विजेंदर सिंह, 26 वर्ष
बॉक्सिंग, 75 किलो, मिडलवेट,
भिवानी, हरियाणा
उनकी कहानी भारतीय बॉक्सिंग के जबरदस्त नाम विजेंद्र सिंह ने जब 2008 में बीजिंग ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता था, तो उन्होंने पूरे देश में जोश की लहर पैदा कर दी थी. 2011 में अजरबैजान में एआइबीए विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में हार कर उन्होंने कई लोगों को निराश कर दिया था, जिससे लंदन ओलंपिक में उनकी जल्द एंट्री होने की संभावनाएं खतरे में पड़ गई थीं.
विजेंदर ने आखिरकार 2012 के एशियन ओलंपिक क्वालिफायर्स के सेमीफाइनल में पहुंच कर ओलंपिक के लिए क्वालिफाइ कर लिया, उन्हें उम्मीद रही होगी कि इस जीत से उनके आलोचकों का मुंह बंद हो जाएगा. लेकिन अंतिम फैसला लंदन के बाद ही सुनाया जाएगा. विजेंदर के लिए दबाव कोई नई बात नहीं है.
शुरुआती दो प्रयासों में वे बीजिंग ओलंपिक के लिए भी क्वालिफाइ करने में नाकाम रहे थे, लेकिन फिर वे चार साल में एक बार होने वाले इस इवेंट से देश का पहला ओलंपिक बॉक्सिंग मेडल लेकर लौटे थे. इस बार भी उन्हें उम्मीद है कि वे सही समय पर अपने चरम पर आ जाएंगे और मेडल की राह ताकते देश को एक गोल्ड मेडल जीतकर देंगे.
खास है 2009 में वे मिडलवेट कैटेगरी में वर्ल्ड चैंपियन बने. इस उपलब्धि पर उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड और पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उनकी पिछली उल्लेखनीय जीत चीन के गुआंगझू में 2010 में हुए एशियन गेम्स में जीते गए गोल्ड मेडल की है.
चुनौतियां कामयाबी मिलने पर प्रशिक्षण में कोताही बरतने और ग्लैमर की दुनिया में मौज करने के लिए उनकी अकसर आलोचना की जाती रही है. विजेंदर ने 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्.ज मेडल से संतुष्ट होकर और 2011 में लचर फॉर्म जारी रखकर और ज्यादा संदेहों के लिए गुंजाइश छोड़ दी.
मिशन ओलंपिक चाहे मामला बदकिस्मती का हो या विशुद्ध आत्मसंतोष का, विजेंदर अपने चरम से कोसों दूर हैं. लंदन के लिए खुद को फॉर्म में लाने के लिए उन्होंने एक निजी फिजियोथिरेपिस्ट और एक प्रशिक्षक नियुक्त किया है. उनके मेडल जीतने की उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि वे अपने अनुभव के बूते अपने प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा सयाने साबित हो सकेंगे.

