आज जब संयुक्त परिवार में भी सामूहिक रसोई देखने को नहीं मिलती, खंडवा के दाऊदी बोहरा समाज ने समाज के सभी लोगों के लिए एक रसोई में खाना पकाने की अनोखी शुरुआत की है. दरअसल समाज को यह मंजूर नहीं था कि आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज में व्यक्ति का दर्जा तय हो, इसलिए लोगों के मन से अमीर-गरीब का भाव दूर करने के लिए सालभर पहले यह पहल की गई जो अब रंग ला रही है.
समाज ने तय किया था कि अमीर और गरीब का पहनावा और खान-पान एक-सा होगा. इस उद्देश्य से 7 अगस्त, 2011 से समाज के हर घर में एक वक्त का भोजन पहुंचाने की योजना शुरू हुई, जिसे नाम दिया गया ‘फैज-उल मवाइद अल-बुरहानिया’ (एफएमबी).
खंडवा में बोहरा समाज के आमिल शेख मंसूर शेख मोहसिन भाबरावाला बताते हैं, ‘‘सबके लिए एक समान भोजन का विचार हमारे 52वें धर्मगुरु डॉ. सैयदना बुरहानुद्दीन साहब का था, जिसका क्रियान्वयन उनके वारिस शहजादा अली कादर मुफद्दल सैफुद्दीन भाई ने करवाया.’’ सैयदना साहब का मानना था कि कोई व्यक्ति भूखा न सोए. यही सोच एफएमबी का आधार बनी. गरीब परिवारों के स्वाभिमान को ठेस न पहुंचे इसलिए इसमें पूरे समाज को शामिल किया गया. समाज इससे पहले एक समान पहनावे को भी अपना चुका है.
खंडवा में समाज के करीब 2,000 लोगों के लिए रोज शाम का टिफिन घर-घर पहुंचाया जा रहा है. रोज के भोजन में करीब 60 किलो आटा, 40 किलो चावल, 30 किलो दाल और करीब एक क्विंटल सब्जी की जरूरत पड़ती है. सामूहिक रसोई का प्रति दिन का औसत खर्च 26-27,000 रु. आता है.
टिफिन व्यवस्था के लिए परिवारों से अनिवार्य रूप से पैसा नहीं लिया जाता बल्कि जो जितना सहयोग कर सकता है, करता है. इसका फायदा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मिलता है, जिनके लिए एक वक्त के खाने का खर्च घट गया है. सामूहिक रसोई में 18 लोग खाना बनाते हैं. मुंबई के डिब्बेवालों की तर्ज पर यह गरमागरम खाना टिफिन के जरिए घर-घर पहुंचाया जाता है.
एक-सा खान-पान योजना को भारत ही नहीं विदेशों में बसे बोहरा परिवारों ने भी अपनाया है. भाबरावाला बताते हैं, ‘‘दुनियाभर में बोहरा समाज के 1 लाख 30 हजार परिवार हैं, जिनमें से एक लाख परिवारों तक इस योजना के तहत भोजन पहुंच रहा है.’’ खंडवा के जैनुद्दीन हैदरी बताते हैं कि उनकी बेटी मरिया मोहम्मद अटलांटा (अमेरिका) में रहती है और उन्हें वहां भी समाज की ओर से नियमित टिफिन मिलता है.
इस योजना की वजह से समुदाय की महिलाओं के जीवन में सुखद बदलाव आ रहा है. 50 साल की फरीदा जकीउद्दीन बताती हैं, ‘‘शाम का समय चूल्हे-चौके से बचा तो मैं पति की टेलरिंग मटीरियल की दुकान पर समय देने लगी.’’ रबाब अमीरुद्दीन कहती हैं, ‘‘अब बच्चों को पढ़ाने में ज्यादा समय दे पा रही हूं. उनका रिजल्ट भी सुधरा है.’’ खंडवा में बोहरा समाज के सचिव जोएब भाई भामगढ़वाला कहते हैं, ‘‘गरीबों के पेट भरने की चिंता से शुरू हुई यह योजना महिलाओं की तरक्की और आर्थिक सुधार का जरिया बन गई है.’’ इस सामूहिक रसोई में सारा भोजन शुद्ध घी में बनता है. भोजन में खाने का रंग, सिंथेटिक मसाला या मावा, आदि का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होता है.
गरीबों को इस व्यवस्था का दोहरा लाभ मिला रहा है. बिजली का काम करने वाले मुस्तफा लाइटवाला कहते हैं, ‘‘हमारा गुजारा तक ठीक से नहीं हो पाता था. लेकिन सामूहिक रसोई से जुडऩे पर घर-घर टिफिन पहुंचाने के बदले चार से पांच हजार रु. मिलने लगे. खाना बनाने से छुट्टी मिली तो मेरी पत्नी ट्यूशन पढ़ाने लगी.’’ उज्जैन की फहमीदा रंगवाला का मानना है कि इस व्यवस्था से समुदाय के लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव आ रहा है.
महिलाओं को किचन से छुट्टी दिलाने के बाद अब समुदाय उनकी आर्थिक उन्नति की दिशा में कदम बढ़ाने जा रहा है. शेख मंसूर कहते हैं, ‘‘महिलाओं को स्वयं सहायता समूह और कुटीर उद्योग के लिए प्रेरित किया जा रहा है. हम चाह रहे हैं कि महिलाओं के समूह इतने सक्षम बन जाएं कि भविष्य में इस भोजन व्यवस्था का खर्च उठा सकें.’’

