हैं. चैतन्य कार्णिक कहते हैं, ‘‘जब आप किसी विदेशी माहौल में रहते हैं तो आप अनुष्ठानों के माध्यम से अपनी पहचान और व्यक्तित्व को मजबूत बनाते हैं. बदलता सामाजिक ताना-बाना भी परंपराओं के पुनरुत्थान की वजह बन रहा है.

संजय श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘स्वायत्तता और मतभेद के विचारों के बीच लगातार टकराव चल रहा है. उदाहरण के लिए, कोई लिव-इन रिलेशनशिप और अपने मां-बाप के प्रति सम्मान के बीच संतुलन कैसे बनाए? इंटरनेट और मीडिया आध्यात्मिकता की बढ़ती लोकप्रियता भी इस टकराव का एक पहलू है. कोई व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप में भी रह सकता है और इन गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के जरिए अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों के प्रति सम्मान का इजहार भी कर सकता है. इस पहलू का यही प्रमुख हिस्सा है.’’

भौतिक सफलता हो या जीवन के गहरे अर्थ हों, धर्म ने नए उपासक पा लिए हैं. जैसा कार्णिक कहते हैं, ‘‘हम ऐसी पीढ़ी के लोग हैं जिसने खुद को कूल दिखाने के लिए भगवान से कन्नी काटने के आडंबर को पीछे छोड़ दिया है.’’

-साथ में मोना रामावत और लक्ष्मी कुमारस्वामी

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